मज़दूर मोर्चा ब्यूरो केन्द्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने 10 मेडिकल कॉलेज खोलने का एक बहुत बढिय़ा निर्णय तो लिया है परन्तु जिस गति एवं रणनीति से काम हो रहा है उससे तो ये कॉलेज 2025 में चालू होते नज़र नहीं आ रहे। कॉर्पोरेशन मुख्यालय में तैनात जिन कमिश्नरों से, मंत्री जी इन कॉलेजों को चलवाने की अपेक्षा रखते हैं, उनकी न तो कोई योग्यता है और न ही इच्छा-शक्ति। ये सभी अव्वल दर्जे के धूर्त हैं। मंत्री जी के सामने ये ना-नुकुर तो कर नहीं सकते लेकिन इनका पूरा प्रयास कॉलेज न खोलने का रहता है। इनका पूरा गिरोह हर उस अधिकारी की जडं़े काटने की फिराक में रहता है जो मेडिकल कॉलेजों को बनाने, चलाने व उन्हें उच्चतम शिखर की ओर ले जाने की बात करता है।
यदि मांडविया जी वास्तव में ही अपने इस सुहाने एवं मज़दूर हितैषी स्वप्न को साकार करना चाहते हैं तो मुख्यालय में बैठे इन धूर्त, अयोग्य एवं कामचोर अधिकारियों से मुख्यालय को मुक्त कराएं और इनके स्थान पर किसी योग्य एवं कर्मठ अधिकारी को तैनात करें। किसी भी मेडिकल कॉलेज को चलाने के लिए सर्वप्रथम एक डीन तथा एक एमएस (चिकित्सा अधीक्षक) का तैनात होना अति आवश्यक है। इसलिए मंत्री जी को चाहिए कि तुरन्त प्रभाव से प्रस्तावित सभी दस मेडिकल कॉलेजों में डीन व एमएस की नियुक्तियां करें।
यहां समझने वाली बात यह है कि मुख्यालय में तैनात धूर्त गिरोह कभी नहीं चाहेगा कि उनसे अधिक योग्य एवं कर्मठ लोग इन पदों पर नियुक्त हों। एमएस का पद तो वे कभी भी अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते और सारी वित्तीय शक्तियां भी उसी के पास रखना चाहते हैं। इसका दुष्परिणाम बसई दारापुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भली-भांति देखा जा सकता है। वहां डीन कुछ भी अच्छा करना चाहे तो एमएस करने नहीं देता। डीन द्वारा अस्पताल के लिए जरूरी समझे जाने वाले साजो-सामान यानी कोई भी खरीदारी को एमएस जरूरी न समझकर रोक देता है। इसके परिणामस्वरूप वहां न तो पर्याप्त उपकरण है और जो हैं भी उनका रख-रखाव नहीं हो पा रहा है, आवश्यक दवाएं आदि भी उपलब्ध नहीं रहती। इसी के चलते यहां आने वाले मरीज़ों की संख्या लगातार घटती गई है। इतना ही नहीं आने वाले मरीजों को फरीदाबाद अथवा अन्यत्र रेफर करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। यही समस्या $फरीदाबाद एवं सनत नगर (हैदराबाद) के मेडिकल कॉलेज भुगत चुके हैं। इन कॉलेजों का उद्धार तभी हो पाया जब वित्तीय शक्तियां एमएस से लेकर डीन को सौंपी गईं।
मुख्यालय के इन्हीं धूर्त अधिकारियों की दादागीरी के चलते मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया। काम चलाने के लिए रिटायर प्रो$फेसरों को ठेके पर नियुक्त करना पड़ रहा है। मंत्रीजी को इस बात का आभास होने पर, उन्होंने 19 दिसम्बर की कॉर्पोरेशन मीटिंग में पूछ ही लिया कि कितनी फैकल्टी नियमित है और कितनी ठेके पर? जवाब मिला कि मात्र 20 प्रतिशत ही नियमित है। कारण पूछे जाने पर धूर्त अधिकारियों ने लंगड़े-लूले जवाब देते हुए कहा कि योग्य व्यक्ति मिलते ही नहीं। इस पर मंत्री जी ने कहा कि जब तक नहीं मिलते, लगातार पदों को विज्ञापित करते रहा करो।
