फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) एनएच तीन स्थित ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल बीमाकृत मजदूरों को चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने का एक अच्छा केंद्र बनने की ओर अग्रसर था कि अगस्त 2025 में कॉरपोरेशन मुख्यालय ने इसका सत्यनाश करने का ठेका डॉ. कालीदास दत्तात्रेय को देकर बतौर डीन यहां तैनात कर दिया। समझ जाता है कि डीन को मौखिक आदेश दिए गए हैं कि वे इस अस्पताल का खर्चा, जो अभी तक लगभग 600 करोड़ वार्षिक है, घटाकर बसई दारापुर वाले अस्पताल के बराबर यानी करीब तीन सौ करोड़ पर ले आएं।
अपने आकाओं के हुक्म पर डॉ. कालिदास खर्चा घटाने के लिए हर तरह के प्रयास करने में जुटे हुए हैं। कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी, ऑन्कोलॉजी आदि में जो विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात थे, उनमें अधिकतर की छुट्टी करके वेतन पर होने वाला खर्च काफी घटा दिया। जो एसआर (सीनियर रेजिडेंट) तीन वर्ष के लिए नियुक्त किए जाते थे, अब उन्हें तीन-तीन माह के लिए तैनात किया जा रहा है और पुराने एसआर को समय से पहले नौकरी से हटाया जा रहा है। ये कमीनापन इसलिए किया गया ताकि महिला एसआर को छह माह के मातृत्व अवकाश का वेतन न देना पड़े। सिक्योरिटी गार्ड व नर्सिंग स्टाफ के कर्मचारियों को काम से निकाला जा रहा है। नर्सों को तो यह कहकर निकाला जा रहा है कि रेग्युलर भर्ती हो चुके लोगों को यहां लाया जा रहा है, जबकि रेग्युलर कोई आया नहीं और ठेकेदारी में काम कर रहे लोगों को भगाया जा रहा है।
जब डॉक्टरों व स्टाफ को घटाया जा रहा हो तो मरीजों की संख्या भी घटानी जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कि मरीजों को अच्छे डॉक्टर व दवाएं व समुचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिलें, तो मरीज यहां क्या करने आएंगे? लिहाजा ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या जो पहले 4500 से ऊपर जाया करती थी, अब लगभग साढ़े तीन हजार से नीचे ही रह जाती है। बेड ऑक्यूपेंसी (भर्ती मरीजों की संख्या) जो पहले 85 प्रतिशत तक होती थी, अब घटकर 68 प्रतिशत तक ही रह गई है और जिस तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, शीघ्र ही 50 प्रतिशत से भी नीचे आ जाएगी, जो कि बसई दारापुर के बराबर होगी।मरीजों को दूर भगाने के लिए किए जा रहे उपायों के उदाहरण स्वरूप 75 वर्षीय बुजुर्ग श्याम बिहारी के मामले को देखा जा सकता है। इनके कूल्हे की हड्डी टूटने पर दिनांक 23 फरवरी 2026 को भर्ती कराया गया था, लेकिन सर्जरी के लिए आवश्यक इम्प्लांट उपलब्ध न होने के चलते दिनांक छह मार्च को यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया गया कि जब इम्प्लांट आ जाएगा तब बुला लेंगे। जाहिर है इम्प्लांट आना नहीं और मरीज अपना इलाज बाहर कहीं न कहीं से तो करा ही लेगा। बच गए न अस्पताल के लाखों रुपये ! इसी तरह राजेंंद्र नामक एक हृदय रोगी जब इस अस्पताल में आया तो एंजियोग्राफी करने की तारीख जून महीने की दी गई। ऐसे ही एक मरीज को होल्टर मॉनिटर लगाने के लिए भी जुलाई माह की तारीख दी गई। होल्टर मॉनिटर एक ऐसी मशीन होती है जिसे मरीज की बांह पर चौबीस घंटे के लिए बांध दिया जाता है। इस दौरान मशीन मरीज की हृदय गति व ईसीजी आदि के तमाम उतार-चढ़ाव को रिकॉर्ड करती है। इस मशीन की कीमत चार-पांच लाख बताई जाती है। है न ताज्जुब की बात कि इस छोटे से काम के लिए मरीजों को इतनी लंबी-लंबी तारीखें दी जा रही हैं। जाहिर है ये सब हथकंडे मरीजों को यहां से दूर भगाने के लिए किए जा रहे हैं, पैसे तो इनके वेतन से वसूल हो ही जाते हैं, इलाज देने की क्या जरूरत है।
जब अस्पताल में मरीज भर्ती ही कम होंगे तो हर तरह के स्टाफ की आवश्यकता भी कम ही रहेगी। इतना ही नहीं, मरीजों के खाने-खुराक पर होने वाला खर्च भी बचेगा ही तथा लॉन्ड्री में चादरें व कपड़े आदि की धुलाई पर होने वाला खर्चा भी घटेगा। डॉ. कालिदास की बदनीयती तो पिछले दिनों तब देखने में आई थी जब इन्होंने डे-केयर में भर्ती होने वाले मरीजों का खाना बंद कर दिया था, डायलिसिस वाले मरीजों को आवश्यकता पडऩे पर लगने वाले इंजेक्शन अपनी ओर से लगाने की बजाय मरीजों को ही बाहर से खरीदकर लाने को कहा था। यहां तक कि डायलिसिस टेबल पर मरीज को लिटाने से पहले बिछाई जाने वाली पेपर शीट बिछानी ही बंद कर दी थी। उपलब्ध सूचना के अनुसार लैबोरेट्री में किए जाने वाले टेस्टों में इस्तेमाल होने वाले आवश्यक रिएजेंट भी खरीदने आजकल बंद कर रखे हैं। टेस्ट के लिए आने वाले मरीजों को जब दो-चार चक्कर काटने पड़ते हैं तो वे बाहर से ही प्राइवेटली टेस्ट कराना बेहतर समझते हैं क्योंकि बार-बार चक्कर काटने पर उनकी दिहाड़ी टूटती है। मजदूर मोर्चा का यह प्रयास है कि बीमाकृत मजदूर जब अपने इलाज के लिए कारपोरेशन को नियमित भुगतान करते हैं तो इलाज पाने को अपना हक समझकर संघर्ष के लिए उतरें। भागने से काम नहीं चलेगा। चोर कम्पनी बन चुकी इस कारपोरेशन को सही ढंग से रास्ते पर लाने के लिए मजदूरों को संघर्ष पर उतरना ही पड़ेगा। कहावत भी है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते।