राकेश कायस्थ दरअसल जो शव हो गया वही शिव है. मेरे पिता शिव के परम भक्त थे अपनी युवा वस्था में मै भी धार्मिक हुआ करता था परंतु कट्टरपंथी कभी नहीं रहा इसलिए संघ में रहकर उसकी देश विरोधी गतिविधियां देख समझ कर उसे लात मार आया. और धीरे-धीरे धार्मिक कर्मकांडो से भी दूर होता गया. मैं वर्षों से किसी धर्मस्थल नहीं गया. अस्तु शिव त्याग का प्रतीक है योग का प्रतीक है (राजनीति का योग नहीं) महायोगी शिव सर्व प्रिय है उन्हें किसी से बैर नहीं वो भस्मासुर को भी वरदान दे सकते हैं. ईश्वर होने के नाते यह मानने का कोई औचित्य नहीं है कि उन्हें भस्मासुर की नियत का भान न हो परंतु सबकुछ जानते भस्मासुर को वरदान सिर्फ शिव ही दे सकता है. मैने ऊपर लिखा है जो शव है वह शिव हो गया. शिव पुराण और अन्य शिव कथाओं के अनुसार संहार के देवता होने के बावजूद शिव शांति के प्रतीक है. वो कभी कभी ही जागते हैं और प्राय: ध्यान मग्न ही रहते हैं.
शिव के कई नाम में से एक नाम ‘भोला’ है. शिव हो भी वही सकता है जो स्वभावगत ‘भोला’ है,जिसे कोई भी आसानी से फुसला ले. शिव वही हो सकता है जो मनुष्य के पुण्य में हो और उसके पाप में भी. शिव वही हो सकता है जिसमें शिव और शव में कोई विपरार्थिकता का भाव बोध न हो वास्तव में शिव ही शव है और शव ही शिव. शिव वो है जो एक लौटे जल में,एक बिल्व पत्र में ,एक धतूरे के फूल में,एक अकवन के फूल में प्रसन्न किया जा सके या फिर जंगल में पशु का शिकार कर शिवलिंग पर भोग लगाकर. शिव नृत्य है शिव शाश्वत शांति है शोर शराबे से कोसों दूर उसे किसी अट्टालिका(मंदिर) की जरूरत नहीं. वो कैलाश में हो न हो वह हर उस व्यक्ति में निहित है जो सुबह से शाम तक जीवन जीने का संघर्ष करता है. शिव त्याग है महादेव की उपाधि से विभूषित होने के बावजूद वो सिंहासन रूढ़ नहीं है. शिव हर उस जगह पर है जहां लोग जीवन और मरण के बीच अपना वजूद बचाने की चेष्टा में दिन रात लगे रहते हैं. प्रसिद्ध साहित्यकार ने अयोध्या विवाद प्रारंभ होने के पश्चात एक लेख लिखा था ” अयोध्या उदास लगती है” आज अयोध्या में राम के नाम पर कुटिल राजनीति ने ,भव्य महल खड़ा कर दिया है. परंतु अयोध्या आज टाट वाले राम लाला की बनिस्बत ज्यादा उदास लगती है, कथित दर्शनार्थियों की भीड़ में राम कही दिखाई नहीं देता. दिखाई देता है सिर्फ कुटिल राजनीति का शिखर. वैसा ही राजनीतिक प्रहसन गुजरात के सोमनाथ मंदिर में चल रहा है. जिस शिव त्रिशूल को शिव और शक्ति के सिवाय कोई और नहीं उठा पाया उसे अपने हांथ में लेने की राजनीतिक कुचेष्टा सत्ताधीश द्वारा की जा रही है. शिव के दूतों यथा शोषितों ,वंचितों और दुखी जनो जिनकी आवश्यकताओं एवं व्यथा का निराकरण हेतु सरकारों का चुनाव होता है,उसे भूलकर सत्ताधीश सोमनाथ में राजनीतिक प्रहसन में व्यस्त है. जिस डमरू को सिर्फ शिव बजा सकते हैं उसे राजनीति का मदारी अपने हाथों से बजाकर जन-जन की आशाओं और उनके हितार्थ कार्यों की गुहार को डमरू की आवाज के साथ-साथ पटाखों की आवाज में और रंग बिरंगी कृत्रिम आकाशीय चकाचौंध में दबा देने की कुचेष्टा कर रहा है और इसी बहाने दिवंगत महापुरुषों का चरित्र हनन करने का दुष्प्रास भी. धर्म का दुरुपयोग करने वालों का हश्र अंतत: बेहद कष्टकारी होता है. जीवन उसे जीने नहीं देता,मृत्यु उसके पास नहीं फटकती,ऐसे लोग अंतत: एडिय़ां रगड़ते हैं और अपनी ही मृत्यु की कामना करते हैं. यह अटल(और लाल भी) सत्य है. अभी भी वक्त है धर्म का राजनीतिक दुरुपयोग करने वाले चेत जाएं और अपने पापों का परिमार्जन करें अन्यथा अपने दुष्कृत्यों का दंड भोगने के लिए स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए तैयार रहें. यह भी स्मरण रखें कि शिव का तीसरा नेत्र एक बार ही खुलता है. (यद्यपि मैं कर्मकांडी धार्मिक नहीं हूं परंतु जानता हूं कि धर्म के नाम पर सांप्रदायिक खेल वो भी राजनीतिक सत्ता के लिए, खेलने वालों का अंत बहुत ही मार्मिक और कष्टकारी होने वाला है इतना मै जानता और महसूस करता हूं,आगे नियति जाने) फिलहाल मदारी का खेल जारी है। ईश्वर(शिव)प्रकृति है और प्रकृति से छेड़ छाड़ विनाशकारी होता है।