डॉ. रामवीर यूं तो तीन माह पूर्व अमेरिका के केलिफोर्निया में लगी आग से दुनिया का ध्यान पहले ही आग केन्द्रित था, अब दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस यशवन्त वर्मा के सरकारी बंगले में लगी आग से सारा देश बगलें झांक रहा है। जिन्हें बोलना चाहिए वे चुप हैं, सवालों से सब भाग रहे हैं। आग लगने और घटना के सार्वजनिक होने में असाधारण विलम्ब चौंकाता है, सम्बद्ध लोग सन्न रह गए और डैमेज कंट्रोल में सफल नहीं हुए तो आग का धूंआ बाहर आना ही था। अब सरकार और न्यायपालिका दोनों की प्राथमिकता है आग की लपटों में झुलसी अपनी विश्वसनीयता पर बर्नोल लगाना। जज के घर में मिली धनराशि को भारी मात्रा जैसी वेग टम्र्स में बता कर सही संख्या भी छिपाई जा रही है। गैर सरकारी स्रोतों से 15 से 50 करोड़ तक सूचनाएं मिल रही हैं।
जज के निवास पर नियुक्त सफाई कर्मचारियों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक के बयान बेमेल हैं। पुलिस अपने रिवाज के मुताबिक एहतियात बरत रही है कि उनके मालिक की परेशानी न बढे। बड़े जतन से जनता को औरंगजेब की कब्र खोदने के काम पर लगाया था, इधर जज के घर में लगी आग से न्यायपालिका की कब्र खुद गई ! अब प्राथमिकता खोदना नहीं, खुदने से बचाना हो गया है, आखिर बड़े बड़े न्यायमूर्तियों की इज्जत का सवाल है। नाम बड़े और दर्शन छोटे वाले सद्य: सेवानिवृत्त चन्द्रचूड जी ने न्यायदेवी की आंखों से पट्टी हटाई थी, अब न्याय की देवी भी पछता रही होगी कि यह क्या देख रही हूं।
संघी/भाजपाई भले ही भारत की संस्कृति के ज्ञाता होने के भ्रम में रहते हों, पर उनका संस्कृति ज्ञान हनुमान चालीसा और चंद चौपाइयों तक सीमित है। सुधांशु त्रिवेदी की टक्कर का ज्ञान यह है कि ऋग्वेद संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक है, दस सहस्र से अधिक मन्त्रों वाले ऋग्वेद के पहले नौ मन्त्र अग्निसूक्त कहाते हैं। अग्निसूक्त के कुछ शब्द जस्टिस यशवन्त वर्मा के गृह-अग्निकाण्ड के सूचक से लगते हैं – ‘वर्धमानं स्वे दमे (अपने घर में बढे हुए), ‘यशसं (यशवन्त), ‘त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि (अग्नि तू भला करेगी)। आशा करनी चाहिए कि यह अग्नि न्यायपालिका के आयपालिका बनने का भंडाफोड़ कर के एक बड़े सुधार की सूत्रधार बनेगी। स्वामी दयानन्द जी ने सत्य ही कहा है ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक 7 है।