ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में हड़ताल

ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में हड़ताल
February 11 14:22 2026

खर्च घटाने के चक्कर में कर्मचारियों के वेतन में भारी कटौती
फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) देश भर के चार करोड़ मज़दूरों के वेतन से चार प्रतिशत कटौती करके अपने खजाने में एक लाख 88 हजार करोड़ रुपए जमा करने वाला कॉर्पोरेशन उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं न देकर केवल अपने खजाने को अधिकाधिक भरने में जुटा है। उसे मज़दूरों के स्वास्थ एवं जिंदगी की अपेक्षा अपना खजाना अधिक प्रिय है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कॉर्पोरेशन ने यहां बतौर डीन एक ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया है जो उसके इशारों पर नाचते हुए हर वह काम करे जिससे अस्पताल का खर्च घटा-घटा कर दिल्ली के बसई दारा पुर वाले मेडिकल कॉलेज अस्पताल से भी कम नहीं तो बराबर तो आ ही जाए। विदित है कि वहां 600 बेड में से बमुश्किल आधे ही भड़े रहते हैं। जबकि यहां 600 बेड होने के बावजूद 900 से भी अधिक मरीज दाखिल रहते हैं। इतना ही नहीं दिल्ली, नोयडा, गाजियाबाद तक के मरीजों को भी इस अस्पताल में धकेल दिया जाता है।

कॉर्पोरेशन के इशारों पर डीन डॉ. कालिदास ने आते ही सबसे पहले वरिष्ठ एवं विशेषज्ञ महंगे डॉक्टरों को यहां से भगाया। दवाईयों की खरीद एवं आपूर्ति में भारी कटौती कर दी। अभी तक तो किसी दवा के उपलब्ध न होने पर काउंटर से ‘एनएÓ की मुहर मरीज के पर्चे पर लगा दी जाती थी। लेकिन अपनी इस कमी को छिपाने के लिए मुहर न लगाने का आदेश तमाम फार्मासिस्टों को दे दिया गया है। खर्च बचाने के चक्कर में मरीजों का खाना तक बंद करने में डीन को कतई कोई शर्म नहंी आई। यह सब तो मरीज झेल ही रहे थे लेकिन डीन बहादुर को इससे भी तसल्ली न हुई तो उन्होंने बड़ी डकैती मारते हुए सैंकड़ों कर्मचारियों के वेतन से आठ से दस हजार तक की कटौती कर डाली। तर्क यह दिया गया कि ये लोग ज्यादा वेतन खा रहे थे। इस कटौती का शिकार होने वाले तमाम कर्मचारी हाउसकीपिंग, पैरा मेडिकल, नर्सिंग आदि के वे कर्मचारी है जिन्हें ठेकेदारी में रखा गया है। वेतन मेंं कटौती के अलावा अनेकों ऐसे कर्मचारी भी हैं जिन्हें अभी तक वेतन मिला ही नहीं।

कॉर्पोरेशन की मज़दूर विरोधी नीति के चलते यहां नियमित भर्ती करने की अपेक्षा ठेकेदारी व्यवस्था में न केवल छोटे कर्मचारियों को बल्कि डॉक्टरों तक को भी इसी सिस्टम से रखा जाता है जो कि पूरी तरह से अवांछित है। इस प्रथा के अनुसार संस्थान को तीन ठेकेदारों द्वारा कर्मचारी उपलब्ध कराए जाते हैं। श्रम कानूनों के अनुसार प्रत्येक कर्मचारी को महीने की सात तारीख से पहले-पहले बिना किसी कटौती के वेतन मिल जाना चाहिए। इसके बाद ठेकेदार कॉर्पोरेशन को बिल देकर अपनी रकम वसूल करता है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कॉर्पोरेशन ने बिते पांच माह तक के बिलों का भुगतान ठेकेदारों को नहीं किया है। यह भी पता चला है कि इन ठेकेदारों को मात्र ढाई प्रतिशत बतौर सर्विस चार्ज मिलता है जबकि रेलवे जैसे महकमों में आठ प्रतिशत मिलता है। जाहिर है ऐसे में ठेकेदार भी अपना घर पूरा करने के लिए किसी भी तरह के घोटाले करने का मौका छोड़ते नहीं। इसके एवज में दफ्तर के बाबू भी उनके बिल पास करने के बदले अपना हिस्सा मांगते हैं, बस इसी चक्कर में पांच-पांच महीनों तक बिल अटके रहते हैं।

उपपलब्ध जानकारी के अनुसार, 12 दिसम्बर तक भी वेतन न मिलने से परेशान हुए सैकड़ों हाउस कीपिंग कर्मचारी, डीन के इस अवश्वासन पर कि शीघ्र ही उन्हें वेतन का भुगतान कर दिया जाएगा, सभी लोग काम पर लौट आए। यहां बड़ा प्रश्न यह उठता है कि सात तारीख से पहले वेतन दिए जाने का कानून तोडऩे का जिम्मेदार कौन है और उसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई? इस तरह का यह कोई पहला मामला नहीं है। इन कर्मचारियों के साथ अक्सर हर महीने ऐसा ही होता है और किसी के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती। इसीलिए मजबूरन इन मेहनतकश लोगों को हड़ताल जैसे हथियार का सहारा लेना पड़ा।

हड़ताल पर गए नर्सिंग व पैरा मेडिकल स्टाफ की खबर लिखे जाने तक जारी रही। सूत्रों के मुताबिक डीन ने उनकी तनख्वाह में कटौती किए जाने को गैर कानूनी माना है। यह कटौती कैसे और क्यों हुई इसकी जांच का काम उन्होंने उपने कुछ बड़े बाबुओं को सौंप दिया है। फिलहाल गतिरोध बना हुआ है। कुल मिला कर यह सारा मामला प्रशासनिक िशथिलता का है। जिसका खामियाजा मरीजों व कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है, डीन सहित किसी भी छोटे-बड़े बाबू की सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

डॉक्टर भी परेशान
डीन महोदय का नजला केवल छोटे कर्मचारियों एवं मरीजों पर ही नहीं डॉक्टरों पर भी पड़ रहा है। जो डॉक्टर एमबीबीएस छात्रों को पढ़ाने, मरीजों को देखने व रिसर्च आदि के अन्य जरूरी कामों के लिए नियुक्त किये गये हैं उन्हें ओपीडी में और फार्मेसी में तैनात कर दिया गया है। उनका मुख्य काम यह बताया गया है कि वह कहीं पर भी भीड़ एकत्रित न होने दें ताकि कोई पत्रकार फोटों न खींच ले और मरीजों को बहकाने, टरकाने के लिए अगले दिन आने का कह दिया करो। नए रेगुलर फार्मेसिस्टों के आने की वजह से ठेकेदारी पर चल रहे पुराने फार्मेसिस्टों को हटा दिया गया। लेकिन नव नियुक्तों को अभी काम की कोई समझ नहीं तो फार्मेकलोजी के डॉक्टरों को फार्मेसी में खड़े होकर दवाईयां बांटने पर लगा दिया है। इस तरह के वाहियात कामों में न केवल फार्मेकलोजी के बल्कि अन्य विभागों के डॉक्टरों को भी पेला जा रहा है। कुछ डॉक्टरों ने दबी जबान से डरते-डरते बताया कि उन्हें वेतन भी नियमित रूप से नहीं मिलता। पहली तारीख की बजाए 20 और कई बार तो 25 तारीख को मिल पाता है। लगता है डीन बहादुर इस संस्थान का बेड़ागर्क करने में कोई कसर छोडऩे नहीं चाहते।

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Mazdoor Morcha
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