मेडिकल शिक्षा में खट्टर के बोए बैंक लोन के कांटे अब चुभने लगे

मेडिकल शिक्षा में खट्टर के बोए बैंक लोन के कांटे अब चुभने लगे
March 03 07:54 2026

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
करीब दो साल पहले जब मनोहर लाल खट्टर हरियाणा के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने अपने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस छात्रों की फीस 80 हजार वार्षिक से बढ़ा कर आठ लाख कर दी थी। लेकिन यह बढ़ोतरी उन्होंने बॉन्ड के नाम पर करी थी। यह बढ़ी हुई फीस भी उन्होंने हरियाणा सरकार की गारंटी पर बैंकों से दिलवाई थी। खट्टर सरकार का तर्क यह था कि लोग डॉक्टर बनने के बाद सरकारी सेवा न करके अपने-अपने धंधे में लग कर मोटी कमाई करते हैं। इसलिए जो छात्र हरियाणा सरकार की नौकरी में आकर कम से कम पांच साल सेवा करेंगे उनकी उक्त बॉन्ड राशि पैंतीस लाख रुपये बनती है जो हरियाणा सरकार बैंकों को अदा करेगी।

अब वह समय आ गया है जब करीब 700 युवा एमबीबीएस कोर्स करके डॉक्टर बनने वाले हैं। वे हरियाणा सरकार से नौकरी की मांग कर रहे हैं। इस पर हरियाणा सरकार के हाथ-पैर फूल गए हैं। अभी तो केवल 700 डॉक्टर ही नौकरी मांग रहे हैं, आगामी वर्षों में छांयसा के अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज, भिवानी व नारनौल से निकलने वाले छात्र भी हरियाणा सरकार से यही मांग करेंगे तो हरियाणा सरकार एक गहरी आर्थिक-प्रशासनिक दलदल में धंसती चली जाएगी क्योंकि डॉक्टर तो कर्जा चुकाने वाले हैं नहीं, बतौर गारंटर हरियाणा सरकार को ही सैकड़ों करोड़ का यह कर्जा चुकाना पड़ेगा।
खट्टर की उक्त बॉन्ड पॉलिसी में इस बात का भी कोई उल्लेख नहीं किया गया कि जो डॉक्टर पीजी (स्नातकोत्तर) पढ़ाई के लिए मेडिकल कॉलेजों में जाएंगे, उनका क्या किया जाएगा?

गौरतलब यह भी है कि डॉक्टरों की जिस बढ़ती संख्या को हरियाणा सरकार मुसीबत मानने जा रही है, वह सरकार की जनविरोधी नीतियों के चलते ही है। आज के दिन हरियाणा सरकार के स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों के कुल स्वीकृत पद 3500 हैं। इनमें से केवल 2800 ही भरे हुए हैं। राज्य की कुल जनसंख्या करीब ढाई करोड़ को देखते हुए यहां 6000 डॉक्टरों के पद होने चाहिए। ये पद भी न केवल स्वीकृत बल्कि भरे हुए होने चाहिए। देश की जनता के बेहतर स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाई जानी चाहिए। उसके मद्देनजर प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर का होना जरूरी है। जबकि भारत में आज के दिन डॉक्टरों की यह संख्या मात्र 0.5 ही है।

किसी भी कल्याणकारी राज्य के लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य उसकी पहली प्राथमिकता होती है। लेकिन इसके विपरीत हरियाणा एवं केन्द्र सरकार अपने इन दोनों दायित्वों से पल्ला झाड़ कर इसे व्यापार में परिवर्तित करती जा रही हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह भी है कि अटल बिहारी मेडिकल कॉलेज, भिवानी व नारनौल कॉलेजों में तो मेडिकल पढ़ाई की कोई व्यवस्था न होते हुए भी केवल फीस वसूली का ही धंधा चल रहा है। इसी तर्ज पर ईएसआई कॉर्पोरेशन ने भी दस नए मेडिकल कॉलेज ऐसे खोल दिए हैं जिनमें मेडिकल पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है। ये तमाम कॉलेज एनएमसी(नेशनल मेडिकल कॉलेज कमीशन) के मना करने के बावजूद चालू कर दिए गए हैं। आज के दिन भाजपा सरकारों की एक ही प्राथमिकता है मस्जिदों के आगे हनुमान चालीसा पढ़वाना, उनमेें शिव मंदिर खोजना, अंधविश्वास बढ़ाने के लिए बाबों को प्रोत्साहित करना, युवाओं को शिक्षा की जगह धर्म के नाम पर दंगे कराना है तो वैज्ञानिक शिक्षा का बेड़ा गर्क होना ही है।

