फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बीते सप्ताह ईएसआईसी अस्पताल में डॉ. निशांत गुरनानी द्वारा सफल रोबोटिक सर्जरी करके मरीज की बेकार हो चुकी किडनी को निकालना वाकई एक प्रसंशनीय करिश्मा है। लेकिन यह बताना भी जरूरी है कि यह अपने किस्म का पहला सफल ऑपरेशन न होकर तीसरा है। यानी कि बीते एक वर्ष में ऐसे दो ऑपरेशन पहले भी हो चुके हैं। संदर्भवश, यह भी जान लेना जरूरी है कि उक्त रोबोट मशीन को इस अस्पताल में लाने का पूरा श्रेय पूर्व डीन डॉ. असीम दास को जाता है। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि 25 करोड़ की इस मशीन की खरीद में कॉर्पोरेशन की चवन्नी भी नहीं लगी। इसका सारा खर्च पावर ग्रिड से डॉक्टर दास द्वारा कराया गया था। इसके लिए डॉक्टर दास की सराहना करने की बजाय मुख्यालय में बैठे धूर्त उच्चाधिकारियों ने डॉ. दास की जवाब-तलबी तक कर डाली थी, जिसका माकूल जवाब पाकर मुख्यालय ठंडा हो गया। पावर ग्रिड ने इतनी कीमती मशीन यूं ही डॉक्टर दास के कहने पर नहीं दे दी थी। इसके पीछे की कहानी यह है कि कोरोना से ग्रस्त पावर ग्रिड कॉपोरेशन का एक वरिष्ठ अधिकारी इस अस्पताल में दाखिल हुआ था जो स्वस्थ होकर यहां से निकला था।
डॉक्टर दास की सेवा एवं कार्यशैली से प्रभावित होकर पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ने उन्हें दो करोड़ की इंट्रा ऑपरेटिव न्यूरो मॉनिटर नामक मशीन उपहार स्वरूप दिला दी। एक साल बाद जब पावर ग्रिड के अधिकारियों ने उस मशीन का सदुपयोग देखते हुए पाया कि इसके द्वारा न्यूरो सर्जिकल ऑपरेशन करके 150 मरीज़ों की जान बचाई जा चुकी है। इससे प्रभावित होकर पावर ग्रिड ने समझ लिया कि इस अस्पताल में दी जाने वाली किसी भी मशीन का पूरा-पूरा सदुपयोग हो पाएगा। इसके चलते उन्होंने डॉक्टर दास को उक्त रोबोट मशीन का ऑफर दिया जिसे उन्होंने तुरन्त लपक लिया। प्रस्तावित योजना के अनुसार यह दाविंसी नामक मशीन अमेरिका से आने वाली थी जिसमें मोदी के ‘मेक इन इन्डिया’ प्रोग्राम तथा मुख्यालय की अनिच्छा के चलते रुकावटें खड़ी कर दी गई। मजबूरन डॉक्टर दास ने ‘मेक इन इन्डिया’ प्रोग्राम के तहत बनी उक्त मशीन स्वीकार कर ली।
निर्माता कम्पनी से हुए समझौते के अनुसार एक की बजाय दो मशीनें तो ली ही गईं साथ में आगामी पांच वर्ष तक इनमें खर्च होने वाले लगभग पांच लाख रुपये का सामान भी कम्पनी देगी। इसके अलावा समय-समय पर मशीन को पांच साल तक मुफ्त अपडेट भी करेगी। दरअसल मुख्यालय में बैठे जनविरोधी हरामखोर अफसरों को तकलीफ इस बात से थी कि मशीन तो मुफ्त में आ गई लेकिन हर ऑपरेशन पर खर्च होने वाला 20 हजार का सामान तो कॉर्पोरेशन का ही लगेगा। मज़दूर पर खर्च करना कॉर्पोरेशन को कभी रास आता नहीं। संदर्भवश बताते चलें कि कॉर्पाेरेशन के किसी भी अस्पताल मेें ये मशीन नहीं हैं। जहां तक बात है डॉक्टर निशांत गुरनानी की तो उन्हें भी डॉक्टर दास ही चुनकर लाए थे। कॉर्पोरेशन द्वारा निर्मित मूर्खतापूर्ण नीतियों के अनुसार इस तरह के विशेषज्ञ डॉक्टरों को भर्ती करने की कोई व्यवस्था न होने के चलते डॉक्टर दास विशेष पैकेज पर लाए थे। विदित है कि इसी तरह के अनेक विशेषज्ञों को अब यहां से भगाया जा रहा है; ताज्जुब है कि डॉक्टर निशांत गुरनानी अब तक कैसे अटके हुए हैं?
समझने वाली एक बात यह भी है कि जिस डॉक्टर दास पर आज चंद लाख की बेईमानी के आरोप ढूंढे जा रहे हैं वहीं उन्होंने इस अस्पताल को तीस करोड़ से भी अधिक की मशीनें विभिन्न सीएसआर फंडों से दान कराई हैं। इसके विपरीत कार्पोरेशन के किसी भी अस्पताल मेें चवन्नी का भी दान देने की जरूरत किसी ने नहीं समझी, इसके बावजूद भी मुख्यालय में बैठे बेशर्मों को कोई शर्म नहीं आती। एक और मजेदार तथ्य यह है कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री खट्टर जिनके अधीन केंद्रीय बिजली मंत्रालय है वे ईएसआई को सात करोड़ का दान देना चाहते थे। लेकिन मुख्यालय में बैठे नालायक अधिकारियोंं को इस बात का ज्ञान नहीं था कि दान लिया कैसे जाए और इसकी औपचारिकताएं पूरी की जाए। मजबूरन कॉर्पाेरेशन ने फरीदाबाद के इस संस्थान से आग्रह किया कि वह इस दान को स्वीकार करके मुख्यालय की मर्जी मुताबिक अन्य संस्थानोंं पर खर्च कर दे।