डॉ. रामवीर सभी की तरह लेखकों की भी समस्याएं हैं। लेखक लिखना चाहता है विषय नहीं सूझता। यह अनिद्रा रोग की तरह है, आदमी सोना चाहता है नींद नहीं आती। स्पष्ट करना उचित होगा, लेखकों की समस्या से अभिप्राय है छोटे लेखकों की समस्या। नाचीज इसी वर्ग से आता है। दरअसल छोटे का मतलब ही समस्या है। छोटा चाहे किसान हो, दुकानदार हो, नेता हो, गुरु हो – कोई भी हो छोटा विशेषण लगते ही वह समस्याग्रस्त हो जाता है। 1973 में अर्थशास्त्री EF Schumacher की पुस्तक Small is Beautiful आई थी। बड़ी चर्चित रही, पसंद की गई। समय पेंड्युलम की तरह स्थान बदलता है – आज बिग इज ब्यूटीफुल का दौर है। बॉस है तो बिग स्वत: हो जाता है। समस्या बड़ों की नहीं होती ऐसा नहीं है, फर्क इतना ही है कि बड़ों की समस्या छोटी होती है और छोटों की समस्या बड़ी। नाचीज बड़े लेखकों से मिला है, वे इतने बड़े निकले कि छोटे से मिल कर बड़बड़ाने लगे यानी उनका बड़प्पन का अहसास एक्टिव मोड में आ गया। संस्कृत के विद्वान् बड़बड़ाने को बड का यङन्त समझें। पहाड़ को देख कर ऊंट को अपने छोटे होने का अनुभव होता है इस कहावत का विलोम है ऊंट को देख कर पहाड़ अपने बड़प्पन की पुष्टि करता है। भक्ति के पुष्टिमार्ग से भिन्न इसे साहित्य का पुष्टिमार्ग कह सकते हैं।
मुद्दे पर लौटें। नाचीज ने कुछ लिखा, इस्लाह के लिए एक वरिष्ठ को दिया। वे प्रसन्न के साथ साथ अप्रसन्न भी हुए। प्रसन्न इसलिए कि मैंने उन्हें वरिष्ठ मानने का सम्मान दिया और अप्रसन्न इसलिए कि मैंने लेख का शीर्षक मन की बात लिखा था। कथ्य तो मानों उन्होंने ने पढ़ा ही नहीं, वे शीर्षक से ही बिफरे दिखे। तुम क्या प्रधानमन्त्री हो जो मन की बात कर रहे हो ! दरअसल वे समर्पित मोदी भक्त थे और बतर्ज ‘प्रभु को भजै सो प्रभु का होई’ वे मोदी जी के ही हो गए थे, मेरे बचे ही नहीं थे – मैं उन्हें अपना मानने की भ्रान्ति में था। भ्रान्तिभंग का यह दूसरा अनुभव था। पहला तब हुआ था जब स्व. प्रभाष जोशी के सतीप्रथा समर्थक होने का पता चला था। जोशी जी जनसत्ता समाचारपत्र के सम्पादक थे और जनसत्ता की जनसमर्थक छवि के अनुरूप मैं जोशी जी को भी प्रबुद्ध प्रगतिशील पत्रकार समझने के भ्रम में रमा रहा। अपने विश्वास वध में जोशी जी को देख कर शेक्सपियर के जूलियस सीजर का ‘You too, Brutus’ संवाद याद आया। जख्म और भी हैं, दर्द और न बढ़े लिहाजा लेख को बिना शीर्षक ही विराम दे रहा हूं।