बिना प्रोफेसर के चल रही मेडिकल पढ़ाई
बसईदारापुर स्थित ईएसआईसी मॉडल अस्पताल और पीजीआईएमएस के मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस छात्रों का पहला बैच अगस्त 2025 से चल रहा है, लेकिन पहले साल पढ़ाए जाने वाले जरूरी प्री-क्लीनिकल विभाग एनाटॉमी, फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री पढ़ाने के लिए एक भी प्रोफेसर नहीं है। आरटीआई में मांगी गई जानकारी में बताया गया है कि नेशनल मेडिकल कमीशन द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार इन तीन प्रीक्लीनिकल विभागों में 20 फैकल्टी और रेजिडेंट पद होने चाहिए। इनमे तीन प्रोफेसर, तीन एसोसिएट प्रोफेसर, चार असिस्टेंट प्रोफेसर, सात ट्यूटर या डिमॉन्स्ट्रेटर और तीन सीनियर रेजिडेंट शामिल हैं। इसके विपरीत, वर्तमान में संस्थान में केवल एक एसोसिएट प्रोफेसर और तीन असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, सभी अनुबंध पर। प्रोफेसर तो कोई है ही नहीं।
देश भर में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा वितरण का विस्तार करने के लिए कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) के राष्ट्रीय प्रयास के तहत 2025 में यह कॉलेज खोला गया था। ईएसआईसी अस्पताल की ओर से फरवरी मे दिए गए आरटीआई के जवाब में बताया गया है कि यहां एनाटॉमी, फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री में कुल 15 पद ही भरे हैं, इनमें एक एसोसिएट प्रोफेसर, तीन असिस्टेंट प्रोफेसर, नौ ट्यूटर या डिमॉन्स्ट्रेटर और दो सीनियर रेजिडेंट हैँ। विभागवार आंकड़े जांचने पर पदों की कमी स्पष्ट नजर आती है।

एनाटॉमी विभाग में कोई प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर या सीनियर रेजिडेंट है ही नहीं, केवल दो असिस्टेंट प्रोफेसर और चार ट्यूटर से काम चलाया जा रहा है। फिजियोलॉजी विभाग में भी कोई प्रोफेसर या सीनियर रेजिडेंट नहीं हैं। अनुबंध वाले एक एसोसिएसट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर ही हैं। इसी तरह बायोकेमिस्ट्री भी केवल दो ट्यूटर और दो सीनियर रेजिडेंट्स के भरोसे है यानी यहां भी कोई प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर या असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं है। मानव संसाधन ही नहीं बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी यहां छात्रों की बड़ी समस्या है। अंडरग्रेजुएट छात्रों के लिए केवल सात कमरे का हॉस्टल है, जबकि छात्राओं के हॉस्टल में केवल दो ही कमरे हैं। इसके बावजूद वर्ष 2025-26 बैच के लिए एमबीबीएस फस्र्ट इयर बैच के 27 छात्रों को हॉस्टल अलॉट कर दिया गया है।

शैक्षणिक संसाधन भी सीमित हैं। एनाटॉमी विभाग में अंडरग्रेजुएट छात्रों को प्रशिक्षण देने के लिए महज तीन कैडेवर (शव) हैं। हालांकि कॉलेज प्रबंधन का दावा है कि फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री प्रयोगशालाएं चल रही हैं लेकिन चिकित्सा शिक्षा जानकारों का कहना है कि चिकित्सा शिक्षा के बुनियादी चरण में ही प्री-क्लीनिकल विषयों में प्रोफेसरों और वरिष्ठ फैकल्टी के न होने से शैक्षणिक पर्यवेक्षण प्रभावित होगा। इस संबंध मे डॉ. गुंजन गुप्ता मेडिकल कमिश्नर (चिकित्सा प्रशासन) ईएसआईसी, दिल्ली से जानकारी लेने का प्रयास किया गया लेकिन उन्होंने न तो कॉल रिसीव की और न ही व्हाट्सएप मैसेजों का कोई जवाब दिया। चिकित्सा शिक्षा जानकारों का कहना है कि प्री क्लीनिकल डिपार्टमेंट एमबीबीएस पाठ्यक्रम का आधार हैं, एक वरिष्ठ शिक्षाविद् कहते हैं कि प्रोफेसरों के बिना इन डिपार्टमेंट्स को चलाना शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर ही कमजोर प्रशिक्षण की वजह साबित होगा।

यह तो हाल है बसई दारा पुर मेडिकल कॉलेज का, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कारपोरेशन द्वारा दिल्ली के बाहर देश भर में खोले गए अन्य नौ मेडिकल कॉलेजों की शिक्षा व्यवस्था का क्या हाल होगा। यह हालत तो तब है जब कारपोरेशन के पास मजदूरों से वसूला गया दो लाख करोड़ का फंड पड़ा हु़आ है। इस पर तुर्रा यह कि 2026 में दस और नए मेडिकल कॉलेज खोलेंगे। ईएसआई कारपोरेशन द्वारा नवंबर 2025 में बताया गया कि इनके पास आठ सौ से ज्यादा फैकल्टी की पोस्टें खाली पड़ी हुई हैं, सितम यह है कि इन पदों पर भर्ती करने का कोई प्रयास भी नहीं किया जा रहा। जाहिर है कारपोरेशन का लक्ष्य मरीजों और जनता को सेवाएं देना नहीं केवल मजदूरों से धन लूट कर उस पर कुंडली मारकर बैठना ही है।

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