ईएसआई कार्ड की जांच के साथ-साथ इलाज भी जरूरी

ईएसआई कार्ड की जांच के साथ-साथ इलाज भी जरूरी
February 12 11:52 2026

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) समझा जाता है कि बेहतर इलाज पाने के लिए कुछ लोगों ने हेरा-फेरी करके ईएसआई कार्ड बनवा रखे हैं, अथवा कार्डों में अपने नाम चढ़वा रखे हैं। इसी संदेह के आधार पर ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रबन्धन ने प्रत्येक मरीज के कार्ड की जांच शुरू कर दी है। अभी तक ओपीडी पर्चा बनाते वक्त ही इस कार्ड की जांच होती थी। परन्तु अब किसी भी डॉक्टर अथवा जांच प्रयोगशाला के बाहर बैठे गार्ड भी ईएसआई कार्ड की जांच करने लगे हैं।

अमूमन एक बार ओपीडी पर्चा बनने के बाद मरीज अपना ईएसआई कार्ड साथ नहीं लाते, परन्तु बीते सप्ताह अचानक मरीजों को इस कार्ड के न दिखाने पर वापस घर भेज दिया गया। कुछ मरीज तो जो नियमित डायलिसिस कराने आते थे उन्हें कार्ड न होने के आधार पर वार्ड में ही न घुसने दिया गया। उन्हें यह कह कर लौटा दिया गया कि कार्ड लेकर आना तभी डायलिसिस होगा। यही काम प्रयोगशाला में सैम्पल देने आए मरीजों के साथ भी हुआ। इतना ही नहीं जो मरीज तमाम प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद, दवा लेने फॅॅार्मेसी काउंटरों पर पहुंचे तो उनके साथ भी यही सलूक हुआ। ईएसआईसी से इलाज पाने के लिए फर्जीवाड़ा करने का मतलब यह हुआ कि अंशदान तो करे कोई और उसका लाभ उठाए कोई और। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो फर्जीवाड़ा करने वाले ईएसआई अस्पताल पर अतिरिक्त एवं अवांछित बोझ बन कर असल हकदार के हक पर सेंधमारी करते हैं। इनकी रोकथाम करना तो बेशक जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर असल बीमित मज़दूरों को प्रताडि़त करना किसी तरह भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। जाहिर है कि ओपीडी पर्चा बनाते वक्त ईएसआई कार्ड की सही जांच करने के बाद, हर रोज व कदम-कदम पर जांच करना मरीजों को परेशान करने के अलावा कुछ भी नहीं है।

फर्जीवाड़ा तो रोक दिया, अच्छा किया, लेकिन अब अच्छा इलाज कब मिलेगा? बीते करीब पांच माह से विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी चल रही है। कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी व कैंसर विभाग से हटाए गए विशेषज्ञ डॉक्टरों के स्थान अभी तक रिक्त पड़े हैं। नेफ्रो तथा न्यूरो में तो कोई भी विशेषज्ञ डॉक्टर नजर नहीं आते। कैंसर में भी नाम मात्र को ही है। बोन मैरो ट्रांस्प्लांटेशन पिछले छ: महीने से पूरी तरह बंद है, कार्डियो में भी पहले की अपेक्षा आधे से भी कम काम हो रहा है। अन्य विभागों की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है। इस विषय को लेकर ‘मज़दूर मोर्चा’ व ट्रेड यूनियन संगठनों ने जब भी प्रबन्धन से बात की तो, यही बताया गया कि डॉक्टरों के पद विज्ञापित कर रखे हैं, जल्द ही नई भर्ती हो जाएगी। पता नहीं यह ‘जल्द’ कितने महीनों अथवा सालों में पूरी होगी?

