क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा 18 सितंबर को, आज़ाद नगर के लोगों ने, जिनमें बड़ी तादाद में महिलाएं शामिल थीं ‘दुर्गा भाभी महिला मोर्चा’ के परचम तले मुजेसर पुलिस स्टेशन पर आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन किया तथा एसएचओ की माफऱ्त सहायक आयुक्त मुजेसर को ज्ञापन सौंपा। 15 सितंबर को आज़ाद नगर में दो पड़ौसियों रोहित और विजय में झुग्गी से पानी निकासी को लेकर विवाद हो गया, जैसा बेहद तंग जगह पर किसी तरह जिंदा रहने को मजबूर मज़दूरों के बीच अक्सर हो जाता है। विजय कुर्मी हैं और रोहित दलित। यह फ़र्क कितना संगीन हो सकता है इस बात का पता 15-16 की रात चला। विजय का बेटा सूरज, जो कुख्यात अपराधी बनने की राह पर है, कई आपराधिक वारदातें कर कई बार जेल जा चुका है, जातिगत अकड़ और हेंकड़ी के रोगों से भी ग्रस्त है।
‘उस ..मार के बच्चे की इतनी हिम्मत कि मेरे बाप से जुबान लड़ाए’, जातिगत दंभ के नशे में चूर, सूरज ने रात 1 बजे, अपने गिरोह के दो गुंडों को के साथ 60 वर्षीय गऱीब दलित मज़दूर रोहित के घर पर हल्ला बोल दिया। जाति सूचक, अपमानजनक गालीयां बकते हुए जिन्हें लिखना उचित नहीं, वह गिरोह बंद दरवाज़े को तोडऩे लगा। दरवाज़ा, जब नहीं टूटा, तो छत की चद्दरें तोड़ कर उखाड़ डालीं और घर में घुस कर लात, घूसों और गैस के सिलिंडर से रोहित की बेदम होने तक पिटाई की और जान से मारने की धमकी दी। घर का सारा सामान, गैस, टीवी, दरवाज़ा आदि तोड़ डाला। घर में 20,000 रुपये थे, वे भी ले गए। जातिसूचक अपमानजनक गालियाँ लगातार ज़ारी रहीं। रोहित की आँखों, पसलियों पर गंभीर चोट हैं जो मेडिको लीगल रिपोर्ट में भी दजऱ् हैं। रोहित को पडौसियों ने बचाया न होता तो वे उन्हें जान से ही मार डालते।
रात 1:30 बजे 112 नंबर पर कॉल की गई। पुलिस गाड़ी आई और ‘थाने में रिपोर्ट करो’ का ज्ञान देकर चले गए। आक्रोशित लोग रात में थाने भी गए लेकिन कोई नहीं मिला। 16 सितंबर को ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ कार्यकर्ताओं समेत 10 लोग रोहित के साथ मुजेसर पुलिस स्टेशन गए और लिखित नाम दर्ज तथा SC-ST Atrocities Act का हवाला देकर शिकायत की। तफ्तीश मंदीप सिंह एएसआई को सौंपी गई उन्होंने सख्त कार्यवाही का भरोसा भी दिलाया लेकिन 1 किमी से भी कम दूर घटनास्थल तक जाने की ज़हमत उन्होंने नहीं उठाई। 16 की रात, साथी रोहित को सोने की भी समस्या रही, क्योंकि दरवाज़ा और छत टूटे पड़े थ जिसे ठीक भी नहीं किया जा सकता था क्योंकि पुलिस का मौक़ा मुआयना नहीं हुआ था।
17 सितंबर को फिर से 10 लोग सुबह 10 बजे थाने गए और एसएचओ सुमेर सिंह को सारी बात बताई। उन्होंने कहा; ‘क्यों नहीं होगी कार्रवाई ज़रूर होगी’। उन्होंने, उसी वक़्त मंदीप को फ़ोन भी किया; ”कार्रवाई क्यों नहीं करता भाई?” ‘निश्चिन्त रहो कार्रवाई ज़रूर होगी’ कहा लेकिन किया कुछ नहीं। ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ तथा ‘दुर्गा भाभी महिला मोर्चा’ द्वारा, 18 तारीख को मुजेसर थाने पर प्रदर्शन के ऐलान के बाद पहली बार एएसआई मंदीप मौक़े पर गए और सूरज को हिरासत में भी लिया गया। 18 तारीख को सायं 4:30 बजे का आक्रोश प्रदर्शन ज़बरदस्त रहा जिसमें कामरेड्स सत्यवीर सिंह, नरेश, विनोद, रोहित, कविता आदि ने संबोधित किया। क्रांतिकारी गीत भी गाए गए। बड़ी तादाद में जनसरोकार को प्रतिबद्ध मीडिया ने इसे कवर किया। इसका परिणाम यह हुआ कि उसी दिन, 18 सितंबर को रात 9:32 पर, सूरज, राहुल और एक अन्य के खि़लाफ़, एससी/एसटी एक्ट की धारा 3 तथा भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 115, 324(4), 333 तथा 351(2) में एफ़ आई आर दजऱ् हुई, जिसकी जांच एसीपी मुजेसर कर रहे हैं.
रिपोर्ट लिखे जाने तक किसी की भी गिरफ़्तारी नहीं हुई है। वज़ह यह बताई जा रही है कि रोहित के एससी सर्टिफिकेट को जांच के लिए उनके पैत्रिक जि़ले हरदोई, यूपी भेजा गया है। आज के डिजिटल युग में सर्टिफिकेट की जांच का तरीका वही मध्ययुगीन ही है यह जानकर तक़लीफ़ होती है ऐसी वारदात के बाद भी, आरोपियों का खुला घूमना, अपराधियों के हौसले बढ़ाता है, तथा पीडि़तों के दिल में भय और आतंक पैदा करता है। गऱीब मज़दूरों को अगर गुंडे, दबंग, बाहर सड़को पर धमकाते ह तो वे अपने घर आ जाते हैं। उनकी झोंपडिय़ों में दरवाज़े और छत तोड़कर ही अगर हमला करने की जुर्रत गुंडों की हो रही हो तो वे कहां जाएं? पुलिस का रवैया हमेशा मज़दूर विरोधी, गऱीब विरोधी क्यों रहता है? लोग यह सवाल कर रहे हैं. साथ ही मज़दूर यह सच्चाई भी समझते गए हैं कि उनके सामने एक ही रास्ता है; संगठित होना मोहल्ला जन-कमेटियां बनाना, एक दूसरे का दर्द समझना और साथ देना। मज़दूरों ने तय किया है कि रोहित को इंसाफ़ मिलने तक संघर्ष ज़ारी रहेगा.
हम विनम्रतापूर्वक मांग करते हैं: 1) सूरज, राहुल तथा तीसरे गुंडे को गिरफ्तार किया जाए। 2) रोहित को इंसाफ़ दिलाया जाए, उन्हें जो आर्थिक नुकसान हुआ है उसका मुआवज़ा दिलाया जाए।