असल बात जो मंत्रीजी से छिपाई गई, वो यह है कि डिस्पेंसरी स्तर के डॉक्टर से कमिश्नर बने इन धूर्तों को इस बात का कोई ज्ञान ही नहीं है कि किसी भी संस्थान में फैकल्टी कैसे विकसित की जाती है और इसका क्या महत्व है? मुख्यालय के व्यवहार एवं बेहूदा सेवा-शर्तों के चलते कॉर्पोरेशन में तैनात फैकल्टी सदैव, अच्छा अवसर मिलने पर यहां से भागने की ताक में रहते हैं, यहां तक कि एसोसिएट प्रोफेसर एक रैंक नीचे यानी असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर जाने में भी भलाई समझते हैं। यदि सेवा शर्तें तथा मुख्यालय का व्यवहार ठीक रहा होता तो अब तक यहां असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर भर्ती हुए लोग प्रोफेसर के पद तक पहुंच जाते, तब यहां काम-चलाऊ तौर पर सेवा निवृत्त प्रोफेसरों को नियुक्त नहीं करना पड़ता। जाहिर है कि बुजुर्ग सेवा निवृत्त प्रोफेसर उतना काम तो नहीं ही कर सकते जितना कि युवा प्रोफेसर कर सकते हैं।
फैकल्टी को तंग करने का एक बड़ा हथियार मुख्यालय के पास तबादला नीति है। इसी नीति के चलते फैकल्टी के लोग नौकरी तक छोड़ जाते हैं। इन तबादलों को लेकर, समझा जाता है कि फैकल्टी व कार्पोरेशन के बीच करीब 200 केस कैट में चल रहे हैं। यानी कि दोनों पक्ष असली काम छोड़ कर मुकदमेबाज़ी में लगे हुए हैं। जाहिर है इससे चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव पडऩा तो तय है। परन्तु मुख्यालय के धूर्त अधिकारियों की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका अहंकार तो इसी बात से संतुष्ट रहता है कि प्रोफेसर स्तर के डॉक्टर उन जैसे डिस्पेंसरी स्तर के डॉक्टरों के दरवाजे पर आकर ज़लील होने को मजबूर हैं। बताया जाता है कि ये धूर्त अधिकारी प्रोफेसरों के साथ ढंग से बात तक नहीं करते।
केवल दस मेडिकल कॉलेज ही क्यों ज्यादा भी खोले जा सकते हैं, ईएसआई कवर्ड मज़दूरों की संख्या को देखते हुए इन दस कॉलेजों के अतिरिक्त कम से कम बीस कॉलेज और खोले जाने चाहिए। एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल की खास जरूरत तो गुडग़ांवा में ही है, जहां बीमाकृत मज़दूरों की संख्या दस लाख से भी अधिक है ऐसे ही अन्य स्थान और भी हैं जहां ऐसे मज़दूरों की संख्या चार लाख से भी अधिक है। मेडिकल कॉलेजों को खोलने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनके अस्पतालों का नियमित निरीक्षण नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) द्वारा समय समय पर होता रहता है। कमीशन द्वारा पकड़ी गई खामियों को दूर करना संस्थान द्वारा अनिवार्य होता है इसके अतिरिक्त इन संस्थानों में उच्च श्रेणी के पढऩे-पढ़ाने वाले डॉक्टर बतौर फैकल्टी तो उपलब्ध रहते ही हैं साथ में प्रशिक्षु डॉक्टरों के होने से मरीजों को बेहतर सेवाएं मिलती हैं। ऐसे संस्थनों में आधुनिकतम उपकरण व अन्य आवश्यक साजो सामान की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो जाती है।