फॉर्मेसी काउंटरों पर लम्बी लाइनों में खड़े रहने के बावजूद कुछ दवाएं मिल पाती हैं और कुछ नहीं। न मिलने वाली दवाओं के लिए ‘एनए’ शब्द की मोहर लगा दी जाती थी। लेकिन बीते दो सप्ताह से यह मोहर लगानी बंद कर दी गई है ताकि अस्पताल की कमी को कोई पकड़ न सके। विदित है कि अस्पताल में रेट कॉन्ट्रैक्ट (आरसी) के द्वारा अधिकतर प्रमुख दवाइयां बड़े पैमाने पर आती हैं लेकिन ये कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकतीं। इसलिए लोकल परचेज की आवश्यकता रहती है। जिसे आज-कल, खर्च बचाने के लिए बड़ी हद तक बंद कर रखा है। तमाम डॉक्टरों को भी हिदायत है कि वही दवाई लिखी जाए जो उनके स्टोर में उपलब्ध हो, मरीज ठीक हो या न हो। दवाओं के अलावा तमाम तरह की सर्जरी आदि के लिए भी विभिन्न तरह की वस्तुओं की लोकल परचेज पर भी पाबंदी होने के चलते सर्जरी के काम भी बाधित हो रहे हैं।

निलम्बन का दौर जारी है
फरीदाबाद व अलवर के मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों के निलम्बन व स्थानांतरण के बाद अब बसई दारापुर, कोलकाता व चेन्नई मेडिकल कॉलेजों के अधिकारियों को भी बीते सप्ताह निलम्बित कर दिया गया है। इनकी संख्या 20-25 तक बताई जाती है। इस हिसाब से अभी तक कुल डॉक्टर व अन्य अधिकारी मिला कर करीब 50 लोग निलम्बित हो चुके हैं। मजे की बात तो यह है कि खबर लिखे जाने तक किसी के विरुद्ध भी जांच कार्रवाई तो दूर आरोप-पत्र भी जारी नहीं किया जा सका है। लगता है कि मंत्री मांडविया तथा डीजी अशोक कुमार सिंह दोनों सठिया गए हैं। मंत्री का व्यवहार तो समझ में आता है क्योंकि उन्हें प्रशासनिक तौर-तरीकों एवं प्रक्रियाओं का ज्ञान नहीं होता। परन्तु आईएएस अशोक कुमार सिंह से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती।

किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को यह ज्ञान होना चाहिए कि जिस अधिकारी को भी निलम्बित किया जाता है उसे तीन माह तक बिना कोई काम कराए आधा तथा उसके बाद 90 प्रतिशत वेतन देना होता है। यदि उसके विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं होता तो उसे बहाल करने के साथ-साथ काटा गया सारा वेतन देना होता है। जाहिर है ऐसे में कोई भी समझदार प्रशासनिक अधिकारी किसी को तब तक निलम्बित नहीं करता जब तक उसके विरुद्ध पुख्ता सबूत न हों। मौजूदा मामलों में किसी के विरुद्ध कोई सबूत न होने के चलते अभी तक न किसी को आरोप-पत्र दिया गया है और इसके बिना जांच तो होनी ही क्या थी? जाहिर है मज़दूरों से वसूला गया पैसा कॉर्पोरेशन द्वारा अपनी इन मूर्खताओं पर बर्बाद किया जा रहा है। इतना ही नहीं ये पचासों मामले विभिन्न अदालतों में भी जाएंगे जिन पर कॉर्पोरेशन करोड़ों रुपया वकीलों पर खर्च करेगा।

फिजूल के कामों में लगे मंत्री मांडविया का कोई ध्यान उन 10 नए मेडिकल कॉलेजों पर नहीं है जिनमें एनएमसी के नियमों का उल्लंघन करते हुए 50-50 बच्चों को एमबीबीएस में दाखिला दे दिया गया। पहले से चल रहे कॉर्पोरेशन के इन अस्पतालों पर केवल मेडिकल कॉलेज का फट्टा लगा कर, एनएमसी के मना करने के बावजूद यहां कोर्स शुरू कर दिया गया। जिस मेडिकल कॉलेज में न तो प्रयोगशालाएं हो न एनाटॉमी कक्ष हो न ही क्लासरूम, लाइब्रेरी, हॉस्टल यानी कि कॉलेज नाम की कोई भी चीज़ न हो और केवल अस्पताल को ही मेडिकल कॉलेज बता देने से एमबीबीएस कोर्स की पढ़ाई नहीं हो सकती। और तो और सीटी स्कैन व एमआरआई जैसी छोटी-छोटी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं जो कि किसी भी मेडिकल कॉलेज की एक अनिवार्यता समझी गई है। यह न केवल बच्चों के साथ बल्कि पूरे देश के साथ धोखा है। उक्त10 मेडिकल कॉॅलेजों के अलावा मांडविया ने वर्ष 2026 में 10 और नए मेडिकल कॉलेज चालू करने की घोषणा कर रखी है। हालात बता रहे हैं कि उनकी भी यही दुर्दशा होने वाली है। मंत्री की काहिली का आलम तो यह है कि वर्ष 2024 की दीवाली पर मोदी से फरीदाबाद के मेडिकल कॉलेज अस्पताल के विस्तार का जो शिलान्यास कराया गया था उसका अभी तक कोई अता-पता नहीं है। यह सब तो तब है जब कॉर्पोरेशन के पास मज़दूरों से वसूला गया बेतहाशा धन व्यर्थ पड़ा है, उसे किसी से कोई स्वीकृति अथवा किसी प्रकार की सहायता की जरूरत नहीं। जरूरत है तो केवल जनहित में काम करने की इच्छाशक्ति।

