फरीदाबाद (म.मो.) बीके अस्पताल दिनांक 7 सितंबर बुधवार की रात लगभग 11.00 बजे के समय अस्पताल के मुख्य गेट के सामने एक गर्भवती महिला दर्द के मारे जोर जोर से चिल्ला रही थी । संवाददाता ने जब उनके पास जाकर पूछा, तो उस महिला का पति कहने लगा कि मरने नहीं दूंगा अपनी पत्नी को, खुद को बेच कर बचाऊंगा इसकी जान’। उसने बताया कि वह सेक्टर 56 में रहता है, और उसका नाम राजकिशोर मेह्तो है, यह दर्द से तड़प रही है वे उसकी पत्नी है, उसका नाम धर्मशिला है, और वह 8 महीने की गर्भवती है। आज सुबह जब इसको अधिक दर्द हुआ तो वह उसे बीके अस्पताल ले आया । वो यहां 11.00 बजे पहुंच गया था, यहां पहुंचकर लाइनों के धक्के खा कर लगभग 1.00 बजे डॉक्टर के पास तक पहुंच पाया , डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड और कुछ रक्त जांच लिख दिए जिसे उसे बाहर से ही कराने पड़े क्योंकि उसे अस्पताल के द्वारा बताया गया कि अल्ट्रासाउंड दो-तीन दिन बाद होगा, वहीं रक्त जांच के लिए अगले दिन आने को बोला।
इधर उसकी पत्नी धर्मशिला लगातार दर्द के मारे तड़प रही थी, इन सब हालातों के चलते राजकिशोर ने सभी जांच बाहर से करवाई। इन सभी जांच मे लगभग जिस पर ढाई हजार रुपए खर्च हुए। राजकिशोर को अल्ट्रासाउंड करवाने पर पता चला कि उसके बच्चे की मौत गर्भ में हो गई है। वह धर्मशिला को दोबारा बीके लाया और भर्ती करवा दिया। लेकिन स्टाफ ने उसे दो-तीन दिन बाद मृत बच्चे की डिलीवरी होने की बात कही। दर्द से तड़प रही पत्नी की सुनवाई न होने पर राजकिशोर उसे वहां से ले जाने लगा, तो स्टाफ ने उससे फाईल पर लिखवा लिया कि वह अपनी मर्जी से पत्नी को लेकर जा रही हैं। धर्मशिला को दर्द से राहत देने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था । क्योंकि न ही उसके पास इतने पैसे थे कि वह किसी निजी अस्पताल में उसे ले जाए और उसका सही इलाज कराएं इसी वजह से वह अस्पताल के मुख्य गेट पर बैठा था और सोच रहा था कि क्या किया जाए?
अगर राजकिशोर मे निजी अस्प्ताल जाने की जरा भी गुंजाइश होती तो नीचे खड़े दलाल उनसे जरूर संपर्क कर लेते। क्योंकि अस्पताल के स्टाफ और दलालों के बीच ऐसा तालमेल है। जैसे इंसान के साथ उसकी परछाई। अस्पताल में हो रही घटनाएं जैसे इलाज में देरी, मेडिसिन का न होना, स्टाफ व डॉक्टर का मरीजों के साथ सही व्यवहार व समय पर देखरेख न करना ऐसे मामलों की और परेशान मरीजों व उनके परिजनों की पूरी जानकारी इन दलालों को होती है यह सभी जानकारी स्टाफ द्वारा ही मुहैया कराई जाती है। बस इन दलालों को इंतजार रहता है कि मरीज जैसे तैसे अस्पताल से बाहर आए इतना ही नहीं कुछ मामलों में तो मरीज के परिजनों वार्ड में ही तरीके से समझा दिया जाता है कि यहां तो इलाज इसी तरीके से होगा आप फलाने हस्पताल में चले जाओ आपको डिस्काउंट भी मिल जाएगा और इलाज भी ठीक-ठाक हो जाएगा लेकिन आपको हमारा नाम नहीं लेना होगा और कहना होगा कि हम अपनी मर्जी से ही जा रहे हैं।
