फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भाजपा की जुमलेबाजी परंपरा के नए घोषणावीर नायब सैनी ने बीते सोमवार बजट सत्र में फरीदाबाद में बीते कई वर्षों से अधूरी पड़ी परियोजनाएं पूरी कराने का झुनझुना बजाया। सैनी ने घोषणा तो कर दी लेकिन बजट में इन परियोजनाओं के लिए धन का कोई प्रावधान नहीं किया गया। झूठ के पकौड़े बनाने में कुछ लगता नहीं तो समझा जा सकता है कि बिना धन के ये सारी परियोजनाएं पूरी नहीं होने वाली, हां गोदी मीडिया ने जरूर सीएम की तरह ही जनता को मूूर्ख बनाने के लिए घोषणा का जमकर गुणगान किया।
सीएम सैनी को इन अधूरी योजनाओं को पूरा कराने के बजाय इन परियोजनाओं में हुई लूट मार की जांच कराने की घोषणा करनी चाहिए थी। उनकी सरकार में इसी सदन में नियंत्रक एवं लेखापरीक्षक कैग की रिपोर्ट भी रखी गई जिसमें फरीदाबाद में करीब 2600 करोड़ की परियोजनाओं में वित्तीय अनियमितता सहित अन्य गड़बडिय़ों का किया जाना पाया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुमलेबाजी और नाकामी का अहम उदाहरण बनी स्मार्ट सिटी योजना दो दो बार बढ़ाए जाने के बाद बंद होने के कगार पर है लेकिन इसका कोई भी प्रोजेक्ट आज तक पूरा नहीं हुआ। शहर की जलापूर्ति व्यवस्था को स्काडा तकनीक से लैस करना हो या सीसीटीवी कैमरे लगाने और उनके लिए आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बनाने की परियोजना हो, सब में बेतहाशा धन लुटाया गया लेकिन आज तक उपलब्ध कुछ नहीं हुआ।
बडख़ल पुल से बाईपास रोड तक बनाई गई स्मार्ट रोड के नाम पर सैकड़ों बेशकीमती पेड़ काट डाले गए, स्मार्ट रोड में जल निकासी की व्यवस्था नहीं की गई, बरसात के मौसम में सड़क पर दो दो फीट तक पानी भरता है जो घंटो नहीं निकलता। साइकिल ट्रैक गायब है, सेंट्रल वर्ज की रेलिंग भी आधी अधूरी लगाई गई। दूसरी स्मार्ट सड़क का कुछ अता पता नहीं है। ओल्ड फरीदाबाद मार्केट की स्मार्ट पार्किंग बनाने में कई साल लगाए, परियोजना की लागत दोगुनी हो गई, तैयार होने के कई साल बाद भी इसमें वाहनों की पार्किंग नहीं शुरू कराई जा सकी। कारण सब जानते हैं कि केन्द्रीय मंत्री गूजर के भाई भतीजों की अवैध पार्किग और लूट कमाई का धंधा चलता रहे, इसलिए यह पार्किग नहीं शुरू कराई जा रही। बिना इस्तेमाल के इमारत में टूट फूट भी शुरू हो गई है। वारंटी पीरियड पूरा होने के कारण मरम्मत की जिम्मेदारी भी ठेकेदार की नहीं रही। वैसे भी स्मार्ट सिटी की सारी परियोजनाएं जनता के हित से ज्यादा लूट कमाई के लिए ही बनाई गई लगती हैं, ऐसे में इनको पूरा करने के नाम पर दोबारा धन देना पैसे की बर्बादी ही होगी।
बताया जा रहा है कि शहर के तीन अंडरपासों में जलभराव का स्थायी समाधान किया जाएगा। दरअसल ये तीनों अंडरपास सरकार और प्रशासन की हरामखोरी-मक्कारी का बेहतरीन नमूना हैं। कोई भी अंडरपास बनाते समय बरसात में होने वाले जलभराव और उसकी निकासी की पक्की व्यवस्था की जाती है। जुमलेबाजों की सरकारों मेंं हरामखोर और भ्रष्ट अधिकारियों ने आधे अधूरे अंडरपास बनवा कर रक्षा उपायों की रकम की बंदरबांट कर डाली। नतीजा सामने है हर बरसात में अंडरपास ऊपर तक पानी से भरते हैं, और पानी निकाले जाने की व्यवस्था न होने से हफ्तों बंद रखे जाते हैं। ओल्ड फरीदाबाद के अंडरपास में भरे पानी में कार डूबने से दो बैंक कर्मियों की जान चली गई तब भी जलनिकासी का स्थायी समाधान करने के बजाय निकम्मे अधिकारियों ने बैरिकेडिंग करवा कर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। यह सब मोदी के राज में ही मुमकिन है। उनके चेले सैनी के राज में भी स्थायी समाधान होता नहीं दिख रहा क्योंकि न तो ऐसा करने की नीयत है न ही बुद्धि।
संघ-भाजपा में रहकर बेशर्मी सीखे सीएम सैनी अधूरी परियोजनाएं तो बाद में पूरी करवा लें पहले उनके पूर्व सीएम खट्टर और पीएम मोदी द्वारा पलवल मैट्रो, गुडग़ांव मैट्रो की गई जुमलेबाजियों को अमली जामा पहनाएं। मैट्रो तो छोडि़ए आम आदमी और दिहाड़ी कामगारों की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनें ही पूरी चलवा दें। कोविड की आड़ में आपने पहले तो लोकल ट्रेनें बंद कर आधी अधूरी चलाईं तो उनका किराया तीन गुना कर दिया। कोविड समाप्त हुए चार साल से अधिक का समय बीत चुका है लेकिन बंद की गईं सारी लोकल ट्रेनें बहाल नहीं की गईं। अब रैपिड रेल का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, जानकार कहते हैं कि इसमें मासिक सीजन टिकट नहीं चलेगा और टिकट भी मैट्रो ट्रेन की तर्ज पर काफी महंगा होगा। रैपिड रेल को सफल बनाने के लिए सरकार बची खुची लोकल ट्रेनों की भी बलि चढ़ा देगी। मोदी सरकार जनकल्याण के लिए नहीं जनता की जेब काटने वाली परियोजनाएं ही बना रही है।
दूसरी सरकारों के विकास कार्यों का फीता काट कर अपने नाम करवाने वाले भाजपाई बारह साल मे मंझावली पुल नहीं चला पाए। एफएनजी का ढिंढोरा बीते पांच-छह साल से गाहे बगाहे बजाया जाता रहता है। बाटा पुल के गड्ढे तो सरकार पिछले पांच साल में भरवा नहीं सकी। पहले बाटा पुल की स्थायी मरम्मत ही करा लो इसके बाद मंझावली पुल, एफएनजी, एलिवेटेड रोड की सोचना। केवल लूट कमाई के लिए बनाई गई बडख़ल झील परियोजना करीब दस साल में भी पूरी नहीं हो सकी है। इस परियोजना पर 120 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं। घटिया निर्माण सामग्री के कारण उद्घाटन से पहले ही रैंप, सीढिय़ों के पत्थर टूटने लगे हैं, प्लेटफार्म कई बार धंस चुका है। अब परियोजना को अंतिम रूप देने के लिए अलग से करोड़ों रुपये खर्च करने का प्लान बनाया जा रहा है। बीते दिनों झील से जलकुंभी निकालने के नाम पर करीब 25 लाख रुपये की बंदरबांट हो गई। ठेका कंपनी का दावा है कि उसने जलकुंभी साफ की और बाद में वह फिर पनप गई। बहाना यह कि जलकुंभी का यदि एक भी बीज बच जाए तो वह कुछ ही दिनों में फिर से पूरी झील में छा जाती है। लगता है जलकुंभी लाई ही इसलिए गई है कि अधिकारियों की स्थायी ऊपरी कमाई की व्यवस्था हो जाए, सफाई के नाम पर लाखों के बिल फटेंं और नेता-अधिकारी में बंदरबांट हो जाए।
हर साल सौ मेडिकल कॉलेज खोलने का ढिंढोरा पीटने वाले पीएम मोदी और उनके चेले खट्टर-सैनी आज तक मेडिकल कॉलेजों के लिए जमीन तक नहीं तलाश सके, जहां जमीन मिल भी गई तो शिलान्यास के बाद आज तक काम शुरू नहीं हुआ। और जो कॉलेज चालू कर भी दिए गए, उन्हें कॉलेज कहना ही इस शब्द की तौहीन करने से कम नहीं क्योंकि इनमें कॉलेज वाली एक भी बात नहीं है। जो मेडिकल कॉलेज पहले से चल रहे थे उन्हें भी बर्बाद किया जा रहा है। छांयसा का अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज सिर्फ डिग्री बेचने वाला संस्थान बन कर रह गया है, यहां न तो फैकल्टी है, न साजो सामान, ओपीडी-आईपीडी की हालत खस्ता है। छात्रों के लिए हॉस्टल तक नहीं। शहर का सबसे बड़ा बीके अस्पताल रेफर सेंटर साबित हो रहा है, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और शहरी स्वास्थ्य केंद्र स्टाफ और आधारभूत सुविधाओं के अभाव में रेंग रहे हैं प्राथमिक उपचार के नाम इक्का दुक्का में टीकाकरण, मरहम पट्टी, दर्द बुखार की दवा के अलावा कोई इलाज नहीं है।
सीएम सैनी बल्लभगढ़ मेें कैथलैब की बात तो कर रहे हैं लेकिन बजट में इसके लिए राशि नहीं रखी। एक कैथलैब तीस से चालीस लाख में आती है, उसे चलाने के लिए पांच लाख का कार्डियोलॉजिस्ट चाहिए, ट्रेंड स्टाफ के वेतन पर भी चालीस लाख रुपये खर्च होंगे, इसके अलावा एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी में इस्तेमाल होने वाले सामान का खर्च अलग। जाहिर है कि सीएम सैनी इसे भी अपने किसी संघी चहेते को पीपीपी मोड पर देंगे, जैसे कि बीके मे हार्ट सेंटर दिया गया था। समझने वाली बात यह है कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के तहत नागरिकों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन जनता को लूटने के लिए पीपीपी मोड पर स्वास्थ्य सेवाएं प्राइवेट हाथों में सौंपी जा रही हैं। सीएम सैनी में जरा भी शर्म है तो पहले सरकारी अस्पताल ही ठीक से चलवा दें, फिर अधूरी परियोजनाओं की सोचें