शिक्षा माफिया के हाथों बिकी सरकार ने दी अभिभावकों को लूटने की छूट

शिक्षा माफिया के हाथों बिकी सरकार ने दी अभिभावकों को लूटने की छूट
April 30 14:24 2025

फार्म 6 की खुली अवहेलना
फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही शहर के निजी स्कूलों ने बच्चों का दाखिला, किताब, यूनिफार्म के नाम पर जमकर लूट मचाई। मनमानी फीस बढ़ाई तो बेचारे अभिभावक और अभिभावक संघों ने शिक्षामंत्री से लेकर निदेशालय तक उनकी शिकायत की। स्कूलों द्वारा ठगे जा रहे अभिभावकों को शिक्षामंत्री के आदेश पर निदेशालय ने जांच का लॉलीपॉप थमा दिया। एक जांच कमेटी का गठन किया गया है जो शिकायतों की ‘जांच करने के बाद मंत्री को रिपोर्ट सौंपेगी।

शिक्षामंत्री की होशियारी और कर्मठता तो समझ में आ ही गई होगी, कि यदि स्कूलों पर तुरंत एक्शन लिया जाएगा तो वे मनमानी नहीं कर पाएंगे, अभिभावकों को बढ़ी हुई फीस भरने, महंगा यूनिफार्म और किताबें खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर पाएंगे। तो अभिभावकों को खुश करने के लिए कमेटी गठित करवा दी कि पहले फीस भरो, यूनिफार्म किताबें खरीद लो उसके बाद देखा जाएगा। देखा जाए तो शायद इस तरह की जांच कमेटी हर साल बनाई जाती है लेकिन उसने रिपोर्ट कब बनाई, किसके सामने पेश की और सबसे बड़ी बात, क्या कार्रवाई हुई यह कभी सामने नहीं आता। यानी इस जांच कमेटी की रिपोर्ट से भी ज्यादा उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।

बुजुर्ग समाजसेवी सुरेश गोयल कहते हैं कि नियमानुसार यदि कोई निजी स्कूल फीस बढ़ाना चाहता है तो उसे शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले फार्म छह भरकर शिक्षा निदेशालय में जमा करवाना होता है, इस फार्म में बढ़ाई गई फीस, बंंढ़ोत्तरी का कारण, इससे होने वाली आय किस मद में खर्च की जाएगी, छात्रों को कौन कौन सी सुविधाएं दी जा रही हैं, टीचर और स्टाफ के वेतन में कितनी बढ़ोत्तरी की जाएगी आदि जानकारियां देनी पड़ती है। यह जानकारियां सिर्फ निदेशालय को ही नहीं दी जातीं, फार्म छह स्कूल के मुख्यद्वार पर भी चस्पा करना होता है ताकि अभिभावक भी फीस बढ़ोत्तरी के कारण जान लें। नियमानुसार स्कूल प्रबंधन को फार्म छह शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले फरवरी माह में ही जमा करवाना और चस्पा करना होता है लेकिन लगभग सभी इसका जमकर उल्लंघन करते हैं।

निजी स्कूलों की मोटी कमाई का जरिया फीस तो है ही साथ साथ किताबों में मोटा कमीशन कमाते हैं। नियमानुसार किसी भी स्कूल में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) या राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की किताबों से ही पढ़ाई करानी होती है लेकिन निजी प्रकाशकों की ही महंगी किताबें लगाई जाती हैं। यहां भी सरकारी निकम्मेपन के कारण निजी स्कूल खुलेआम मनमानी करते हैं। एनसीईआरटी हो या एससीईआरटी की किताबें शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद तक छप कर नहीं पहुंचतीं ऐसे में पाठ्यक्रम पिछडऩे का भय दिखा कर निजी स्कूल वाले महंगी किताबें खरीदने को मजबूर करते हैं। यूनिफार्म की कमीशनबाजी भी सबको मालूम है, बाजार में पांच सौ रुपये में मिलने वाली वर्दी के लिए अभिभावकों को दो से ढाई हज़ार रुपये खर्च करने पड़ते ही हैं।

निजी स्कूूल वाले भी बेखौफ होकर अभिभावकों को लूटते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि सरकार उनके खिलाफ कोई कदम उठाने वाली नहीं। वसूली करें भी क्यों न जब इनकी स्कूल बसें नेताओं की रैलियों में भीड़ ढोने के लिए बेगार में लगाई जाती हैं। नेता, विधायक-मंत्री की सिफारिश पर दाखिले दिए जाते हैं, सरकारी योजनाओं का प्रचार प्रसार करने के लिए छात्र-छात्राओं का इस्तेमाल रैलियां निकालने में कराते हैं। इसके अलावा सत्तापक्ष के नेताओं को मोटे मोटे चंदे दिए जाते हैं, जब सरकार निजी स्कूलों से फायदे उठा रही है तो उसके संरक्षण में ये भी फायदा उठाएंगे ही। ऐसे में सरकार तो कुछ करने से रही, शिक्षा विभाग के अधिकारियों से भी कोई उम्मीद करना बेमानी है। निजी स्कूल वाले अभिभावकों से हर लूट कमाई का हिस्सा अधिकारियों को भी आखें और मुंह बंद रखने के लिए खिलाते हैं। महंगाई और टैक्स की मार से दुखी अभिभावक इन स्कूल वालों से भी तब तक लुटते रहेंगे जब तक इनकी मनमानी के खिलाफ खुद एकजुट होकर बढ़ी फीस नहीं देने का अडिग फैसला नहीं लेंगे।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles