एक ईएसआईसी मज़दूर की आपबीती

एक ईएसआईसी मज़दूर की आपबीती
May 06 11:05 2023

मेरा नाम छोटेलाल है। मज़दूर आदमी हूं। अचानक से मेरी बीबी को, रविवार, 16.04.23 को, पेट में दर्द हुआ। प्राइवेट हॉस्पिटल में ले जाने के लिए, मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं वहां ले जा सकूं, क्योंकि प्राइवेट हॉस्पिटल वाले जाते ही 20,000 रु जमा करने को कहते हैं। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे इसलिए मैं ई एस आई हॉस्पिटल में ले जाने के लिए जब साधन के लिए रोड पर गया तो कोई साधन नहीं मिला। और इधर बीबी का दर्द दुगुना होता जा रहा था। अब मैं क्या करूं, कैसे करूं? मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं। बच्चों को भी नहीं छोड़ सकता। बीबी बच्चों को गोद में उठाने लायक नहीं हूँ। साधन ना होने के कारण मैं अपनी साइकिल पर ले जाने को तैयार हुआ, लेकिन बीबी और बच्चों को साइकिल पर एडजस्ट नहीं कर पाया। पड़ोसी कहने लगे अरे, इतने दर्द में बीबी और बच्चों को कैसे ले जाएगा? कैसे संभालेगा? तू ओला-ऊबर क्यों नहीं मंगा लेता। लेकिन उसके लिए भी पैसे चाहिएं। रात में कितना किराया लेंगे, क्या मालूम? हमारी हालत देखकर उसने गाड़ी मंगाई और हम अस्पताल पहुच गए।

जब मैं हॉस्पिटल के इमरजेंसी के गेट पर पहुंचा, तो व्हीलचेयर लाने के लिए मुझे ओ पी डी के गेट पर जाना पड़ा। आई डी देनी पड़ी तब जाकर व्हीलचेयर मिली। डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर ने अपना काम किया, मेडिकेशन दिया। मरीज के ईलाज के पहले पेपर व्हीलचेयर पर ही छूट गए थे। जब दो बोतल देने और इंजेक्शन देने के बाद भी आराम नहीं हुआ तब डॉक्टर ने ब्लड टेस्ट कराने को कहा। जब मैंने कहा कि तब तक मेरी बीबी दर्द में ही रहेगी क्या? तो उन्होंने कहा, सैंपल आने के बाद ही हम कुछ कर सकते हैं। मैं सैंपल लेकर पहली मंजिल पर गया। एक सैंपल एक बजे मिला, दूसरा तीन बजे मिला। मैंने डॉक्टर के बिना पूछे कमरा नंबर 3 इमरजेंसी में काफी देर इंतज़ार करने के बाद बेड की व्यवस्था किया। बाद में रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर बोले, कमरा नंबर 3 में बेड खाली हो तो व्यवस्था कर लो। रात में 12 बजे से 3 बजे तक मेरी बीबी व्हीलचेयर पर ही रही। साथ में जाने वाले के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं। ईएसआई हॉस्पिटल में स्टाफ नहीं है, एंट्री के लिए पूरा दिन लग जाता है, बेड नहीं मिलते। दवाई के लिए लाइन लम्बी हो जाने की वजह से अगले दिन बुलाते हैं। दिहाड़ी पर दिहाड़ी खऱाब होती है। ईएसआई के पास इतना पैसा है। लाखों-करोड़ों मज़दूरों के वेतन से पैसा हर महीने कटता है फिर भी व्यवस्था क्यों नहीं होती?

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Mazdoor Morcha
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