बीमित महेन्द्र को निजी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा
महेन्द्र शर्मा बीते करीब डेढ़ साल से ईएसआईसी मेडिकल कॉलेेज अस्पताल में सप्ताह में तीन बार नियमित रूप से डायलिसिस कराते आ रहे हैं। विदित है कि किडनी द्वारा ठीक काम न किये जाने पर डायलिसिस प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ता है। बेशक टेक्नीशियनों द्वारा इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है लेकिन नेफ्रोलॉजिस्ट की निगरानी में। इस प्रक्रिया के दौरान समय-समय पर रोगी में कई प्रकार की समस्याओं के लक्षण प्रकट होने लगते हैं जिन्हें केवल विशेषज्ञ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉक्टर ही पहचान कर उसका इलाज कर सकता है। कुछ माह पूर्व तक जब यहां नेफ्रोलॉजिस्ट डॉक्टर डेनिस व एक अन्य विशेषज्ञ डॉक्टर ऐसे मरीजों की निगरानी करते थे तो समय-समय पर उठने वाली समस्याओं का समाधान तुरन्त हो जाया करता था। परन्तु जब से वेतन का खर्च बचाने के लिए इन विशेषज्ञ डॉक्टरों को यहां से भगा दिया गया है तब से ऐसे सभी मरीज तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं।

एक बीमित महेन्द्र शर्मा बीते करीब तीन-चार सप्ताह से किडनी सम्बन्धी अनेकों समस्याओं से परेशान चल रहे थे। नेफ्रोलॉजी में काम चलाऊ एवं डंग टपाऊ डॉक्टरों को शिकायत करने पर उन्हें कई टेस्ट कराने को कहा गया। बीते सप्ताह टेस्ट तो हो गए लेकिन उन्हें देखने वाला एवं इलाज करने वाला कोई डॉक्टर यहां मौजूद न होने के चलते, दिनांक 23 दिसम्बर को उन्होंने अपने खर्च पर क्यूआरजी नामक अस्पताल में दाखिल होना बेहतर समझा।

दूसरा मामला एक महिला का है वो यहां से नियमित डायलिसिस कराती थीं। उन्हें भी किडनी सम्बन्धी अनेक समस्याएं जब आने लगी तो वे इन काम चलाऊ डॉक्टरों के चक्कर काटती रह गईं। किसी निजी अस्पताल में जाने की अपेक्षा अचानक इमरजेंसी में वे बल्लभगढ़ के सरकारी अस्पताल में पहुंची और इलाज न मिल पाने की हालत में प्राणों से हाथ धो बैठीं। विदित है कि चोर कम्पनी द्वारा चलाए जा रहे इस मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मरीजों की जान बचाने से ज्यादा जरूरी खर्चा घटाना है। इसी क्रम में महंगे विशेषज्ञ डॉक्टरों को हटा कर वेतन का खर्चा बचाया जा रहा है, डायलिसिस के दौरान लगने वाले टीके मरीजों से ही खरीद कर लाने को कहा जाता है, उन्हें मिलने वाला भोजन भी बंद कर दिया गया था और तो और हर मरीज के लिए बेड पर बिछने वाली नई चादर भी बंद कर दी गई। डायलिसिस प्रक्रिया के दौरान कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जो एक से अधिक बार विभिन्न मरीजों के लिए दो से तीन बार तक इस्तेमाल की जा सकती हैं, बशर्ते कि उनका विधिवत शुद्धिकरण किया जाए। मिली जानकारी के अनुसार स्टाफ की कमी के चलते न तो इनका शुद्धिकरण सही ढंग से हो रहा है और न ही तीन बार के बाद नए लगाए जा रहे हैं, क्योंकि एकमात्र लक्ष्य तो खर्च घटाना है, मरीज मरते हैं तो मर जाएं। इसी नीति के चलते बीते पांच माह से अस्पताल में मरने वालों की दर लगातार बढ़ती जा रही है।

