इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहे, मारुति मज़दूरों पर पुलिस दमन का विरोध करो

इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहे, मारुति मज़दूरों पर पुलिस दमन का विरोध करो
February 04 00:55 2025

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा
’30 जनवरी को सुबह 10 बजे, मानेसर तहसील कार्यालय के सामने, मारुति मज़दूरों के पक्के मोर्चे पर, अस्थाई मज़दूरों की सभा होगी, यह घोषणा अभी हाल में वज़ूद में आए, ‘मारुती अस्थाई मज़दूर संघ’ तथा ‘हीरो कॉर्प अस्थाई मज़दूर संघ’ ने, 10 जनवरी को डी सी कार्यालय गुडग़ाँव पर हुई, अस्थाई मज़दूरों की एक शानदार सभा में किया था. उस सभा में कम से कम 4,000 की तादाद में वे मज़दूर मौजूद थे, जो मारुती कंपनी में काम कर चुके हैं, और कंपनी ने उन्हें कोई ना कोई मनगढ़ंत कारण बताकर, या बगैर कोई कारण बताए ही, देश के सभी श्रम क़ानूनों को धता बताते हुए काम से निकाल दिया था. मज़दूरों की भारी तादाद के अलावा, 10 जनवरी वाली मीटिंग की हासिल-ए-महफि़ल खासियत यह थी कि वे मज़दूर, जिन्हें कोई गिनती में नहीं लेता, बहुत ही परिपक्व अंदाज़ में अपने सीने में गहरे दबे दर्द को इस तरह बाहर निकाल रहे थे, जैसे ज्वालामुखी से लावा फूट पड़ता है.

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा, जो शुरू से मारुती मज़दूरों के इस शानदार आंदोलन से बहुत शिद्दत से जुड़ा है और आगे भी इसी तरह जुड़ा रहेगा. 30 जनवरी को होने वाली सभा में हिस्सेदारी कर अपना फज़ऱ् निभाने के लिए भी मोर्चे की टीम मानेसर में मौजूद थी.

10 जनवरी की सभा ने मज़दूरों के उस विशाल और विकराल हिस्से की उम्मीदें जगा दी थीं, जिसे ‘अस्थाई मज़दूर’, ‘असंगठित मज़दूर’ अथवा ‘ठेका मज़दूर’ के नाम से जाना जाता है. इन मज़दूरों की कुल तादाद, दिल्ली से 50 किमी के दायरे में ही, कम से कम 2 करोड़ है. सारा उत्पादन ये मज़दूर ही कर रहे हैं, जिन्हें न्यूनतम वेतन भी बा-मुश्किल ही मिलता है, बाक़ी कोई भी श्रम अधिकार हांसिल होने का तो सवाल ही कहाँ पैदा होता है. अस्थाई मज़दूरों का यह विशाल कमेरा वर्ग, इस युग का ‘गुलाम’ है. 10 जनवरी की उस मीटिंग के लब्बो-लुआब ने इन मज़दूरों के चेहरों पर तो चमक लाई ही थी, उसने समूची कारखानेदार ज़मात, सरकार और पुलिस प्रशासन के भी कान खड़े कर दिए थे, क्योंकि वे भी इस बात को अच्छी तरह जान गए थे कि वे जिन मज़दूरों के शोषण- दमन- उत्पीडऩ बिलकुल बेख़ौफ़- बिंदास अंदाज़ में कर रहे हैं, जिस बेरहमी से उन्हें नीचोड़ रहे हैं, वह हक़ीक़त अगर देश के सामने आ गई, तो आम जन-मानस भी इनके साथ हो जाएगा और फिर यह बात बहुत दूर तलक भी जा सकती है.

10 जनवरी के बाद एक और अहम घटना भी घट चुकी थी. मारुती की ही तरह, मानेसर स्थित एक दूसरी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी, ‘हीरो कॉर्प के भी उसी तरह सताए गए अस्थाई मज़दूरों ने भी ‘हीरो अस्थाई मज़दूर संघ बना ली थी और उसने बनते ही यह ऐलान भी कर दिया था कि 30 जनवरी की सभा में वे भी दिल खोलकर हिस्सेदारी करेंगे. वहां भी बे-इन्तेहा शोषित, अस्थाई मज़दूरों की तादाद लाखों में है. इस ऐलान से समूचे मालिक वर्ग के होश फाक्ता हो गए. उन्हें लगा कि मज़दूरों का मन माफि़क खून चूसने के उनके ‘दैवीय अधिकार को गंभीर चुनौती मिलने जा रही है!!

