क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा दुर्गा भाभी महिला मोर्चा का पहला सम्मेलन रविवार 5 जनवरी को सामुदायिक भवन आज़ाद नगर सेक्टर 24 फऱीदाबाद में शानदार ढंग से सम्पन्न हुआ। सामुदायिक भवन को लाल झंडों तथा हमारे क्रांतिकारी अमर शहीदों के संदेशों वाले पोस्टरों से आकर्षक ढंग से सजाया गया था। शुरुआत ‘उमंग रंग मंच’ द्वारा प्रस्तुत क्रांतिकारी गीतों से हुई। कड़कड़ाती ठंड में गीतों और नारों ने आवश्यक गरमाहट लाते हुए समां बांध दिया। पलवल के डूंडसा गांव केे साथी कैलाश ने बुलंद आवाज़ में हरियाणवी रागनी गाकर महिला भ्रूण हत्या के गंभीर अपराध को निशाने पर लिया।
दुर्गा भाभी महिला मोर्चा’ के पहले सम्मेलन में अपनी गौरवशाली विरासत को ज़ारी रखने का संकल्प पत्र पारित : ‘सावित्रीबाई फुले-फ़ातिमा शेख़ की विरासत अमर रहे’ जाति, धर्म तथा लिंग आधारित भेदभाव व अन्याय के विरुद्ध, दृढ निश्चय और निडरता के साथ विद्रोह का झंडा बुलंद करने वालीं तथा ब्राह्मणवाद पर तीखा हमला बोलने वाली,वीरांगना, सावित्रीबाई फुले का जन्म, 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र में सातारा जि़ले के नायगांव में हुआ था. उसी मक़सद को समर्पित, वैसी ही निडर, उनकी सहयोद्धा, फ़ातिमा शेख़ का जन्म, उसी साल 9 जनवरी 1831 को पुणे के एक धनी परिवार में हुआ था. सावित्रीबाई फुले-फ़ातिमा शेख़ के योगदान को समझने-समझाने और उनसे प्रेरणा पाने के लिए, ‘दुर्गा भाभी महिला मोर्चा’ ने, हर साल, 3 से 9 जनवरी तक महिला मुक्ति की सूत्रधार, दोनों महान क्रांतिकारी महिलाओं का जन्म-सप्ताह मनाने का फ़ैसला लिया है.
सावित्रीबाई फुले की शादी महज 9 साल की उम्र में ज्योतिराव फुले से हुई. कभी स्कूल ना जा पाने और अशिक्षित होने के बावजूद सावित्रीबाई फुले कि़ताबों से बहुत प्यार करती थीं. सोचती थीं, ‘काश मैं भी जान पाती, इन पुस्तकों में क्या लिखा होता है’. कि़ताबों से उनका लगाव इतना था कि वे शादी के बाद जब वे अपनी ससुराल गईं , तो अपने साथ अपनी प्रिय एक कि़ताब भी ले गईं. उनके पति, ज्योतिराव को भी पढऩे का बड़ा चाव था. वे 7वीं कक्षा में थे, जब ब्राह्मणों ने उनके पिता गोविंद राव फुले को डांटा, ‘अपने बेटे को स्कूल से ले जाओ. शिक्षा हांसिल करना ब्राह्मणों का काम है, मालियों का नहीं, जाओ खेतों में बागबानी करो’!
