बडख़ल इलाके के लिए ख़तरा बनी बडख़ल झील

बडख़ल इलाके के लिए ख़तरा बनी बडख़ल झील
September 25 04:41 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्राकृतिक बडख़ल झील को सत्ता द्वारा कृत्रिम संसाधनों से भरवाने की सनक परवान चढ़ाने वाले स्मार्ट सिटी के निकम्मे रिटायर्ड अफसरों ने पूरे बडख़ल गांव और आसपास के इलाके के लिए सैलाब जैसी आपदा का जोखिम खड़ा कर दिया है। अपनी मूर्खता का पुख्ता प्रमाण देते हुए झील में क्षमता से अधिक पानी भरने पर अतिरिक्त जल रिलीज करने वाले गेट ही खत्म कर दिए।

अतिरिक्त जल को बराही तालाब ले जाने वाले प्राकृतिक नाला भी बंद कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ की भारी बरसात में पर्यटकों के बैठने के लिए बनाया नमो घाट भी डूब गया, जो कि खतरनाक है। हालांकि स्मार्ट सिटी के अधिकारी इस खतरे को छिपा कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि झील में पानी भरने के कारण सेक्टर 21 के एसटीपी का पानी बंद कर दिया गया है। करीब दो दशक पहले सूख चुकी बडख़ल झील बिना खर्च के प्राकृतिक तरीके से भरी जा सकती थी लेकिन इसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटने वाली ‘सदाचारी’ सत्ताधारी भाजपा के मंत्री-विधायक और भ्रष्ट अफसरों का पेट नहीं भर पाता, तो 110 करोड़ का भारी भरकम प्रोजेक्ट बनाया गया। इसमें सेक्टर 21 में बनने वाला एसटीपी शामिल नहीं है। विभिन्न विभागोंं में रहकर शहर सूरत बिगाडऩे वाले हरामखोर अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद स्मार्ट सिटी पहुंचे और सरकार की मंशा पर विकास के नाम पर अफलातूनी योजनाएं बनाने लगे। उन्होंने इस प्राकृतिक झील को कृत्रिम जलाशय बनाने का प्रोजेक्ट तैयार किया तो सत्तर वर्ष पूर्व बनाए गए जलाशय में पानी की मात्रा और गहराई और बताने वाले सिस्टम को उखाड़ फेंका।

एसटीपी के पानी से कृत्रिम रूप से भरी जाने वाली झील का यह पानी कहीं बह कर निकल न सके इसके लिए पंडित नेहरू के राज मेें बनाए गए बांध और गेट सिस्टम को भी उखाड़ फेका गया। स्थानीय लोगों के अनुसार पुरानी झील में वाटर गेज और निकासी के लिए लोहे के गेट लगाए गए थे। झील में अतिरिक्त पानी होने पर गेट खोल कर उसे नालों के जरिए यमुना नदी में छोड़ दिया जाता था। निकम्मे इंजीनियरों ने इस आपदा का कोई संज्ञान नहीं लिया। बताया जा रहा है कि पिछली बारिश में भी झील में काफी पानी इकट्ठा हो गया था और तब अतिरिक्त पानी एक प्राकृतिक नाले से निकल कर बडख़ल गांव के नाले से होते हुए बह गया था। हो हल्ला हुआ तो वह नाला भी बंद करवा दिया। यानी प्राकृतिक बडख़ल झील पानी का एक बड़ा टब जैसी बन गई जिसमें से अतिरिक्त पानी तब ही बाहर आएगा जब टब की दीवार से ऊपर हो जाए। स्थानीय लोगों के अनुसार बडख़ल झील की सबसे निचली दीवार पर्यटकों के लिए बनाया गया रैंप ही है।

बीते सप्ताह हुई बारिश में पहाडिय़ों से उतरे पानी के कारण झील का जलस्तर तेजी से बढ़ा और नमो घाट तक डूब गया। इससे ज्यादा पानी आने से झील की दीवार लीक होने या टूटने पर सैलाब जैसी तबाही की आशंका से स्थानीय लोगों में बेचैनी बढ़ गई। लोगों के अनुसार झील में कभी इतनी ऊंचाई तक पानी नहीं भरा था, खतरे के निशान तक पहुंचते ही गेट खोल दिए जाते थे, अब वह व्यवस्था ही नहीं है। बारिश के पानी की निकासी के लिए बनवाया गया रजवाहा इसलिए बंद कर दिया गया, क्योंकि वह नेहरू की कांग्रेसी सरकार ने बनवाया था।

लोगों के अनुसार झील से पानी निकलने का एक जो छोटा सा नाला है वह भी अतिक्रमण का शिकार है और बडख़ल चौक तक जाते जाते समाप्त हो जाता है, यानी इस नाले से निकला पानी बडख़ल चौक पर ही जमा हो जाएगा। पहले झील का अतिरिक्त पानी छोड़े जाने पर जो डूब क्षेत्र बनता था वहां अब कॉलोनियां बस चुकी हैं जो झील भरने के कारण बड़े खतरे मेें हैं। हालांकि निगम की जगह अब इसका काम स्मार्ट सिटी संभाल रही है और इसने लोगों के चिंता जताने पर एसटीपी का पानी झील मेें डालना बंद कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। वो तो भला हो मानसून का कि बारिश रुक गई अन्यथा बडखल झील एक बड़े इलाके के लिए आपदा का सबब बनती। समझने वाली बात यह है कि यदि झील से अतिरिक्त जल की निकासी के उचित वैज्ञानिक प्रबंध नहीं किए गए तो भविष्य की भारी बारिश झील को शहर के श्राप में बदल सकती है।

घटिया निर्माण की भी पोल खुली
अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र के सपने दिखा कर तैयार किया जा रहा बडख़ल झील प्रोजेक्ट अभी पूरा नहीं हुआ है और घटियापन सामने आने लगा है। झील के लिए बनाया गया रैंप बारिश के पानी से जगह जगह धंस चुका है और इसमें जलभराव हो गया है। यही नहीं जमीन धंसने से अनेकों जगह पत्थर उखड़ कर बाहर आ गए हैं, कई जगहों पर तो ठेकेदार ने टूटे पत्थर ही लगा दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुदाई पर सख्ती से प्रतिबंध लगा होने के बावजूद मोटल के पास पहाड़ी को खोद कर समतल किया जा रहा है। यहां की पहाड़ी काटकर जो पत्थर निकल रहा है उसे झील में डाला जा रहा है, जिससे झील का जलस्तर भी बढ़ रहा है जो वर्तमान में खतरे का सबब है। नमो घाट के पत्थर भी धंसने लगे हैं, दरअसल पहली ही बारिश में करोड़ों रुपयों के नमो घाट और रैंप में हुई कमीशनखोरी उजागर हो गई है।

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Mazdoor Morcha
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