फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भारत का दुश्मन बताए जाने वाले चीन की कंपनी ईकोग्रीन को मोदी-खट्टर ने गुडग़ांव-फरीदाबाद में कचरा प्रबंधन के नाम पर अरबों रुपये का लाभ पहुंचाया। कंपनी ने कभी कचरे से बिजली नहीं बनाई लेकिन खट्टर सरकार ने खुले हाथ से 1 हजार रुपये प्रति टन की दर से भुगतान किया, जबकि यह भुगतान तब भी किया जाना था जब कंपनी बिजली आपूर्ति शुरू करती जो कभी हुआ ही नहीं।
दोनों शहरों में जगह जगह कचरों के ढेरों से उठती दुर्गंध से परेशान जनता को समझ में आ गया था कि सरकार ने ईकोग्रीन कंपनी के नाम पर उसे बेवकूफ बनाया है। कंपनी न तो डोर टू डोर कचरा उठा सकी और न ही खत्तों को कभी समय पर साफ कर सकी। बंधवाड़ी में भी सिर्फ कचरा डंप ही करती रही इसका असर यह हुआ कि वहां 360 लाख मीट्रिक टन का कचरे का पहाड़ खड़ा हो गया। बंधवाड़ी प्लांट के कारण आसपास के इलाके का पारिस्थितिकी तंत्र भी बिगड़ गया। ईकोग्रीन कंपनी की नाकामी के कारण जनता में आक्रोश पनपने लगा। 2024 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव होने थे।
राजनीति के जानकारों के अनुसार विपक्षी दल ईकोग्रीन और कूड़े को चुनाव में मुद्दा बना कर भाजपा को घेर न सकें इसके मद्देनजऱ तत्कालीन शहरी निकाय मंत्री ने फरवरी 2024 में ईकोग्रीन कंपनी का करार रद्द करने की दिखावटी घोषणा कर दी। मीडिया में इसका खूब ढिंढोरा भी पीटा गया कि खट्टर सरकार ने काम नहीं करने वालों कंपनी को हटा दिया। यह सरकार की चाल थी इसलिए कंपनी को खत्तों से कचरा उठा कर बंधवाड़ी तक पहुंचाने का काम जारी रखा गया। गौरतलब है कि कंपनी ने कचरा ढोने में भी घटतौली कर लाखों कमाए हैं। वैसे तो एक टन दस क्विंटल का होता है लेकिन ईकोग्रीन के बंधवाड़ी पहुंचने वाले आठ क्विंटल का डंपर भी एक टन हो जाता है। आठ क्विंटल को एक टन बनाने के लिए कंपनी धर्मकांटे पर तौल करने वाले को बाकायदा चुग्गा-पानी डालती है।
सरकार द्वारा करार इस तरह रद्द किया गया कि कंपनी को न्यायालय जाने का पूरा मौका और जायज बिंदु मिल सकें। हुआ भी वही कंपनी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सरकार और कंपनी के बीच नूरा कुश्ती शुरू हो गई। बताया जाता है कि शातिर चीनी कंपनी ईकोग्रीन ने लूट कमाई के लिए भारत में सत्ता एवं मोदी-खट्टर के चहेते संघी अग्रवाल परिवार को अपना स्थानीय एजेंट के रूप में मुख्य कार्यकारी बनाया था। अग्रवाल परिवार लूट कमाई की हिस्सापत्ती आकाओं से लेकर कंपनी मुख्यालय तक पहुंचाता है। करार रद्द होने के बाद सरकार ने दूसरी कंपनियों को डोर टू डोर कलेक्शन का ठेका दे दिया। बताया जाता है कि यह ठेके भी ईकोग्रीन कंपनी चलाने वाले अग्रवाल परिवार की बेनामी कंपनियों को सौंपे गए थे। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद विधानसभा चुनाव में फायदा उठाने के लिए ईकोग्रीन कंपनी पर कार्रवाई की गई, शहरी निकाय मंत्री सुभाष सुधा ने जून में कंपनी का पूरा करार रद्द करने की फिर से दिखावटी घोषणा कर दी।
जानकारों के अनुसार यह सारी कवायद सरकार ने ईकोग्रीन कंपनी की लूट डकैतियों को छिपाने के लिए की गई थीं। प्रदेश में जिस तरह सत्ता विरोधी लहर चल रही थी उसे देख कर भाजपाईयों को डर था कि यदि सरकार बदली तो ईकोग्रीन के काले चिट्ठे खुल जाएंगे और उसके जरिए भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार की भी पोल खुल जाएगी। इस डर से ईकोग्रीन कंपनी का ठेका रद्द किया गया था कि यदि दूसरी सरकार आती और जांच बिठाती तो भाजपाई कहते कि कंपनी की गड़बड़ी के कारण हमने पहले ही उसका करार रद्द कर दिया था, और पार्टी की छवि चमकाई जाती।
जनता के तगड़े विरोध के बाद भाजपा अप्रत्याशित रूप से तीसरी बार सत्ता में आ गई। अगले पांच साल तक सत्ता हासिल होते ही फिर से ईकोग्रीन को काम सौंपने की तरकीबें शुरू कर दी गईं। पूरे चुनाव शांत बैठे न्यायालय ने दो-तीन दिन पहले फैसला सुनाया कि करार रद्द करने में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया इसलिए करार रद्द नहीं हुआ है। न्यायालय ने सरकार को करार रद्द करने के लिए दो महीने की नोटिस देने की प्रक्रिया अपनाने की सलाह भी दी है। जानकारों के अनुसार जिस तरह अधिकारी बैठकें कर रहे हैं और जिस तरह ईकोग्रीन कंपनी के अधिकारी दूसरी बार लूट कमाई के लिए कमर कस रहे हैं उससे लगता है कि सरकार करार रद्द करने की कार्रवाई फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल देगी।