मालिकान और उनके ताबेदार पुलिस प्रशासन ने उसी दिन, 10 जनवरी को ही तय कर लिया था कि 30 जनवरी की सभा नहीं होने देनी. पिछले 4 महीने से मानेसर तहसील पर, बिलकुल शांति से, किसी भी किस्म का कोई अवरोध पैदा ना कर रहे, धरने पर बैठे, इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे, मारुती मज़दूरों को पुलिस द्वारा धमकाया जाने लगा. साथ ही मारुती मैनेजमेंट अदालत पहुंच गया कि 30 जनवरी को मज़दूर, देश के प्रमुख औद्योगिक हब का अमन-चैन बिगाड़ देने वाले हैं, हुजूर उन्हें रोकिये. अदालत ने 29 जनवरी को मालिकों और मज़दूरों, दोनों को सुनकर यह फ़ैसला सुनाया कि मज़दूर मारुती कंपनी के गेट न 2 से 500 मीटर की दूरी पर अपना प्रदर्शन शांतिपूर्वक कर सकते हैं, किसी तरह की अव्यवस्था ना हो, यह ध्यान रखें. अदालत के आदेश की कॉपी हमारे पास मौजूद है. सभा जिस जगह होने जा रही थी वह मारुती के गेट न 2 से 8 किमी दूर है.

माननीय अदालत के आदेश को पैरों तले कुचलते हुए, पुलिस ने 29 जनवरी को दोपहर को ही धरना स्थल पर मौजूद सभी 70 मज़दूरों को उठा लिया. उन्हें बसों में भरकर ले गए और फर्रुखनगर से आगे ऐसी सुनसान जगह ले जाकर छोड़ दिया, जहाँ से कोई वाहन ना मिल पाए. मज़दूरों ने वापस पैदल मार्च शुरू कर दिया. किसी तरह रात 10 बजे वापस धरना स्थल पर पहुंचे.

30 जनवरी को सुबह 8 बजे ही पुलिस, भारी भरकम तैयारियों के साथ धरना स्थल पर पहुंची. टेंटों को तोड़ डाला, खाने का सामान इधर-उधर फेंक दिया. ल_ बजाया और मज़दूर कार्यकर्ताओं को बसों में ठूंसकर ले गए. पुलिस की सबसे शर्मनाक हरक़त यह थी कि मारुती मज़दूरों के आंदोलन में उनके परिवार के जो लोग, बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल होने के लिए टेंट में मौजूद थे, उन्हें भी थप्पड़ मारे, उन्हें भी ज़लील किया. इस बात से व्यथित, मारुती मज़दूरों के एक अगुवा साथी कटार सिंह का एक विडियो वायरल हो रहा है, जो उस वक़्त रिकॉर्ड किया गया है जब वे, पुलिस की हिरासत में बस में ले जाए जा रहे थे. भरे गले से कॉमरेड कटार सिंह बोल रहे हैं:

“साथियों, हमारे साथ बहुत ज़ुल्म हुआ है. पुलिस ने हमारे टेंट फाड़ डाले. हमरे खाने का सामान, राशन बिखेर दिया और भर कर ले गए. पुलिस ने बेशर्मी की इन्तेहा तो यह की है कि टेंट में जो हमरे परिवार वाले, हमारे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग मौजूद थे, उन्हें भी थप्पड़ मारे हैं. मैं सभी ट्रेड यूनियन नेताओं, प्रधानों से कह रहा हूँ, हमारा साथ दो. मैं मारुती कंपनी में काम कर रहे मज़दूरों से कह रहा हूँ, अरे हम भी तुम जैसे ही मज़दूर थे, 2012 से पहले. हमें ग़ैर समझते हो क्या? हम ग़ैर नहीं हैं. हमारा साथ दो. वर्ना हम कंपनी के गेट पर अपनी जान दे देंगे. हमारी लाश पर तुम कफऩ डालने भी मत आना..”