फिलहाल, मंत्री जी तमाम अपने बड़े अस्पतालों में पीजी कोर्सेज शुरू कर सकते हैं। एमबीबीएस कोर्स शुरू करने के लिए जहां भारी भरकम इन्फ्रा स्ट्रक्चर की जरूरत होती है वहीं पीजी कोर्सेज के लिए केवल फैकल्टी के तौर कुछ प्रोफेसरों की ही जरूरत पड़ती है। प्रोफेसरों को उपलब्ध कराना कोई कठिन काम नहीं है, इस तरह के कोर्सेज शुरू करने से चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता में काफी बढ़ोत्तरी हो सकती है बशर्ते कि वहां के एमसस ऐसे न हों जैसे कि बसई दारापुर में रखे जाते रहे हैँ।
प्रस्तावित दस मेडिकल कॉलेजों में से अधिकतर में केवल पचास एमबीबीएस सीटों वाला रखने की चर्चा है। दरअसल, इस तरह का सुझाव उन धूर्त, कामचोर कमिश्नरों का ही समझा जाता है। एनएमसी नियमों के अनुसार दो सौ बिस्तरों वाले अस्पताल के साथ पचास सीटों वाला, चार सौ बिस्तरों वाले अस्पताल के साथ सौ सीटों वाला और छह सौ बिस्तरों वाले अस्पताल के साथ डेढ़ सौ सीटों वाला मेडिकल कॉलेज खोला जा सकता है। ऐसे में पचास सीटों वाला कॉलेज खोलने का कोई औचित्य नहीं है। इसमें तुरंत करने वाला काम केवल इतना है कि पर्याप्त मात्रा में फैकल्टी भती करने के साथ साथ आवश्यक उपकरण आदि उपलब्ध कराए जाएं। दूसरा बैच आने तक आवश्यक भवन आदि का निर्माण कार्य पूरा किया जा सकता है बशर्ते कि इसके लिए नीयत साफ हो और यह तभी संभव है जब मुख्यालय को धूर्त एवं कामचोर कमिशनरों से मुक्त करा लिया जाए।
जैसा कि मज़दूर मोर्चा विवरण सहित कई बार प्रकाशित कर चुका है कि कार्पोरेशन के दफ्तरों में स्टाफ की भारी कमी है। सभी श्रेणियों के खाली पदों की संख्या आठ हजार से अधिक है। अपनी सेवाओं का विस्तार करने के लिए कॉर्पोरेशन को इन तमाम रिक्त पदों को तुरंत भरने की आवश्यकता है। जाहिर है कि इन सारी कवायदों से मज़दूरों से वसूले गए भारी भरकम खजाने का सदुपयोग होने के साथ साथ अर्थ व्यवस्था को भी बल मिलेगा।
अपनी चिकित्सा सेवाओं को बेहतर करने के बाद कॉर्पोरेशन को कवरेज का दायरा भी बढ़ाना चाहिए। इसके लिए आय सीमा को भी बढ़ाया जा सकता है, दूसरे जो संस्थान कवरेज से बचते हैं उन्हें भी कानूनी तौर पर कवरेज के दायरे में लाया जाए। कवरेज के दायरे में आने को लोग तभी पसंद करेंगे जब सेवाएं बेहतर हों वरना लोग इससे बचने के उपाय सोचने के साथ साथ कॉर्पोरेशन को कोसेंगे। यदि श्रममंत्री मांडविया जी समझने का प्रयास करें तो ईएसआई नामक यह स्कीम इतनी बेहतरीन है कि इसके द्वारा देश की ज्यादा नहीं तो आधी आबादी को कवर किया जा सकता है। मजे की बात तो यह है कि इसमें सरकार का धेला भी खर्च नहीं होता, जिसका सुबूत आज स्पष्ट उपलब्ध है। करना केवल इतना है कि ईएसआई नामक इस स्कीम का दायरा धीरे धीरे बढ़ाते जाना है।