अस्पतालों में इलाज नहीं फिर भी रेफरल बिल घटा
बीमाकृत का सुपर-स्पेशलिटी ट्रीटमेंट (एसएसटी) कराना पूरी तरह से ईएसआई का दायित्व है। यदि कॉर्पोरेशन के अपने अस्पतालों में यह सम्भव न हो तो अन्य बड़े एम्पैनल्ड अस्पतालों को रेफर किया जाना चाहिए। यहां रेफर का मतलब यह नहीं कि सफदरजंग अथवा एम्स जैसे सरकारी अस्पतालों को रेफर कर दिया जाए, क्योंकि इन सरकारी अस्पतालों में जाने के लिए कॉर्पोरेशन की सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती। दूसरे, इन अस्पतालों में मरीजों की लाइन इतनी लम्बी होती है कि महीनों तो क्या वर्षों तक की तारीख दी जाती है। जैसे कि एम्स में एमआरआई कराने के लिए तीन साल बाद की तारीख दी जाती है। जाहिर है जब कॉर्पोरेशन ने मज़दूर से वसूली करके उसके इलाज का वायदा कर रखा है तो वह उसे सरकारी अस्पताल में धकेल कर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता। उसे एसएसटी के लिए निजी व्यापारिक अस्पतालों को रेफर करना होगा। लेकिन खर्चा बचाने के लिए कॉर्पोरेशन उसे इधर-उधर भटका कर अपना पल्ला झाडऩे का प्रयास करता है।

इस प्रयास का यह लाभ हुआ कि वर्ष 2022-23 में रेफरल पर जहां दो हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे वहीं वर्ष 23-24 में यह खर्च घट कर 1500 करोड़ रुपए रह गया यानी कि कॉर्पोरेशन ने सीधे-सीधे 500 करोड़ रुपये बचा लिए। इस बचत का खामियाजा उन गरीब मज़दूरों ने भुगता जिन्हें एसएसटी के लिए निजी अस्पतालों को रेफर नहीं किया गया। उसके बाद से यह खर्चा लगातार घटता ही जा रहा है जबकि बीमाकृत मज़दूरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इससे क्या समझा जाए? क्या मज़दूरों का स्वास्थ्य स्तर इतना बढ़ गया है कि उन्हें अब एसएसटी की जरूरत कम पडऩे लगी है अथवा यह समझा जाय कि कॉर्पोरेशन के अपने अस्पतालों में एसएसटी सेवाएं बड़े पैमाने पर दी जाने लगी हैं?

वास्तविकता तो यह है कि न तो स्वास्थ्य स्तर बढ़ा है और न ही कॉर्पोरेशन के तमाम अस्पतालों में एसएसटी सेवाएं उपलब्ध होने लगी हैं। केवल $फरीदाबाद व सनथ नगर (हैदराबाद) में ही कुछ हद तक एसएसटी सेवाएं देने का प्रयास किया गया था, जिस पर अब पूरी रोक लग गई है। कॉर्पोरेशन के अपने अस्पतालों की स्थिति यह है कि इनमें औसतन 30-40 प्रतिशत बिस्तर ही भरे रहते हैं क्योंकि इनमें इलाज की समुचित व्यवस्था न होने के चलते बीमाकृत अपना इलाज बाहर ही कराना बेहतर समझते हैं। कॉपोरेशन का गणित बड़ा स्पष्ट है मज़दूरो से वसूली तो बड़ा ठोक कर की जाती है और उनके इलाज पर खर्च करने के बजाय येन-केन-प्रकारेण अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है। इसी के चलते आज कॉर्पोरेशन के खजाने में एक लाख 82 हजार करोड़ से अधिक की राशि जमा है।

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Mazdoor Morcha
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