गज़़ल

गज़़ल
June 13 16:30 2025

डॉ. रामवीर
जि़ंदगी क्या है मुसीबत का मुसल्सल सिलसिला
वक़्ते आखिऱ आने पर ही ख़त्म होता सिलसिला।

सबकी क़िस्मत है अलग फिर क्यों करें नाहक गिला
सबको अपनी अपनी करनी का ही मिलता है सिला।

आफ़तों से कब रुका है जि़ंदगी का काफि़ला
बनते रहते हैं मकां औ आता रहता ज़लज़ला।

क़ौमो मज़हब मुल्क में फ़र्क़ हमने ना किया
हम उसी के हो गए जो मोहब्बत से मिला।

जो सभी को रास आए ऐसा बंदा ना मिला
शेख की बातें न सुन जो पीते हैं उनको पिला।

न मनाने से ही माना न हिलाने से हिला
बस भी कर अब याद पत्थर के सनम की ना दिला।

आ गया मौसम बसंती चार सूं रौनक लगी
मेरे अंगना में भी कोई गुल ख़ुशी का दे खिला।

मुसल्सल = निरन्तर ज़लज़ला = भूकम्प

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