डॉ. रामवीर अभी जानने लायक आधी बातें भी वे नहीं जानते फिर भी बेशर्मी से खुद को सर्वोपरि विद्वान् मानते।
ज्ञान भले हो आधा अधूरा किन्तु बहस से नहीं भागते मैं ना मानूं हठ के सहारे स्वयं स्वयं को सही मानते।
आइंस्टीन और एपिस्टीन में भी जो नहीं जानते अन्तर ऐसे उद्भट बुध भी मिले हैं हमें एक गोष्ठी के अन्दर।
हाय मैं मर जावां कह कर हम तुरन्त उठ लिए वहां से आयोजक से पूछा भैय्या ऐसे रत्न लाते हो कहां से।
आयोजक था गुरु घंटाल गया हमारे प्रश्न को टाल ऐसी हवा चल रही देश में आखिर किससे करें मलाल।
जिनका जीवन बीत गया है गूढ ग्रन्थों की खाक छानते तिस पर भी विनम्र रहते हैं खुद को खुदा नहीं मानते।
विद्या एक महासागर है यह गागर में समा नहीं सकती मानव का मस्तिष्क है गागर थोडी विद्या ही आ सकती।
भर्तृहरि के नीतिशतक का ‘यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं..’ श्लोक यावज्जीवन स्मरणीय है इसे कभी न भूले लोक।
विद्यावान् का पहला लक्षण ही है विनयवान् हो जाना विनय और शील द्वारा ही तो विद्वान् जाता पहचाना।
सब विषयों का सभी तरह का ज्ञान प्राप्त करना है अपेक्षित वांछित है अधिकाधिक विषयों में जिज्ञासु होवें दीक्षित।
एकांगी इकतरफा ज्ञान से कूपमण्डूकता का है खतरा आज ‘पोस्ट ट्रुथ’ के माहौल में यह खतरा ज्यादा ही पसरा।
नटवर सिंह की आत्मकथा का शीर्षक लगता है प्रासंगिक ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ कवि को लगता है मनमाफिक।