ज्योतिराव, ब्राह्मणों के स्कूल से तो निकाल दिए गए लेकिन ‘ज्योतिराव पढऩा मत छोडऩा’, स्कूल इंस्पेक्टर गफ्फार की इस सलाह पर, उन्होंने इसाई मिशनरी स्कूल में दाखला लिया और ‘महान ज्योतिबा फुले’ बने. नवविवाहिता पत्नी के हाथ में कि़ताब देखकर, ज्योतिराव फुले समझ गए कि उनकी शिक्षा की हसरत दबी पड़ी है. उन्होंने सावित्रीबाई फुले को भरोसा दिलाया कि वे उन्हें पढाएंगे. उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पहले ख़ुद पढ़ाया और बाद में उनका दाखला अहमदनगर के एक इसाई मिशनरी स्कूल में करा दिया. स्कूली शिक्षा के बाद, सावित्रीबाई फुले ने अहमदनगर में ही ‘शिक्षक ट्रेनिंग कोर्स’ में दाखला लिया. इसी कोर्स में उनका परिचय फ़ातिमा शेख से हुआ और उनकी यह दोस्ती ऐतिहासिक बनी. सावित्रीबाई फुले अच्छी तरह जान चुकी थीं कि दबे-कुचले समाज को अपनी मुक्ति की लड़ाई लडऩी है, तो उन्हें शिक्षित होना होगा. अहमदनगर से अपनी शिक्षा और अध्यापक ट्रेनिंग लेने के बाद सावित्रीबाई फुले ने फ़ैसला किया कि वे बच्चों के ऐसे स्कूल खोलेंगी, जहां किसी भी जाति, धर्म के गऱीब बच्चे, ख़ासतौर पर बच्चियां भी पढ़ सकें, क्योंकि महिलाओं को शिक्षा का अवसर दिया ही नहीं जाता था. ब्राह्मणवाद को चुनौती देने के मक़सद से उन्होंने यह ऐलान भी किया कि उनका स्कूल ब्राह्मणों के गढ़ पुणे में ही खोला जाएगा.
सनातनी ब्राह्मणों ने समाज के सबसे मेहनतक़श तबक़े को अछूत बनाया हुआ था. महज़ 16 साल की उम्र में, 1847 में, सावित्रीबाई फुले ने, पुणे में महार जाति की अछूत कही जाने वाली बस्ती, ‘महारवाड़ा’ में अपना पहला स्कूल खोला. गऱीब और अछूत समझी जाने वाली जातियों के घरों की 40 बच्चियां स्कूल में पढऩे लगीं. फ़ातिमा शेख़ भी उनके स्कूल में पढ़ाने लगीं.
अगले साल, 1848 में उन्होंने पुणे की एक ऐसी ही दूसरी बस्ती, ‘भिड़ेवाड़ा’ में दूसरा स्कूल खोला. ब्राह्मणों में ख़लबली मच गई. ये लोग पढ़ गए, तो हमारे पाखंड और आडंबर का शिकंजा टूट जाएगा, यह सोच कर ब्राह्मणों के गैंग ने उन पर हर तरह से हमले किए. स्कूल जाते वक़्त,सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़ पर पत्थर ही नहीं बल्कि टट्टी भी फेंकी जाती थी. जितना अन्याय हुआ, सावित्रीबाई फुले का इरादा उतना ही पक्का हुआ. वे एक साड़ी अपने थैले में रखकर ले जाने लगीं. स्कूल पहुंचकर उन्हें अपनी साड़ी बदलनी पड़ती थी. सावित्रीबाई अपने रास्ते से हट जाने वाली महिला नहीं थीं.
1849 में सावित्रीबाई तथा फातिमा शेख के स्कूल पुणे के ब्राह्मणवादी गैंग ने बंद करा दिए, तब फ़ातिमा शेख़ ने अपने घर का एक हिस्सा स्कूल खोलने के लिए दे दिया. मुस्लिम समाज के कट्टरवादियों के विरोध के बावजूद फ़ातिमा शेख के भाई, मियां उस्मान शेख ने उनका साथ दिया.
