फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) छांयसा स्थित गोल्ड फील्ड नामक मेडिकल कॉलेज के फेल हो जाने पर करीब पांच साल पूर्व हरियाणा सरकार ने इसे अपने कब्जे में ले लिया था। इसके एवज़ में प्रबन्धकों द्वारा बैंक से लिए गए 129 करोड़ रुपए का भुगतान हरियाणा सरकार ने कर दिया था। करीब तीन साल तक संस्थान को बंद रख कर बर्बाद करने के बाद हरियाणा सरकार ने 2022 में इसे चालू किया। इस वर्ष यहां एमबीबीएस का तीसरा बैच आ चुका है। शायद ही कोई सरकारी मेडिकल कॉलेज ऐसा हो जिसके साथ चालू अस्पताल न हो। किसी भी मेडिकल कॉलेज को शुरू करने की अनुमति तभी मिलती है जब उसके साथ जुड़े अस्पताल में ओपीडी व आईपीडी यानी वार्डों में मरीज़ इलाज के लिए दाखिल हों। यहां पर अस्पताल की बिल्डिंग तो है जिसमें कभी 800-900 मरीज़ ओपीडी में तथा 200-250 मरीज़ वार्डों में दाखिल रहा करते थे, जो आज ओपीडी में 100 के लगभग आते हैं तथा आईपीडी में निल बटा सन्नाटा रहता है।
एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) ने प्रति वर्ष किए जाने वाले निरीक्षण में इस मेडिकल कॉलेज को स्वीकृति प्रदान करने से इनकार किया है। बेइमानों की डबल इंजन सरकार होने का दुरुपयोग करते हुए, एनएमसी की स्वीकृति के बगैर ही इस मेडिकल कॉलेज को चलाया जा रहा है। समझा जा सकता है कि बिना मरीजों को देखे जो डॉक्टर बनेंगे वे मरीजों का कैसा इलाज कर पाएंगे? इस तरह के डॉक्टर बनाना समाज के लिए अति घातक होने वाला है। दरअसल संघ भाजपा की सरकार को चिकित्सा सेवाएं देने में कतई कोई रुचि नहीं है। इनकी रुचि तो दाखिला लेने वाले प्रत्येक छात्र से प्रति वर्ष आठ लाख वसूलने में है।
एमबीबीएस का तीसरा बैच आने के बावजूद यहां पर आज तक न तो कोई डिलीवरी हो पाई है और न ही इमरजेंसी को ढंग से चालू किया गया है। कारण यह है कि यहां फैकल्टी, पैरामेडिकल स्टाफ व उपकरण आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। जिस अस्पताल में उक्त मौलिक संसाधन ही उपलब्ध न हों तो वहां कोई कैसे इलाज करा सकता है। और तो और इस अस्पताल को अभी तक न तो अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र मिल सका है और न ही बिजली का स्पेशल फीडर मिल सका है। मजे की बात तो यह है कि सरकार द्वारा कब्जे में लिए जाने के वक्त यह विशेष फीडर मौजूद था, लेकिन इसका इस्तेमाल न किए जाने के चलते बिजली विभाग ने इसको निगल लिया और अब नया फीडर लगाने का काम कछुआ गति से रेंग रहा है। बीते सप्ताह अग्निशमन वालों ने अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने के लिए अस्पताल की इमारत में दो सीढिय़ां बनाने को कहा है, जो न जाने कितने वर्षों में बन पाएंगी?
एक और मजे की बात यह है कि सरकार ने शुरू के डेढ़-दो साल तक तो यहां पूर्णकालिक डायरेक्टर तक लगाने की जरूरत नहीं समझी। काम चलाऊ तौर पर मेवात मेडिकल कॉलेज के एक निकृष्ट डॉक्टर गौतम गोला को अतिरिक्त कार्य भार सौंपते हुए डायरेक्टर पद सौंप दिया था।
इसके परिणामस्वरूप डॉक्टर गोला न यहां कुछ करते थे और न ही मेवात मेडिकल कॉलेज में, केवल इधर से उधर आने-जाने में ही समय गुजारते थे। अब जब से नए डायरेक्टर डॉ. बृजमोहन वशिष्ठ ने कार्यभार सम्भाला है तो वे काफी कुछ करने की सोचते तो हैं लेकिन उनके पास कुछ भी करने के लिए न तो अधिकार है और न ही धन। ऐसे में वे बायाकेमिस्ट्री वाले फैकल्टी को कभी गायनेकोलॉजी पढ़ाने को कहते हैं तो कभी मेडिसिन। इसी तरह कम्युनिटी मेडिसन वाली फैकल्टी को ग्रामीण क्षेत्रों में अपने साधनों से जाकर अस्पताल का प्रचार करने को कहते हैं। जाहिर है कि इससे संस्थान का माहौल तनावपूर्ण हो रहा है।