लूट कमाई की हवस : मेयर के शपथग्रहण से एक दिन पहले मैडम ने दरबार लगाकर निपटाईं करोड़ों की फाइलें

लूट कमाई की हवस : मेयर के शपथग्रहण से एक दिन पहले मैडम ने दरबार लगाकर निपटाईं करोड़ों की फाइलें
April 20 15:02 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) महंगे लहंगे पहनने और सोने के बिस्कुट ‘खाने वाली निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास की हराम कमाई की हवस बढ़ती जा रही है। 25 मार्च को नगर निगम के नए सदन के गठन के लिए मेयर और पार्षदों का शपथग्रहण होना था, इससे एक दिन पहले मैडम ने अपने आवास पर विशेष दरबार लगाया, जिसमें नगर निगम के लभगग सारे विभागों के आला अधिकारी, जेई, बाबू आदि बारी-बारी से अनिवार्य रूप से उपस्थित हुए। दरबार में मैडम ने बैक डेट में करोड़ों की फाइलें पास कर डालीं।

सदन के सदस्य और पदाधिकारियों के शपथ लेने से एक दिन पहले मैडम के आवास पर लगने वाले मैराथन दरबार की चर्चा नगर निगम में जोरों पर है। जानकारों के मुताबिक मैडम को यह अच्छी तरह मालूम है कि अभी तक वह जो असीमित वित्तीय अधिकारों के मजे ले रहीं थीं, सदन का गठन होते ही वे सीमित हो जाएंगे और खुली लूट में अड़चनें आएंगी। ऐसे में सदन के गठन से पहले ही करोड़ों रुपयों की बंदरबांट करने की नीयत से दरबार लगाकर फाइलें निपटाई गईं। जानकार इसे विकास कार्यों की फाइलें पास करने के लिए नहीं बल्कि शुद्ध कमीशनखोरी की कवायद मानते हैं। उनके अनुसार यदि से सारे कार्य इतने ही जरूरी थे तो अभी तक अटका कर क्यों रखे गए थे? और अगर जरूरी नहीं थे तो उन्हें आनन-फानन पास करने की क्या जरूरत आ पड़ी थी। इन कार्यों को सदन के सामने भी रखा जा सकता था। यदि ऐसा होता तो बहुत संभव है कि मेयर-पार्षद शहर और वार्ड की जरूरतों के मद्देनजर इन फाइलों में कुछ बदलाव करवाते और फिर पास की जातीं।

जानकार मानते हैं कि कई सौ करोड़ के घोटालों के गढ़ नगर निगम के ‘होनहार अधिकारी फाइलों पर काम दिखा कर करोड़ों रुपयों की लूट कमाई करने और आला अधिकारियों से लेकर नेताओं तक हिस्सापत्ती पहुंचा कर सुरक्षित रहने में माहिर हैं। ऐसे में इस बात की बहुत ज्यादा संभावना है कि 24 मार्च को मैडम के आवास पर लगाए गए दरबार में ऐसी ही फाइलें पास की गईं हों जिनमें काम तो ढेले भर का न हो लेकिन बिल बहुत मोटे बनाए गए हों। यह आशंका इस बात से और भी प्रबल होती है कि उस दिन लगभग सभी फाइलें बैक डेट में ही पास की गईं। मैडम बाकायदा हर विभाग के आला अधिकारी को बुलातीं और वह फाइलों का ढेर लेकर हाजिर होता। इसके बाद मैडम हर फाइल को गौर से पढ़ कर अपनी हिस्सापत्ती का हिसाब लगातीं और पिछली तारीख में पास कर देतीं। अधिकतर फाइलें लगभग एक करोड़ के कार्य वाली थींं। देर रात तक उनके आवासीय दफ्तर में अधिकारियों के आने और फाइलें पास होने का सिलसिला चलता रहा।

फाइलें पास करने की मैडम की आतुरता का एक कारण यह भी माना जा रहा है कि सदन का गठन होने से उनके वित्तीय अधिकार केवल पचास लाख रुपये तक के कार्यों को स्वीकृति देने तक ही सीमित हो जाएंगे, जबकि इससे पहले वह ही सर्वेसर्वा हुआ करती थीं। नई व्यवस्था के तहत पचास लाख से ढाई करोड़ रुपये तक के कार्यों की सिफारिश मेयर की सदस्यता वाली सदन की छह सदस्यीय समिति कर सकेगी। ढाई करोड़ से अधिक कार्यों की अनुमति डायरेक्टर शहरी स्थानीय निकाय से मिलेगी। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार 24 मार्च को मैडम ने अधिकतर फाइलें एक करोड़ के आसपास वाली ही पास कीं, यानी सदन के गठन के बाद वह इन्हें पास नहीं कर पातीं।
आनन-फानन पास की गईं करोड़ों की फाइलें भ्रष्टाचार और दाल में कुछ काला होने की ओर इशारा कर रही हैं। अब देखना यह है कि भाजपा की मेयर प्रवीण जोशी निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास की इस करतूत को उजागर करेंगी या वह भी उनके रंग में रंग जाएंगी। जन प्रतिनिधि और मेयर होने के नाते प्रवीण जोशी को अधिकार है कि वह निगमायुक्त या निगम के किसी भी अधिकारी के कार्य, पास की गई फाइल की समीक्षा करवा सकती हैं, जांच करा सकती हैं। होना तो यह चाहिए कि सदन की पहली ही बैठक में मेयर निगमायुक्त द्वारा पास की गईं फाइलें तलब कर उनकी समीक्षा कराएं और जनता के खून पसीने की कमाई की बंदरबांट होने पर अंकुश लगाएं।

निगम के पिछले आठ नौ साल के इतिहास पर गौर किया जाए तो पूर्व महापौर सुमनबाला तो फाइनेंस कमेटी की चेयरमैनी कर रहे भ्रष्टाचारी धनेश अदलखा की कठपुतली बन कर नाचती रहीं। वहीं अनेक पार्षदों ने अधिकारियों के साथ सांठ-गांठ कर विकास कार्यों के नाम पर खूब लूट कमाई की। अब देखना यह है कि नई मेयर प्रवीण जोशी पिछली मेयर की तरह रबर स्टांप बनने वाली हैं या फिर जन प्रतिनिधि की भूमिका निभाते हुए ईमानदारी से विकास कार्य कराएंगी। वैसे भी नई व्यवस्था में उनकी निर्भरता न तो पार्षदों के बहुमत पर है और न ही स्थानीय राजनेताओं पर। उन्हें जनता ने सीधे तौर पर नगर निगम चलाने का पूर्ण अधिकार दिया है। इसलिए जनता उनसे अपेक्षा करती है कि वे किन्हीं अदलखों के हाथों की कठपुतली बनने की बजाय स्वत: अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। अब देखना यह है कि दबाव मुक्त मेयर के रहते गायत्री जैसे पार्षद आरिफ जैसे कर्मचारियों पर दबाव डाल कर अपनी चुनाव लागत पूरी कर पाने में किस हद तक सफल हो पाएंगे।

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Mazdoor Morcha
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