गऱीबों वंचितों के लिए शिक्षा के अलावा सावित्रीबाई फुले ने विधवाओं को इंसानी जि़न्दगी दिलाने और स्त्री भ्रूण को मार डालने का विरोध करने के लिए ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ भी खोला. ब्राह्मण महिला, केशुबाई अविवाहित माँ बन गई थीं. सावित्रीबाई ने उन्हें आत्म हत्या करने से रोका तथा उनके बच्चे यशवंत को गोद लिया. उन्होंने फ़ातिमा शेख़ के साथ मिलकर ‘महिला सेवा मंडल’ भी खोले. 1897 में पुणे में भयानक प्लेग की महामारी फ़ैली. महारवाड़ा के एक गऱीब मरीज़ बच्चे को अस्पताल ले जाते वक़्त सावित्रीबाई फुले प्लेग की चपेट में आ गईं. 10 मार्च 1897 को उन्होंने अंतिम साँस ली.
सावित्रीबाई फुले ने कुल 5 स्कूल खोले और मुस्लिम समाज की पहली शिक्षिका फ़ातिमा शेख ने उन सब में पढ़ाया. उनके जाने के बाद से, 9 अक्टूबर 1900 में आखऱी साँस तक, फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई फुले के मिशन को ज़ारी रखते हुए, बॉम्बे में भी स्कूल खोले. ‘दुर्गा भाभी महिला मोर्चा’, अपनी महान योद्धाओं के मिशन को ज़ारी रखने का अहद लेते हुए, उन्हें सादर नमन करता है.
‘पूंजी से मुक्ति के बगैर, महिला मुक्ति महज़ एक सपना है’ साथियों, मैं ख़ूब पढऩा चाहती थी. डॉक्टर बनना चाहती थी. पिताजी भी हमें पढ़ाना चाहते थे. फिर क्यों नहीं पढ़ पाए? क्या मात्र इच्छा होने से कोई पढ़ पाता है. पढऩे की हैसियत होनी चाहिए. हमारी नहीं थी. हर मज़दूर, अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है. कौन चाहेगा कि उसका लाड़ला मासूम, स्कूल नहीं, बल्कि लेबर चौक जाए!! स्कूल जाने की उम्र के अपने लाड़लों को काम पर जाते देख, माँ-बाप पर क्या गुजरती है, वे ही जानते हैं. यह दर्द बयान नहीं हो सकता. स्कूल जाने वाले कुल बच्चों में से, आधे बच्चे भी कॉलेज नहीं जा पाते. बच्चियों की तो और बुरी हालत है. मज़दूरों मेहनतक़शों के बच्चे शिक्षा से दूर जा चुके हैं, इसका जि़म्मेदार पूंजीवाद है. बच्चियां, बच्चों से भी कम पढ पाती हैं, इसके लिए पित्र सत्ता जनित सोच जि़म्मेदार है, जिसके तहत महिलाओं को पुरुषों से कम समझा जाता है. इसका मतलब हुआ कि महिलाओं को पूंजीवादी शोषण के अलावा मर्दवादी दमन भी झेलना पड़ता है. वे पुरुषों से ज्यादा शोषित हैं. समाजवादी क्रांति के लिए हमारी जि़म्मेदारी पुरुषों से ज्यादा है.
बड़े लोगों के घरों में जितने बड़े बाथ रूम होते हैं, उतनी जगह में हमारे पूरे घर होते हैं. हमारे इन छोटे से झोंपड़ीनुमा घरों में थोड़ी भी प्राइवेसी संभव नहीं. हमारी बस्ती, देश की प्रमुख रेलवे लाइन के साथ लगी हुई है. हर 10 मिनट में तीखी आवाज़ में सीटी मारती हुईं तेज़ रफ़्तार गाडिय़ाँ गुजरती हैं. देश के हुक्मरान, जो हम गरीबों के लिए घडिय़ाली आंसू बहाते हैं, यहां एक दिन नहीं सो सकते. इन झोंपडिय़ों को भी अवैध बताकर हमें हर रोज़ ज़लील किया जाता है. हमें रहने के लिए इंसानों जैसे घर नहीं,सुकून नहीं, प्राइवेसी नहीं. दूसरी ओर कारखानेदार जो कुछ नहीं करते .