30 जनवरी को पूरा दिन मानेसर में ऐसा माहौल था, मानो कोई बड़ा संकट आ गया हो. हर तरफ़ मज़दूर को दौड़ाया जा रहा था. उनके पीछे पुलिस की जिप्सियां दौड़ रही थीं. शांति का चोगा सुबह 8 बजे से ही दूर फेंक कर, पुलिस के 8 थानों के स्॥ह्र मानेसर में चक्कर काट रहे थे. मानेसर चौक पर खड़े मज़दूरों को भी खदेड़ रहे थे. पास के देवीलाल पार्क में बैठे मज़दूरों को भी पीटते हुए बसों में भरकर ले गए. मज़दूर, हाई-वे के दूसरी तरफ़ वाले पार्क में पहुंचकर क्रांतिकारी गाने लगे, तो वहां भी पहुँच गए और वहां से भी मज़दूरों को ऐसे खदेड़ा, मानो वे इंसान नहीं पशु हों!! मज़दूर वहां से 1 किमी दूर आगे चले गए, तो वहां भी जिप्सियां चक्कर लगाने लगीं. मज़दूर और आगे बढ़ गए. ज़ुल्मत का यह दौर देर रात तक ज़ारी रहा.

पुलिस मजदूरों को दौड़ा रही थी, डिटेन कर रही थी, बसों में भरकर ले जा रही थी. मज़दूर भूखे प्यासे दौड़ रहे थे , लेकिन एक भी मज़दूर ऐसा नहीं मिला, जिसने कहा हो कि वह घर जा रहा है. सभी कह रहे थे कि हम यहीं, इधर- उधर मंडराएंगे, लेकिन लड़ाई का मैदान नहीं छोड़ेंगे. एक साथी अपनी टांग दिखा रहा था जहां पुलिस का ल_ पड़ा था, लेकिन उसने भी यही कहा, पीछे नहीं हटेंगे. लड़ेंगे, या मरेंगे. मारुती के गुडग़ांव प्लांट में वार्ता के नाम पर नौटंकी भी दिन भर चलती रही. 30 जनवरी की मीटिंग तो नहीं हुई लेकिन मज़दूरों की ‘ऑन द जॉब ट्रेनिंग ज़रूर हो गई. उन्हें समझ आ गया कि आगे इस आंदोलन में क्या होने वाला है.

69 मज़दूर पुलिस हिरासत से छूट गए, यह समाचार 30 जनवरी को रात 10 बजे आया. तहसील के सामने वाले टेंट, पुलिस ने उखाड़ ही दिए थे, लेकिन पुलिस, हिरासत से छूटे मज़दूर कार्यकर्ताओं का हौसला नहीं उखाड़ पाई. उन सभी मज़दूरों ने 30 जनवरी की रात डीसी कार्यालय के सामने ठीक उसी जगह, जहाँ 10 जनवरी की मीटिंग हुई थी, कड़कड़ाती ठंड में रात खुले आसमान के नीचे गुजारी. मज़दूरों का हौसला बुलंद है, आंदोलन इंसाफ मिलने तक ज़ारी रहेगा. ख़ाली हाथ वापस नहीं जाएंगे, भले जेल जाना पड़े, या मारे जाएँ. 31 जनवरी को होने वाली त्रिपक्षीय वार्ता के बाद, तहरीक़ के अगले दौर का आगाज़ होगा. कार्यक्रम के ऐलान का इंतज़ार करोड़ों मज़दूर कर रहे हैं.
गुडग़ांव-मानेसर में अनेक बड़ी कंपनियां हैं, जिन्हें ‘मदर यूनिट कहा जाता है. आस-पास के औद्योगिक क्षेत्रों, जैसे फऱीदाबाद आदि में हज़ारों कंपनियां हैं, जो इन ‘मदर यूनिट की ‘सहायक कम्पनियां कहलाती हैं. इन सहायक कंपनियों की सेहत, जहाँ लाखों मज़दूर काम करते हैं, मदर यूनिट की सेहत पर निर्भर करती है. ठीक उसी तरह मारुती के बर्खास्त और अस्थाई मज़दूरों का यह आंदोलन आस-पास के ही नहीं, बल्कि देश भर के ‘मज़दूर आंदोलनों की मदर यूनिट है. मारुती मज़दूरों की हार समूचे देश के मज़दूर आंदोलनों की हार और इस ऐतिहासिक आंदोलन की जीत समूचे देश के आंदोलनों की जीत होगी. उम्मीद है कि मारुती मज़दूरों के इस शानदार आंदोलन के समर्थन में और इसके साथ एकजुटता व्यक्त करने वाला, ‘संयुक्त किसान मोर्चा का बयान और ऐलान जल्द ही ज़ारी होगा. देश के मज़दूरों और किसानों को तय करना है कि वे मज़दूरों की हार देखना चाहते हैं या जीत.

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Mazdoor Morcha
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