स्वतंत्रता आन्दोलन में आरएएस की अनुपस्थिति पर कोई सवाल न खड़ा करे, इसलिए गांधी-नेहरू और सुभाष पर उछालते हैं कीचड़

स्वतंत्रता आन्दोलन में आरएएस की अनुपस्थिति पर कोई सवाल न खड़ा करे, इसलिए गांधी-नेहरू और सुभाष पर उछालते हैं कीचड़
December 31 13:18 2024

संजीव शुक्ल
एक ही विचार भूमि पर खड़े लोगों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नीति कुछ संगठनों की प्रिय नीति रही है। जैसे 2 अक्टूबर को गांधी की उपेक्षा करते हुए उस दिन को उनके परम अनुयायी गांधीवादी लालबहादुर शास्त्री के दिन के रूप में याद करना, मानो गांधी और शास्त्री एक दूसरे के विरोधी हों। इसी तरह नेहरू के मुकाबले बोस और पटेल को महत्त्व देना। यद्यपि सुभाष और पटेल दोनों ही गांधी-नेहरू के प्रति अपने रागात्मक संबंधों को पत्रों के जरिए अभिव्यक्त करते रहे हैं। लेकिन पढ़ता कौन है, इसलिए कैसी भी अफवाह उड़ाओ और चरित्र हनन करो। कभी बोस को गिरफ्तार करने वाली नेहरू की फर्जी चिट्ठी पेश करो, तो कभी कुछ और। स्वतंत्रता आंदोलन में खुद की अनुपस्थिति पर कोई सवाल न खड़ा करे, इसलिए इन्हीं सब मुद्दों से लोगों को डायवर्ट करो। बताते हैं कि हमारा संगठन राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक था, वह सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए सन्नद्ध था।

अरे भाई जब देश परतंत्र हो, शासकों के अत्याचारों से पीडि़त हो, तब देश की आजादी से बड़ा कौन सा उद्देश्य होना चाहिए? जब स्वतंत्र होंगे, तभी न सांस्कृतिक मूल्य सुरक्षित रहेंगे। बिना आजादी के कौन सा मूल्य? हालांकि कितना अराजनीतिक संगठन है, यह आज की सत्ताधारी राजनीतिक दल पर उसके असर को देखते हुए सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अनुपस्थिति को लेकर एक यह तर्क दिया जाता है कि अम्बेडकर भी तो स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिए, उन्हें तो कुछ नहीं कहते। अरे भाई हम तो आपको भी कुछ नहीं कहते, यदि आप राष्ट्रीय नायकों पर कीचड़ न उछालते। हम कौन सा आपसे आंदोलन में भाग लेने का सार्टिफिकेट मांगते हैं! रही बात अंबेडकर की, तो वे अपने दलित समुदाय की आजादी के लिए तो लड़ ही रहे थे। जिसको कुएं पर पानी भरने तक छूट न हो उसके लिए आजादी के वर्गीकरण का क्या मतलब? और फिर मान लिया कि उन्होंने आजादी के आंदोलन में भाग नहीं लिया, तो वे कम से कम आपकी तरह स्वतंत्रता सेनानियों का चरित्र हनन भी तो नहीं करते थे।
कम से कम उन्होंने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की तरह भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज गवर्नर को चिठ्ठी तो नहीं लिखी थी।

अगर पटेल के प्रति इतनी ही श्रद्धा है तो उनके कहे के अनुसार क्यों नहीं चलते? असल बात तो यह है कि न पटेल आपके विचार संप्रदाय को पसंद करते थे और न आप पटेल को पसंद करते हैं। क्योंकि अगर पटेल कथित हिंदूवादी हिंदुत्व के समर्थक होते, तो क्या हिंदूवादी संगठन ज्वाइन न कर लेते और यदि आप पटेल प्रेमी होते तो क्या पटेल की शिक्षाओं से प्रेरित न होते?

सुनकर सुखद आश्चर्य होता है कि जेल में बंद नेहरू की पत्नी का विदेश में इलाज और देखभाल सुभाष चंद्र बोस करते हैं और सुभाष की मृत्यु के बाद उनके परिवार की देखभाल स्वयं नेहरू करते हैं। आजादी के बाद बोस के नारे जयहिंद को अपने भाषण का अभिन्न हिस्सा बना लेना, दोनों के बीच के स्नेहिल संबंधों की ऊष्मा को महसूस कराने के लिए पर्याप्त है। गांधी से मतभेद होने के बावजूद और कांग्रेस से निकलने के बाद आजाद हिंद फौज की ब्रिगेड के नाम गांधी और नेहरू के नाम पर रखना इस बात का प्रमाण है कि सुभाष गांधी व नेहरू को अपनी ही तरह का स्वतंत्रता आंदोलन का साथी मानते थे। चाहते तो हिंदू महासभा के सावरकर या संघ के गोलवलकर या किसी अन्य के नाम पर भी रख सकते थे। लेकिन नहीं, आखिर क्यों? विचार करिए।

गांधी को राष्ट्रपिता भी पहले पहल सुभाष ने ही कहा था। सजा इसकी भी मिलेगी उन्हें देर सबेर। आश्चर्य यह भी होता है कि बोस के मकान में एक कमरा नेहरू के नाम से अभी भी है। गांधी, नेहरू के खिलाफ चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह को खड़ा किया गया। यह अलग बात है कि खुद भगतसिंह कीर्ति में लिखे एक लेख में नेहरू की जमकर तारीफ करते हैं। जेल में भगतसिंह और उनके साथी यतीन्द्रदास अपनी मांगों के लिए अनशन करते हैं, जो कि गांधीवादी तरीकों में से ही एक था। इसलिए गांधीवादियों और क्रांतिकारियों के बीच लक्ष्य प्राप्ति के तरीकों को लेकर मोटा-मोटी विभाजक रेखा तो है, पर दुर्भावना जैसी कोई चीज तो बिल्कुल नहीं। जो भी मतभेद थे नीतियों को लेकर, लेकिन नीयत पर शक बिल्कुल नहीं। अब तो कब-कौन निशाने पर आ जाय कहा नहीं जा सकता!

अंबेडकर के बाद आज भगतसिंह भी निशाने पर हैं। कानपुर के लिट फेस्ट में जिस तरह से एक स्वघोषित इतिहासकार प्रेरणा वैदिक ने भगतसिंह के प्रति विचार व्यक्त किए, वे शर्मनाक हैं। इतिहास बदलने की एक जमात की आदत है आसमान पर थूकने की। मूल्यविहीन राजनीति किसी के प्रति सहृदय नहीं होती। देखिए यह ताजा खबर है जो भगतसिंह को इस तरह याद कर रही है।
(संजीव शुक्ल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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