फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) करीब तीन साल पहले हरियाणा की खट्टर सरकार ने तमाम जायदादों की ‘आईडी’ बनाने आदेश जारी किया था। इसके लिए याशी नामक जयपुर की एक फ्रॉड कम्पनी को 57 करोड़ रुपए का ठेका दिया गया था। इस कम्पनी ने काम बनाने की बजाय ऐसा बिगाड़ा कि जनता त्राहि-त्राहि करती रही और सरकारी बाबू मोटी मलाई काटते रहे।
जनता उस दर्द को अभी भूली नहीं थी कि नायब सिंह सैनी सरकार ने जायदादों की रजिस्ट्री को डिजिटलाइट करने का ठेका याशी जैसी ही किसी फ्रॉड कम्पनी को दे दिया है। विदित है कि जायदादों की क्रय-बिक्री की रजिस्ट्री तहसील में होने का एक पुराना कानून बना हुआ है। इसके अंतरगत विक्रेता एवं क्रेता अर्जी नवीस के माध्यम से दस्तावेज तैयार करके तहसील में जमा कराते हैं। इसके लिए अर्जी नवीस बाकायदा अपनी फीस के साथ-साथ तहसीलदार व अन्य कर्मचारियों की तय रिश्वत भी वसूलता है।
जनता को इस शोषण एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के नाम पर सरकार ने रजिस्ट्री प्रक्रिया का डिजिटलाइजेशन कर दिया। इसके अनुसार क्रेता व बिक्रेता को न तो किसी अर्जी नवीस के पास जाना होगा और न ही किसी तहसील में। यानी घर बैठे कम्प्यूटर द्वारा ऑनलाइन रजिस्ट्री कराई जा सकेगी। हरियाणा दिवस, यानी पहली नवम्बर से पुरानी प्रक्रिया को पूरी तरह समाप्त करके इस नई कागज रहित प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया है। ढोल पीटने एवं प्रोपेगेंडा फैलाने में माहिर भाजपा सरकार लगातार इसे लेकर अपनी पीठ थपथपा रही है। लेकिन हकीकत इसके एकदम विपरीत है। घर बैठे ऑनलाइन रजिस्ट्री कराना तो दूर, तहसील में धक्के खाने के बावजूद भी यदि पूरे हफ्ते में भी रजिस्ट्री हो जाए तो बड़ी बात है।
अब भी सारा काम कराने के लिए दोनों पक्षों को अपने दस्तावेजों सहित अर्जी नवीस के पास ही आना पड़ता है क्योंकि फ्रॉड कम्पनी द्वारा बनाया गया सॉफ्टवेयर इतना जटिल है कि जनसाधारण तो क्या हर अर्जी नवीस भी उसको खोल नहीं पाता। एक बार खोलने पर 503 रुपए सरकारी फीस जमा करनी होती है। सॉफ्टवेयर की जटिलता के चलते यह फीस एक से अधिक बार जमा करनी पड़ जाती है। जैसे-तैसे यह प्रक्रिया पूरी हो जाए तो ई-फाइल रजिस्ट्री क्लर्क के पास जाती है। उसके पास आपत्ति लगाने या न लगाने के लिए पांच दिन का समय रखा गया है। यदि किसी को एक ही दिन में काम कराना हो तो रजिस्ट्री क्लर्क की विशेष सेवा करनी पड़ती है। उसके बाद मामला तहसीलदार के पास पहुंचता है। यहां भी वही सब कुछ होता है जो रजिस्ट्री क्लर्क के पास हो चुका होता है।
सम्बन्धित लोगों से बात-चीत करने पर पता चला कि इस नई प्रणाली से उनका खर्चा दो से चार गुना तक बढ़ गया है। और तो और जो वकील अथवा नम्बदार गवाही के नाम पर 100 रुपए लेते थे अब हजार रुपए लेने लगे हैं। उनकी इस फीस बढ़ोतरी का करण यह बताया जाता है कि पहले, जहां वे दिन में 50 रजिस्ट्री करवा पाते थे, अब केवल 10-12 ही करा पाते हैं। धंधे से जुड़े लोगों का कहना है कि नवम्बर के पहले सप्ताह में तो रजिस्ट्री न के बराबर हो पाई, लेकिन अब धीरे-धीरे बढऩे तो लगा है फिर भी पुरानी पद्धति के मुकावले 25 प्रतिशत तक ही काम हो पा रहा है।
सरकार, प्रोपेगेंडा का कोई अवसर अपने हाथ से जाने नहीं देती। अपनी सफलता का ढिंढोरा पीटते हुए 27 तारीख के अखबारों में बॉक्सर मेरी कॉम द्वारा रजिस्ट्री कराने का फोटो छपवाया गया है। मजे की बात तो यह है कि खुद मेरी कॉम बडखल तहसील में अपनी दस्तावेजों सहित धक्के खाने आई तब जाकर कहीं उसकी रजिस्ट्री हो पाई। इसके बावजूद सरकार उनके मुंह से ही अपनी इस योजना की तारीफ करवा रही है।
तहसील एवं रजिस्ट्र्रियों से सम्बन्धित मंत्रालय स्थानीय विधायक विपुल गोयल के पास होने के नाते वे भी इस योजना का श्रेय लेने में बढ़-चढ़ कर प्रोपेगेंडा करते हैं। इसकी प्रशंसा के लिए वे आये दिन अपने दो-चार चापलूस प्यादों से कुछ-न-कुछ बयान तो दिलवाते ही हैं, अपने साथ उन्हें खड़ा करके तस्वीरें भी अखबारों में छपवाते रहते हैं। मजे की बात तो यह है कि जो लोग इस प्रक्रिया से दुखी होकर रोते-पीटते हैं, वही लोग चापलूसी करने का अवसर मिलते ही विपुल का प्रशंसागान करने लगते हैं।