एनआईटी के बाद अब बल्लबगढ़ बस अड्डा बेचने की तैयारी

एनआईटी के बाद अब बल्लबगढ़ बस अड्डा बेचने की तैयारी
April 06 06:06 2025

बल्लबगढ़ (मज़दूर मोर्चा) गत वर्ष एनआईटी स्थित दशहरा ग्राउंड बस अड्डा बेच खाने के बाद अब बल्लबगढ़ स्थित बस अड्डे को बेच खाने की तैयारी चल रही है। करीब 40 वर्ष पूर्व 17 एकड़ ज़मीन पर बने इस बस अड्डे के एक ओर राष्ट्रीय राजमार्ग तथा मेट्रो स्टेशन है तो दूसरी ओर रेलवे स्टेशन होने से इसका व्यापारिक महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। इसको देखते हुए राजनेताओं ने इसे बेच खाने का वही तरीका अपनाया है जो एनआईटी में अपनाया गया था।

फिलहाल इस बस अड्डे पर विभिन्न स्थानों के लिए कूच करने वाली बसों के स्थान निर्धारित हैं, यात्रियों के उठने-बैठने के लिए पर्याप्त स्थान कैंटीन शौचालय आदि सभी कुछ बने हुए हैं इमारत के ऊपरी तल पर परिवहन विभाग के कार्यालय तो पिछवाड़े की ओर अच्छी-खासी वर्कशॉप बनी हुई है। वह बात अलग है कि वर्कशॉप में न तो पर्याप्त कर्मचारी रहे और न ही आवश्यक साजो-सामान बचा जिसके चलते बसों की ठीक-ठाक मरम्मत नहीं हो पा रही।

मरम्मत की शायद इसलिए भी जरूरत नहीं रही होगी क्योंकि बसों को चलाने के लिए कभी ड्राइवर होते हैं तो कंडक्टर नहीं और जब कंडक्टर होते हैं तो ड्राइवर नहीं और जब दोनों होते हैं तो बसें नहीं होतीं। कुप्रबन्धन की इस दशा में सरकार ठेके पर बसें लेती है और ड्राइवर कंडक्टर भी दिहाड़ी पर रखे जाते हैं। जाहिर है इन हालात में परिवहन के इस कारोबार का भट्टा तो बैठना ही था सो बैठ रहा है। जहां एक ऑटो रिक्शा वाला भी तमाम तरह की फटीकें भुगतने के बाद शाम को हजार रुपये कमा कर ले जाता है वहीं ये सरकारी बसें दिन पर दिन घाटे में जा रही हैं। इसी डिपो में कभी 150 बसें हुआ करती थी जो न केवल नजदीक के बल्कि अमृतसर, शिमला, बैजनाथ आदि, दूर-दूर के रूटों पर चलकर अच्छा-खासा मुना$फा कमाया करती थीं। नजदीकी लोकल रूट पर चलते हुए सेक्टर 7, 10 व 15 आदि को भी नियमित रूप से कवर किया जाता था। अब इनके पास न तो लोकल रूट पर और न ही लम्बे रूटों पर चलने वाली बसें बची हैं। कुल मिलाकर बस सेवा का पूरी तरह से सत्यानाश कर दिया गया है। इतना ही नहीं इस सत्यानाश में वे 200 बसें भी शामिल हैं जो जेएनयूआर मिशन के तहत यहां लाई गई थीं।

सत्ता पर काबिज भ्रष्ट नेताओं का लक्ष्य जनता को पर्याप्त परिवहन सेवा देना अब नहीं रह गया है। अब इनकी गिद्ध दृष्टि अरबों रुपयों की 17 एकड़ ज़मीन पर टिकी हुई है। इनके द्वारा बनाई गई स्कीम को पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) का नाम दिया गया है। इस योजना में माल यानी कि ज़मीन पब्लिक की होगी उस पर व्यापारिक भवन का निर्माण प्राइवेट कम्पनियां करेंगी और मुना$फा नेताओं के साथ मिल-बांट कर खाएंगी और अंधभक्त ताली बजाएंगे।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles