डॉ. सोना चौधरी (बबिता) जीवन की राहें हमेशा सीधी नहीं होतीं। कभी यह हमें ऊँचाइयों तक ले जाती हैं, तो कभी भीतर झाँकने का अवसर देती हैं। मेरी अपनी यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही है — भारतीय फुटबॉल टीम की कप्तान से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षिका और प्रशिक्षक बनने तक का सफऱ अनुभवों का एक जीवंत चित्र है।
मैदान में संघर्ष, अनुशासन और नेतृत्व की भावना ने मुझे पहचान दी। फिर जीवन ने नया मोड़ लिया — शिक्षा और आत्मविकास की खोज ने मुझे अमेरिका और सिंगापुर जैसी संस्कृतियों तक पहुँचा दिया। वहाँ के अनुभवों ने मुझे यह सिखाया कि सीखने की कोई सीमा नहीं होती — हर देश, हर संस्कृति हमें स्वयं से मिलने का नया अवसर देती है।
भारत लौटने पर मैंने अपने भीतर की साधक को पाया। कॉरपोरेट संस्थानों और विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण और अध्यापन के दौरान मैंने जाना कि असली शिक्षा किताबों में नहीं, जीवन के अनुभवों में बसती है। विद्यार्थियों और पेशेवरों के साथ कार्य करते हुए मुझे यह अनुभूति हुई कि हर व्यक्ति अपने भीतर की सम्पूर्णता की खोज में है, पर उसके मार्ग अलग-अलग हैं।
समय के साथ मैं एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकती रही — जैसे कोई यायावर अपनी मंज़िल ढूँढ रहा हो। और जब अंतत: अपने राज्य और घर में स्थिर हुई, तो भीतर से एक प्रश्न उठा — “क्या अब मैं पूर्ण हूँ?” उत्तर मिला — “अभी नहीं।” यही उत्तर मुझे विरक्ति के मार्ग पर ले गया। मैंने धीरे-धीरे अपने लगावों, पसंदों, स्वादों और वस्तुओं से स्वयं को अलग करना शुरू किया। आश्चर्य की बात यह रही कि यह अलगाव पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मशक्ति का स्रोत बना। मैंने समझा कि जब हम सचेत होकर किसी वस्तु या व्यक्ति से दूर होते हैं, तो वह त्याग नहीं, बल्कि आत्म-अभ्यास होता है। पर जब जीवन हमें विवश कर देता है, तब वही अलगाव सबसे अधिक पीड़ादायक बन जाता है। इसलिए मैंने जाना — सचेत विरक्ति ही आत्मविकास का सबसे सुंदर रूप है। आज मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ — “जब कुछ भी आपको भीतर से हिला न सके, तभी आप वास्तव में सम्पूर्ण हो जाते हैं।” (पूर्व भारतीय फुटबॉल कप्तान, लेखिका एवं जीवन-प्रेरणा प्रशिक्षक)