फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रदेश के निजी अस्पतालों मे गरीब मरीजों को एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आयुष्मान भारत योजना से इलाज नहीं मिलेगा। कारण मोदी-सैनी की डबल इंजन सरकार गरीबों के इलाज का पैसा ही नहीं दे रही है। हालात ये हैं कि प्रदेश के अस्पतालों का आयुष्मान योजना पर चार सौ करोड़ रुपये बकाया है। यानी कम से कम अस्सी हजार मरीजों के इलाज का पैसा सरकार दबाए बैठी है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने एक बार फिर ऐलान किया है कि यदि 6 अगस्त तक भुगतान नहीं किया गया तो अगले दिन से मरीजों का इलाज बंद कर देंगे। भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकारों में सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हालात ये हैं कि बीके जैसे बड़े जिला अस्पताल भी विटामिन बी कॉप्लेक्स, पैरासीटामॉल, आयरन, कैल्शियम की गोलियों, मेट्रोनिडाजोल, एसीलॉक जैसी सामान्य और थोड़ी बहुत एंटीबायोटिक दवाओं के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में इन अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक या इलाज मिलना भी लगभग नामुमकिन है। सरकारी अस्पतालों में अधिकतर यही गरीब और निम्न मध्यम आय वर्ग के परिवार वाले ही इलाज कराने जाते हैं।
पूंजीवादियों की गोद में बैठकर सत्ता चलाने वाले प्रधानमंत्री मोदी जिस गति से सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां निजी हाथों में सौंपने में जुटे हैं, उससे लगता है कि अंतत: स्वास्थ्य सेवाएं भी पूरी तरह से निजी क्षेत्र को सौंप दी जाएंगी। आयुष्मान योजना दरअसल, सरकारी जिम्मेदारियों को निजी मुनाफाखोर कंधों पर डालने की कवायद ही है। समस्या यह है कि सरकार निजी अस्पतालों को आयुष्मान योजना लागू करने को मजबूर तो कर रही है लेकिन समय पर भुगतान नहीं किया जा रहा। इसका खामियाजा अंतत: गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, इलाज और दवा नहीं और निजी अस्पताल इलाज करने को तैयार नहीं।
यह पहली बार नहीं हुआ है कि आईएमए ने लाभार्थियों को इलाज देने से मना किया हो। बीते तीन चार वर्ष में छह-सात बार ऐसी धमकियां और चेतावनियां देने के बाद ही सरकार थोड़ा बहुत धन जारी करती है। दरअसल, सरकार की नीयत योजना के नाम पर छवि चमकाने की है न कि लाभार्थियों को इलाज दिलाने की। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में आयुष्मान योजना का बजट केवल 9 हजार 406 करोड़ रखा। देश मेें आयुष्मान लाभार्थियों की संख्या 41 करोड़ से अधिक है यानी प्रत्येक लाभार्थी का औसत केवल 229 रुपये। जबकि इसी बजट में से सरकार करीब सवा दो सौ करोड़ रुपये योजना के प्रचार द्वारा मोदी की छवि निखारने पर खर्च कर चुकी है। इसके अलावा 2018-19 में लांच करने पर करीब ढाई सौ करोड़ रुपया खर्च कर दिया गया था। यदि सरकार की इच्छा वास्तव में ही इलाज उपलब्ध कराना होता तो बजट की सीमा न रखी जाती।
ऐसा इसलिए है क्योंक मोदी सरकार ने घोषणा तो लाभार्थी परिवारों के लिए एक साल में पांच लाख रुपये तक मुफ्त इलाज करने की कर रखी है लेकिन बीते साल जारी किए गए सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो सरकार ने प्रत्येक लाभार्थी परिवार पर औसतन बीस हजार रुपये ही खर्च किए। दरअसल, इस योजना में तरह तरह की बीमारियों की खर्च सीमा तय कर दी गई है, यानी किसी भी मरीज को किसी एक बीमारी के लिए साल भर में पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज नहीं मिलेगा। गंभीर बीमारी के लिए तय रकम खत्म होने के बाद मरीज को अपने खर्च पर इलाज कराना होगा या फिर अगले साल तक इंतजार करना होगा। उदाहरणार्थ कैंसर के लिए एक लाख रुपये तय कर दिए गए हैं, जिसके पूरा हो जाने पर इलाज बंद कर दिया जाएगा जबकि उसके खाते में चार लाख रुपये अभी बचे हुए हैं, सर्वविदित है कि एक लाख में कैंसर का इलाज नहीं होता। यह सार्वजनिक धोखा नहीं है तो क्या है?
आईएमए के एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सरकार ने आयुष्मान योजना की जो रेटलिस्ट बनाई है वह सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम की रेट लिस्ट से भी काफी कम है। निजी अस्पताल इस रेट पर काम करना नहीं चाहते लेकिन सरकार के दबाव के कारण मजबूरी में स्कीम लागू कर रहे हैं। एक तो सरकार ने बीमारियों के पैकेज रेट बहुत ही कम कर रखे हैं, ऊपर से अधिकतम खर्च सीमा भी बांध रखी है। इसकेे बावजूद रो पीट कर किसी तरह इलाज किया भी जाता है तो बिल भुगतान में महीनों लगा दिए जाते हैं। पैकेज फिक्स होने के बावजूद भुगतान के समय कोई न कोई बहाना बना कर कटौती कर ली जाती है। प्रदेश आईएमए प्रधान डॉ. महावीर जैन के अनुसार प्रदेश सरकार ने जनवरी में आयुष्मान के सारे भुगतान पंद्रह दिन में करने का वादा किया था, जुलाई भी बीत गई लेकिन अभी तक अस्पतालों को धनराशि नहीं मिली है। एक चिकित्सक ने बताया कि निजी अस्पतालों में अधिकतर चिकित्सक पैकेज पर रखे जाते हैं, उन्हें तो प्रत्येक केस के आधार पर हर महीने भुगतान किया जाता है। ऐसे में समय पर भुगतान नहीं मिलने के कारण प्रबंधन को दोहरा नुकसान होता है, एक तो भुगतान नहीं हुआ, दूसरे अपनी जेब से डॉक्टर को पैसा देना पड़ा। लोन लेकर बने बहुत से निजी अस्पताल आयुष्मान का भुगतान नहीं होने के कारण आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं।
बार बार आंदोलन किए बिना भुगतान नहीं किया जाना आयुष्मान का ढिंढोरा पीटने वाली मोदी-सैनी सरकारों की नीयत पर सवाल खड़ा करता है, यदि डबल इंजन सरकारों की नीयत सच में गरीबों को बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएं देने की होती तो आयुष्मान जैसी पलायनवादी योजनाएं चलाने की बजाय सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा मजबूत किया जा सकता था।