इतनी सब तैयारी होने के बाद मरीज जब अपने परिजन के साथ अस्पताल के बाहर पहुंचता है तो वहां प्राइवेट एंबुलेंस उसका इंतजार कर रही होती है कभी-कभी यह व्यवस्था बीके में मौजूद सरकारी एंबुलेंस के द्वारा भी की जाती है इन सब मामलों को देख कर लगता कि दलालों का शिकंजा कितना मजबूत है।
इन दलालों की क्षमता का प्रभाव तब और देखने को मिलता है जब इन्हें डॉक्टर व अस्पताल के स्टाफ के साथ दिखते हैं। जिस पर अस्पताल की पीएमओ सरिता यादव जिनका अधिकांश समय अपने वातानकूल कार्यालय पर बैठकर सीसीटीवी की फुटेज पर नजर रखने में कट जाता है उन्हें भी नजर नहीं आता है देखना नहीं चाहती हैं यह अलग बात है।
दिनांक 12 सितंबर सोमवार को शीला नाम की एक महिला अपने पुत्र दीपक को रात के समय अधिक बुखार होने की वजह से बीके अस्पताल के इमरजेंसी में लेकर आई डॉक्टर ने कुछ दवाइयां लिख दी और रक्त जांच के लिए कहा, दवाइयां बाहर से लानी थी अस्पताल में नहीं थी। और रक्त जांच भी बाहर ही होना था। क्योंकि रात का समय था अभी शीला देवी अस्पताल के अंदर ही थी कि एक लडक़ा उनसे आकर मिलता है और कहता है की अस्पताल में तो रक्त की जांच नहीं हो पाएगी अगर आप बाहर से कराना चाहते हैं तो 15 सो रुपए लगेंगे इन बातों से पाठक अंदाजा लगा ले कि दलालों का शिकंजा कितना मजबूत है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि बीके अस्पताल मे दवाइयां, स्टाफ, डॉक्टरों व अन्य संसाधनों का अभाव है यही अभाव कई बार कई सीमाओं को लांघ जाते हैं। जैसे कि दिनांक 12 सितंबर सोमवार को कैजुअल्टी में बैंडेज और बीटाडीन पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी थी इस मामले में संवाददाता ने जब कैजुअल्टी मेडिसिन इंचार्ज सत्यवती से बात की तो उन्होंने बताया कि है आज नहीं, पिछले तीन-चार दिनों से खत्म पड़ी है।
इस बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि फरीदाबाद का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल जिसमें सबसे अधिक फर्स्ट एड में इस्तेमाल होने वाली पट्टी और बीटाडीन ही नहीं थी, और तो और ट्रोमाडोल, डाइजापाम ,टीटी, पीसीएम, मेट्रोजिल, टांके लगाने वाला धागा (मेडिकेडेट) जैसी इमरजेंसी में इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण दवाइयां पिछले काफी लंबे समय से नहीं है। अस्पताल के स्टाफ और दलालों का संबंध इतना मजबूत है कि अस्पताल में आए हुए मरीजों की पूरी जानकारी इन दलालों को समय पर मिल जाती है जानकर तो यह भी बताते हैं कि कुछ दलालों के परिजन इस अस्पताल में कार्यरत हैं। जिसकी वजह से उनकी अस्पताल में आवाजाही बहुत ही आसानी से हो जाती है। और इसी की आड़ में यह दलाल अपना शिकार आसानी से कर लेते हैं। अब सवाल यह उठता है कि डा. सविता यादव इन सभी मामलों पर कार्यवाही क्यों नहीं करती है क्या पीएमओ को इन सभी मामले की जानकारी नहीं है और अगर जानकारी है तो वह चुप क्यों हैं क्या उनकी भी कोई इन लोगों से सांठगांठ है।