फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) आयुष्मान और चिरायु के मुफ़्त इलाज के ढिंढोरे की आड़ में सरकारी अस्पतालों में दी जाने वाली चिकित्सा सेवाएं धीरे धीरे समाप्त करने की मोदी-खट्टर-सैनी सरकारों की जनविरोधी नीतियां सामने आने लगी हैं। सरकार के इस ढोंग की चोट हृदय, मधुमेह, किडनी रोग के मरीजों पर पड़ी है क्योंकि इनका इलाज लंबा चलता है लेकिन इमरजेंसी परिस्थितियां छोड़ कर उन्हें भर्ती नहीं किया जाता। आयुष्मान, चिरायु का लाभ लेने के लिए मरीज को कम से कम तीन दिन भर्ती होना जरूरी है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आयुष्मान भारत योजना लागू किए जाने से पहले सरकारी अस्पतालों में हृदयरोगियों का इलाज पांच रुपये के पर्चे पर होता था। सरकारी अस्पताल में पचास रुपये में ईसीजी तो दो सौ रुपये में ईको डॉप्लर जांच होती थी। दवाएं भी अस्पताल से मुफ़्त मिलती थीं और पांच रुपये का पर्चा एक महीने काम आता था। सितंबर 2018 में मोदी ने आयुष्मान भारत योजना का ढिंढोरा पीटा और गरीब परिवारों को पांच लाख रुपये तक मुफ़्त इलाज देने का राग अलापा गया। इसकी आड़ में सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा सेवाएं घटाई जाने लगीं।
बीके अस्पताल में हृदयरोगियों के लिए निजी कंपनी की कैथलैब खुलवाई गई, तब तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने कहा था कि गरीबों को मुफ्त इलाज मिलेगा। उस समय बीके में हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. नवीन गर्ग तैनात थे और पचास रुपये में ईसीजी व दो सौ रुपये में ईको डॉप्लर जांच की सुविधा उपलब्ध थी। डॉॅ. गर्ग के कारण निजी कैथ लैब मेंं मरीज नहीं जा रहे थे, उसकी दुकान फीकी पड़ रही थी। इस पर फरवरी 2020 मेें डॉ. गर्ग को पलवल के सरकारी अस्पताल भेज दिया गया। उनके जाते ही बीके में ईसीजी, ईको जांचें बंद कर दी गईं। उनके तबादले के बाद करीब पांच लाख रुपये कीमत वाली ईको डॉप्लर जांच मशीन भी ताले में बंद कर दी गई जो चार साल में इस्तेमाल नहीं किए जाने और अपडेट नहीं होने के कारण कूड़े में तब्दील होने की कगार पर है।
अब मरीज को कैथ लैब में बैठे हृदय विशेषज्ञ को दिखाने के लिए 116 रुपये की पर्ची कटानी पड़ती है जो केवल तीन दिन तक काम करती है, तीन दिन बाद दिखाना है तो पर्ची फिर पर्ची कटानी पड़ेगी। पचास रुपये में होने वाली ईसीजी दो सौ रुपये और दो सौ रुपये वाली ईको डॉप्लर जांच के लिए एक हज़ार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। बीके अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार यहां प्रतिदिन ओपीडी में करीब ढाई हज़ार मरीज़ आते हैं, इनमें से करीब सवा दो सौ हृदयरोगी होते हैं, जिन्हें परामर्श और जांच कराने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है। यहां गरीब हृदयरोगियों के लिए आयुष्मान और चिरायु योजना बेकार साबित होती है। उन्हें मुफ्त इलाज की सुविधा तब ही मिलेगी जब वह भर्ती हों, ईसीजी, ईको जांच के लिए भर्ती होना जरूरी नहीं इसलिए हज़ार रुपये खर्च करने ही पड़ते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता सतीश चोपड़ा का कहना है कि बीके में जांच की सारी मशीनें और सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन हृदयरोग विशेषज्ञ के खाली पद नहीं भरे जा रहे। उन्होंने सरकार से मांग की है कि हृदयरोग विशेषज्ञों की तैनाती की जाए ताकि गरीब हृदयरोगियों के साथ आम जनता को सस्ते इलाज की सुविधा उपलब्ध हो सके।