डॉ. रामवीर
जराजीर्ण कवि के मन को भी छूता दिखा वसन्त मनसिज निश्चल नहीं बैठता है जीवन पर्यन्त।
गुलमोहर या आम्रमंजरी आदि जिसके आयुध ऋतु वसन्त में युद्धोद्यत हो घूम रहा कुसुमायुध।
ऋतु वसन्त से नहीं मुझे तो है सन्तों से शिकायत सौम्य सुखद ऋतु में करवा दी भक्तों की बहुतायत कोटि कोटि जन एक नगर में करवा दिए इकट्ठे जिधर देखो बेकाबू भीड़ आ रही मारते ठठ्ठे एक दूसरे से टकरा कर जो इक बार गिरा उसकी मौत को मोक्ष बता रहे कुछ उल्लू के पठ्ठे।
क्षमा करो ऋतुराज आज मैं मन से बहुत उदास औ उदास मन पर निष्फल हैं कुसुमायुध के प्रयास।