बिहार के प्रशान्त हो गए शान्त

बिहार के प्रशान्त हो गए शान्त
October 25 06:31 2025

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
राजनीतिक रणनीतिकार से अब स्वघोषित ‘क्रांतिकारी’ बने प्रशांत किशोर ने एक बार फिर अपनी चालाकी का परिचय दिया है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक ने घोषणा की है कि वे आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में खुद मैदान में नहीं उतरेंगे। यह फैसला उन्होंने तथाकथित रूप से पार्टी को मजबूत करने के बहाने लिया है, लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही है। दरअसल, किशोर भाजपा के गोलबाज बनकर काम कर रहे थे, जिनका मकसद बिहार में भाजपा विरोधी वोटों को इंडिया गठबंधन में जाने से रोकने के लिए अपनी पार्टी को विकल्प के रूप में पेश करना था। लेकिन जब भाजपा ने पाया कि वोट उसी के कट रहे हैं तो अपने इस मोहरे को पीछे खींच लिया जिसे प्रशांत पार्टी को मजबूत करना बता रहे हैं।

प्रशांत किशोर, जो कभी बतौर भाड़े के टट्टू कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए रणनीति बनाते रहे, अब जन सुराज के बैनर तले बिहार की सियासत में कूद पड़े थे। उनकी योजना साफ थी! सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़कर सभी विपक्षी दलों, खासकर लालू की आरजेडी और नीतीश बाबू की जेडीयू को कमजोर करना, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलना था। लेकिन अब साफ हो गया है कि यह सिर्फ भाजपा का ‘बी-टीम’ थी, जो सतह पर स्वतंत्र दिखती थी लेकिन पीछे से सत्ताधारी गठबंधन को फायदा पहुुंचाने का इरादा रखती थी। किशोर का पीछे हटना कोई नौतिक फैसला नहीं है बल्कि उन्हें जन सुराज पार्टी के गठन के दिन से ही मालूम है कि बिहार जैसे खांटी राज्य के चुनाव में उनका खाता खुलना भी मुश्किल है। बावजूद इसके वह लगातार राज्य में रैलियां, जनसंपर्क, प्रेस कॉन्फ्रेंस आदि पाखंड कर रहे थे। गोदी मीडिया भी अच्छी तरह से जानती थी कि प्रशांत बाबू किसके लिए काम कर रहे हैं इसलिए धड़ाधड़ इंटरव्यू, सुर्खियों केे जरिए उन्हें राज्य का उभरता हुआ राजनेता बनाने की नाकाम कवायद की गई।

जानकार कहते हैं कि बिहार मेें एसआईआर कराके चुनाव आयोग ने पहले ही भाजपा की अप्रत्याशित जीत के रास्ते साफ कर दिए हैंं, बावजूद इसके राज्य मेें एनडीए की सरकार के खिलाफ जनमत दिख रहा है। ऐसे में संघ-भाजपा की रणनीति थी कि प्रशांत किशोर के जरिए बिहार में नीतीश कुमार और चिराग पासवान का बेड़ा गर्क किया जाए और चुनाव के बाद भाजपा सर्वाधिक सीट लेकर एनडीए की सबसे बड़ी घटक दल बने, और सीएम भी भाजपा का बने, इसके बाद नीतीश, चिराग को ईडी-सीबीआई के जरिए सरकार मेें रहने के लिए तैयार किया जाए। राज्य मेें एनडीए के खिलाफ जबरदस्त विरोध का आकलन करने पर सामने आया कि प्रशांत किशोर का प्रचार प्रसार तो उल्टा भाजपा और एनडीए के खिलाफ जा रहा है, यानी चुनाव में जनसुराज पार्टी एनडीए के ही वोट कटवा साबित होगी। जनसुराज का बैक फायर होते देख संघ-भाजपा ने अपने तोते प्रशांत को चुप करा दिया। जो प्रशांत कुछ दिन पहले सभी 243 सीटों पर चुनाव लडऩे की बात कर रहा था वह रातों रात भगोड़ा हो गया।

बिहार के मतदाता अब ऐसे ‘रणनीतिकारों’ से तंग आ चुके हैं, जो सिर्फ चुनावी मौसम में उभरते हैं और हारते ही गायब हो जाते हैं। किशोर का यह कदम न सिर्फ उनकी साख को धक्का देगा, बल्कि बिहार की राजनीति में ‘प्रॉक्सी वॉर’ के खेल को भी बेनकाब करेगा। क्या यह फैसला भाजपा से गुप्त समझौते का नतीजा है? या फिर किशोर की चालाकी का एक और अध्याय? समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल बिहार के लोग साफ संदेश दे रहे हैं- सच्चे नेता बनो, न कि सियासी दलाल!

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Mazdoor Morcha
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