मज़दूर मोर्चा ब्यूरो हाल ही में बने शिक्षामंत्री महिपाल ढांडा ने छात्रों में बांटे जाने वाले टैबलेट घोटाले को शायद पकड़ लिया है। अब इनकी खरीदारी के नाम पर होने वाली लूट कमाई तो रुकेगी ही साथ में इनके विरतण की समस्या से भी शिक्षकों को छुटकारा मिल जाएगा।
दरअसल शिक्षा विभाग में बच्चों की पढ़ाई के लिए आवश्यक अध्यापक एवं अन्य जरूरी साजो-सामान की बजाय ऐसे सामानों की खरीदारी पर पैसा बर्बाद किया जाता रहा जिन पर मंत्री व अधिकारियों की मोटी लूट कमाई होती रही। कभी एजुसेट व उनको चलाने के लिए डीजल जनरेटर सेट खरीदे गए तो कभी बड़े पैमाने पर कम्प्यूटर खरीद कर स्टोर भर दिए गए। इसी श्रृंखला में बीते दो साल से टैबलेट खरीदने का गोरखधंधा चलाया जाता रहा है। ये उक्त तो केवल वे मोटे काले धंधे हैं जो स्वत: सामने आ रहे हैं। इनके अलावा छोटे-मोटे घोटालों का तो हिसाब ही नहीं। ज्ञातव्य है कि उक्त वर्णित वस्तुओं का कहीं कोई सदुपयोग आज तक नहीं हो पाया। वे सब कमरों में कबाड़े की तरह पड़े हैं।
पूर्व शिक्षामंत्री कंवरपाल गूजर न तो शिक्षित थे और न ही ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ। ऊपर से उनका करोबार अपने क्षेत्र यमुना नगर में यमुना रेती, बजरी चोरी के अलावा अनेकों काले धंधों से जुड़ा था। अपनी आपराधिक प्रवृत्ति के चलते शिक्षा विभाग में भी उन्होंने काली लूट कमाई के एक से बढ़ कर एक रास्ते तैयार कर लिए थे। खंड व जि़ला स्तर से लेकर मुख्यालय तक का सारा विभाग आकंठ भ्रष्टाचार में डुबो दिया गया था। किसी भी अध्यापक से लेकर प्राइवेट स्कूलों तक का कोई काम बिना रिश्वतखोरी के नहीं होता था। क्लर्क से लेकर डीईओ तक, प्रत्येक मलाईदार पद के लिए मंत्री जी ने बाकायदा रेट घोषित कर रखे थे।
शिक्षामंत्री ढांडा द्वारा टैबलेट धंधे पर रोक लगाने से उनके ईमानदार होने का कुछ आभास तो मिलता है, लेकिन देखने वाली बात यह है कि वे अपने इस विभाग में, जड़ों तक समाए भ्रष्टाचार को उखाड़ पाने में कितने सफल होते हैं अथवा अपने पूर्ववर्ती कंवरपाल की राह पकड़ते हैं।