ज्ञानेंद्र अवस्थी भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वह किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं है। यह न किसी एक फैसले की गलती है और न ही किसी अचानक आए संकट का परिणाम।
यह एक सुनियोजित परियोजना है— जिसमें संविधान को बिना बदले, उसकी आत्मा, उसकी शक्ति और उसकी बाध्यकारी नैतिकता को धीरे-धीरे, व्यवस्थित तरीके से खाली कर दिया गया है।
संविधान बदला नहीं — उसे अप्रासंगिक बना दिया गया यह शासन की सबसे खतरनाक चतुराई है। कानून वही हैं, किताब वही है, प्रावधान वही हैं— पर उनका असर, उनका विवेक, उनकी ताकत कागज़ पर छोड़ दी गई है।
सोचिए— अगर मीडिया पूछ नहीं सकती, न्यायपालिका बोल नहीं सकती, संस्थाएँ विरोध नहीं कर सकतीं, पुलिस सत्ता की मशीन बन जाए, और नागरिक डर में जीएं— तो संविधान किस काम का?
यह इमरजेंसी नहीं—उससे भी ख़तरनाक राजनीति है इमरजेंसी में कम-से-कम घोषित किया गया था कि अधिकार छीने जा रहे हैं। आज अधिकार छीनने की घोषणा नहीं होती— बस अधिकार ख़त्म हो जाते हैं।
लोग बोल सकते हैं… बस बोलने की कीमत बदल गई है।
यह खुली तानाशाही नहीं— यह मानसिक कब्ज़ा है। एक ऐसा कब्ज़ा जिसमें देश ह्लद्गष्द्धठ्ठद्बष्ड्डद्यद्य4 “लोकतंत्र” बना रहता है, पर लोकतंत्र का ज़मीर मर जाता है।
हिंदू राष्ट्र लागू है—कागज़़ पर नहीं, व्यवहार में किसी ने संविधान में संशोधन कर हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया। ज़रूरत भी नहीं थी। जब—
कानून की भाषा बदले बिना अल्पसंख्यकों का जीवन दायरा सिकुड़ जाए, बहुसंख्यक आस्था शासन की प्राथमिकता बन जाए, पुलिस और राजनीति धार्मिक भाषा में बोलने लगें, नागरिक अधिकार धार्मिक पहचान पर निर्भर होने लगें—
तो नाम भले न रखा जाए, पर राज्य की प्रकृति बदल जाती है।
यह वही बदलाव है जिसे महसूस तो हर कोई करता है, पर जिसे स्वीकार करने की हिम्मत कम लोग कर पाते हैं।
मोदी ने दिखा दिया – संविधान को बदले बिना भी गणराज्य बदला जा सकता है उन्होंने साबित कर दिया कि सत्ता किसी भी लोकतंत्र को बिना कागज़़ पर एक शब्द बदले नई दिशा में धकेल सकती है।
संविधान एक किताब रह गया है— शासन अब एक विचारधारा चला रही है। बहुसंख्यकवाद को ‘राष्ट्रीय चरित्र’ बताया जा रहा है। असहमति को ‘देशद्रोह’ बना दिया गया है। न्याय को ‘विरोध’ बना दिया गया है। और धर्म को राजनीतिक पहचान में बदल दिया गया है।
असली खतरा यह है कि यह सब ‘सामान्य’ लगने लगा है नागरिकों का मन बदल जाए, तो देश का चरित्र बदलने में ज्यादा समय नहीं लगता। आज भारत का सबसे बड़ा संकट यही है— कि लोग भूल रहे हैं कि भारत की आत्मा संविधान में है, न कि किसी धर्म की संख्याबल में।
यह लड़ाई अधिकारों की नहीं—चेतना की है यह समय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है। यह वह क्षण है जब देश तय करता है कि वह गणराज्य बना रहेगा या चेतावनी की कहानी बन जाएगा।
हम सिर्फ अपने अधिकार नहीं बचा रहे— हम भारत का वादा बचा रहे हैं।
वह वादा कि कोई भी नागरिक किसी दूसरे के धर्म से नहीं, कानून और न्याय से शासित होगा।
अगर यह वादा टूट गया— तो सिर्फ लोकतंत्र नहीं गिरता, भारत की आत्मा गिरती है।