क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा प्लाट न 380, सेक्टर 24, फऱीदाबाद में, ‘एक्सीलेंट कोटर्स’ नाम की कंपनी है. मालिक का नाम है, अमित बंसल. धातु के बने सामान पर, अलग-अलग प्रकार की कोटिंग का काम होता है. कुल 60 मज़दूर काम करते हैं. कंपनी की ख़ासियत इस प्रकार हैं; मालिक मज़दूरों को गालियां देते हुए ही बात करता है. मज़दूर ने सामने से कोई जवाब दिया, तो उनकी बेदम पिटाई भी करता है. मज़दूरों का पीएफ़ और ईएसआईसी जमा नहीं करता. किसी मज़दूर ने कारण पूछने की ‘जुर्रत’ की तो पिटाई और भयानक होती है.
कंपनी के एक और खासियत ये है कि मज़दूरों के वेतन का भुगतान महीने के महीने नहीं होता है. दो महीने का वेतन बक़ाया, अर्थात चढ़ाऊ रखता है, जिससे कोई मज़दूर अगर गालियां खाने, मार खाने को तैयार नहीं हुआ, और काम छोड़कर चला गया तो उसे अपना बक़ाया पैसा छोड़ कर जाना होता है. पैसे मांगने की ‘जुर्रत’ की, तो पिटाई बहुत भयानक होती है. कंपनी की इन ख़ासियतों का इल्म, क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा को, रविवार 27 अक्टूबर को हुआ.
आज़ाद नगर निवासी, संजय कुमार पांडे ने कार्यालय आकर बताया कि वे, ‘एक्सीलेंट कोटर्स’ नाम की इस कंपनी में 15.06.24 को ‘कोटिंग ऑपरेटर’ के पद पर काम पर लगे थे. उन्हें जून का वेतन नहीं मिला. जुलाई और अगस्त का भी नहीं मिला. 3 सितंबर को उन्होंने देखा कि एक मज़दूर द्वारा अपने बक़ाया वेतन का भुगतान मांगने की ‘जुर्रत’ पर, उसे मालिक अमित बंसल ने बुरी तरह पीटा. संजय पांडे को समझ आ गया कि ये जि़ल्लत उन्हें भी झेलनी पड़ सकती है. उसे सहन करने को, उनके ज़मीर ने मना कर दिया. संजय पांडे ने, उसी दिन, 3 सितंबर को स्तीफा लिखकर दे दिया और अपने घर चले गए.
मज़दूरों को वेतन ना देकर भगा देने की अमित बंसल की आदत बहुत पुरानी और पक्की थी ही. संजय पांडे ने रविवार 27 तारीख को ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ से संपर्क किया. संगठन की सलाह पर, उन्होंने कंपनी को, अपने बक़ाया का भुगतान करने के लिए पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा कि पत्र मिलने के तुरंत बाद उनके बक़ाया वेतन का भुगतान नहीं हुआ, तो वे, अपने संगठन, ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ के नेतृत्व में आंदोलनात्मक और क़ानूनी कार्यवाही करेंगे.
28 अक्टूबर को संजय पांडे ने वह पत्र स्पीड पोस्ट किया. 30 अक्टूबर को पत्र पढ़ते ही, कंपनी मालिक ने संजय पांडे को फोन किया. दबंगई झाडऩे वाले, अमित बंसल के ये बोल-वचन थे; “पांडे जी आपका पैसा बक़ाया है, आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया. तुम तो मेरे परिवार जैसे हो. ऐसा करो कल (31 अक्टूबर) को सुबह-सुबह आ जाओ. दिन भी अच्छा है. दीपावली है. लक्ष्मी का दिन है. आपके घर में साल भर लक्ष्मी का वास रहेगा. अपना पूरा पैसा लेकर जाना, बेटा. किसी को कुछ बताने या साथ लाने की क्या ज़रूरत है. तुम तो अपने आदमी हो, सीधे मेरे पास आ जाना!!” संजय को अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ. वे 31 तारीख दीपावली को कंपनी पहुंचे. उनके पैसे तैयार रखे थे. आखिर लक्ष्मी का दिन था!! संजय पांडे के पैसे, बंसल की तिज़ोरी से निकलकर उनकी ज़ेब में दाखि़ल हो गए.