फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) दिन-ब-दिन बढ़ता प्रदूषण अब जानलेवा होता जा रहा है। इसका प्रमाण अस्पतालों व डॉक्टरों के सामने आये दिन मरीजों की बढ़ती कतारों से मिलता है। इसके चलते जनता अपने सांस लेने के अधिकार से भी वंचित होती जा रही है। शुद्ध वायु की जगह धूल व धुएं को ग्रहण करके जनता अपनी आयु को छोटा करने को मजबूर है, लेकिन फिर भी इसके प्रति सचेत नहीं है। आज दुनिया भर के वाहियात मुद्दों के लिए तो जनता शोर मचा सकती है, विरोध प्रकट कर सकती है, लेकिन अपने जानी दुश्मन, प्रदूषण से बेखबर है।
गाहे-बगाहे सरकार जरूर इसके नाम पर अपनी ढपली बजाती रहती है। कहीं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाया तो कहीं ग्रीन ट्रिब्यूनल व पर्यावरण मंत्रालय तक बना डाला। लेकिन ये सब चोंचले प्रदूषण घटाने की बजाय लूट कमाई के मोटे साधन बन कर रह गए। ज्यों-ज्यों इनके नियमों को कड़ा किया गया त्यों-त्यों सम्बन्धित अधिकारियों की लूट कमाई बढ़ती चली गई। अब ऐसा ही एक नये नियम ग्रैप 1,2,3,4 का आविष्कार किया गया है जिसके बल पर सम्बन्धित कर्मचारी तो अपनी जेबें भर रहे हैं लेकिन पर्यावरण को कोई लाभ नहीं हो रहा। अब ऐसे ही एक और नये नियम के द्वारा तमाम कारखानों में प्रदूषण मापक यंत्र लगाए जाएंगे। इनकी रिपोर्ट ऑनलाइन सम्बन्धित अधिकारियों तक पहुंचेगी। इसकी लागत पांच लाख बताई जा रही है। यानी कि कमाई का एक और स्रोत प्रदूषण के नाम पर ईजाद हो गया है।
समझने वाली बात यह है कि प्रदूषण मापक यंत्र से तो केवल इसे मापा जा सकता है, समाप्त नहीं किया जा सकता। इन यंत्रों एवं इनकी रिपोर्टों के बल पर अधिकारी जरूर मोटी मलाई काटेंगे। प्रदूषण मुक्त वातावरण बनाने के लिए जो आवश्यक काम है, उन्हें सरकार कतई करने को तैयार नहीं। सड़कों व निर्माण स्थलों से उडऩे वाली धूल, वाहनों व जनरेटरों से उगलता धुआं रोकने के लिए सरकार के पास केवल कुछ दिखावटी प्रोग्राम हैं। शहर भर में जगह-जगह जलते औद्योगिक कचरे के ढेर सरकार को कतई नहीं दिखते। यदि बिजली की सप्लाई पर्याप्त एवं नियमित रहे तो डीजल जेनरेटरों के धुएं से बचा जा सकता है। यदि सड़कों में गड्ढे न हों और ट्रैफिक जाम की स्थिति से बचा जाए तो प्रदूषण से काफी राहत मिल सकती है। सड़कों की नियमित सफाई व किनारे पड़ी धूल को समाप्त कर दिया जाए तो वातावरण को बहुत हद तक शुद्ध किया जा सकता है। उफनते सीवरों से बहता हुआ सीवेज तथा उड़ती दुर्गंध को रोकने का दायित्व भी पूरी तरह सरकार का ही है।
घरेलू तथा औद्योगिक गैस के दाम बेतहाशा बढ़ा दिए जाने के चलते लोग सस्ते वैकल्पिक इंधन के रूप में जिस लकड़ी व कोयले आदि का इस्तेमाल करते हैं, उससे भी वातावरण प्रदूषित होता है लेकिन मुनाफाखोरों के मुनाफे पर सरकार कोई रोक नहीं लगा सकती। यातायात के संसाधनों की कमी के कारण जनता को निजी वाहनों का इस्तेमाल करना पड़ता है। यदि जन यातायात के साधन पर्याप्त एवं बिजली व गैस चालित हों तो प्रदूषण से मुक्ति पाई जा सकती है। परन्तु सरकार को प्रदूषण से मुक्ति में कोई रुचि नहीं, उसे तो केवल इसके नाम पर ढोल पीट कर मोटी लूट कमाई करने में रुचि है।