अन्धा युग – 2

अन्धा युग – 2
March 30 19:13 2026

डॉ. रामवीर
रोग विज्ञान/विकृति विज्ञान (Pathology) चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जिसका विकास और विस्तार वर्तमान समय में अधिक हुआ है। पैथोलॉजी लैब्स की बाढ़ सी आई हुई है। हजारों तरह के टैस्ट्स हैं। मनोरोगों से सम्बन्धित Psychopathology भी एक शाखा है। देश में बाबाओं और उनके अन्धभक्तों/राजनीतिक दलों या व्यक्तियों के अन्ध समर्थकों/अन्धविरोधियों को देखते हुए एक टैस्ट की आवश्यकता है जिसे Gullibility नाम दिया जा सकता है। Gullible अर्थात् आसानी से विश्वास करने वाला/भोला/सीधा। भोलापन एक गुण भी होता है जैसे बच्चों का भोलापन, किन्तु भोलेपन के कारण ही बच्चों के साथ दुर्व्यवहार यहां तक की अपहरण तक के अपराध हो जाते हैं। जिस देश में बिना विचारे/बिना विवेक के किसी भी बात को स्वीकार कर लेने वालों की संख्या अधिक हो वहां स्वार्थी धर्मध्वजी बाबाओं और छद्म देशभक्तों की बाढ़ आना स्वाभाविक है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक कालखंड को भक्ति काल नाम से जाना जाता है। भविष्य में जब वर्तमान भूत हो जाएगा और इतिहास लिखा जाएगा तो इक्कीसवीं सदी का यह काल अन्धभक्ति काल से अभिहित होगा। अन्धभक्ति मूल रूप से धार्मिक क्षेत्र का शब्द है पर धर्म और राजनीति की परस्पर-उपकारिता का लाभ उठाने के लोभ में बाबाओं की अन्धभक्ति और नेताओं की अन्धभक्ति का ऐसा फ्यूजन हुआ है जैसे संगीत में लोकशैली और पाश्चात्य संगीत का फ्यूजन हो रहा है। साहित्य में धर्मवीर भारती का अन्धा युग कालजयी रचना है, प्रसंग महाभारत कालीन है। आज जैसे फिल्मों के सीक्वेल बनते हैं वैसे ही अन्धा युग – 2 का अच्छा स्कोप है। कोई अन्धभक्त है या नहीं इसके लिएGullibility का आविष्कार वांछित है और रक्तचाप की तरह सामान्य/सह्य/चिन्तनीय मानक निर्धारित होने चाहिएं।
कल एक सज्जन मिले। किसी बड़े लेखक/विचारक पर मुग्ध और परिणामत: आत्ममुग्ध। ऐसे व्यक्तियों को सगर्व मैं अमुक का फैन हूं कहते सुना जा सकता है। एक दिन हितेच्छा से मित्र को बताया कि fan fenatic का वैसा ही संक्षिप्त रूप है जैसा examation स्वयं को स्वयं ही exam (दिवाना, दुराग्रही) क्यों कह रहे हो भाई! मित्र की भाषायी क्षमता सीमित थी,सबकी होती है लेखक की भी है, वांछित है कि सीखने की इच्छा और प्रवृत्ति बनी रहनी चाहिए और सहज बुद्धि (कॉमन सैंस) की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। संस्कृत में सूक्ति है कि जिसमें स्वयं प्रज्ञा नहीं है शास्त्र भी उसका कुछ नहीं कर सकते, नेत्रहीन के लिए दीपक का क्या उपयोग। सबसे कठिन काम क्या है ? समझना और समझाना, समस्या तब और बढ़ जाती है जब जिसे समझना है वह समझाने लगता है, ठान लेता है कि समझा कर ही मानूंगा। इस स्थिति के लिए ही दुर्जनतोष न्याय (तू ही ठीक है)की व्यवस्था पुरा काल में की गई होगी। एक विचित्र विरोधाभास देखा जा सकता है कि आ
ज जो लोग संस्कृत और संस्कृति के नारे अधिक लगाते हैं वे प्राय: संस्कृत नहीं जानते या उतनी ही जानते हैं जितनी मोदी जी अंग्रेजी।

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Mazdoor Morcha
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