मज़दूर नेता कामरेड बेचू गिरि ने केंद्रीय श्रम मंत्री को लिखा पत्र

मज़दूर नेता कामरेड बेचू गिरि ने केंद्रीय श्रम मंत्री को लिखा पत्र
February 16 06:22 2025

मज़दूर मोर्चा ब्यूरो
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कॉंग्रेस के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष बेचू गिरि ने सेवानिवृत्त श्रमिकों और उनके आश्रितों को मिलने वाली सुपर स्पेशलिटी चिकित्सा सेवाओं सहित अन्य सुविधाएं बंद किए जाने पर चिंता व्यक्त की है। खून पसीने की कमाई से जीवनभर अंशदान देकर ईएसआई कॉर्पोरेशन को बनाकर खड़ा करने वाले इन श्रमिकों को उनके नैसर्गिक हक दिए जाने की मांग करते हुए उन्होंने केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने श्रम मंत्री को श्रमिकों की जायज समस्याओं से अवगत कराते हुए उनका समाधान किए जाने की मांग गंभीरता से की है।

एटक हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष द्वारा केंद्रीय श्रम मंत्री को भेजे गए पत्र के अनुसार ईएसआई (सेंट्रल) रूल्स की धारा 60–61 और ईएसआई (जनरल) रेगुलेशन 1950 की धारा 103 क्च के तहत एक बीमांकित, सेवानिवृत व्यक्ति या अपंग व्यक्ति 120 रुपये सलाना जमा कराकर स्वयं और अपनी पत्नी के लिए चिकित्सा सुविधा ले सकता है। साल 2008 में पहली बार अति विशिष्ट चिकित्सा सुविधा (एसएसटी) के लिए निजी अस्पतालों को टाईअप किया गया तो इन कर्मचारियों को भी यह सुविधा मिलती रही। जब 2010 में ईएसआईसी मैन्युअल आया तो इन कर्मचारियों को अति विशिष्ट चिकित्सा सुविधा के लिए टाईअप अस्पतालों में भेजना बंद कर दिया गया। प्रशासनिक तौर पर कहा गया कि ईएसआईसी या राज्य द्वारा संचालित (ईएसआईएस) अस्पतालों में जो चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होगी, वही सेवानिवृत्त या अपंग कर्मचारी को मिलेगी। ईएसआईसी के मेडिकल कॉलेज बनने के बाद उनमें उपलब्ध सारी सुविधाएं इस प्रकार के मरीजों को मिलती रहीं।

अब फरीदाबाद ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन ने अपने अस्पताल में उपलब्ध इन हाउस सुपर स्पेशलिटी चिकित्सा सुविधाएं इन कर्मचारियों के लिए भी बंद कर दी हैं। यह गौर करने की बात है कि ईएसआई कॉरपोरेशन ने अपने बहुत सारे मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों को गैर बीमांकित व्यक्तियों के इलाज लिए भी खोला हुआ है जबकि इन कर्मचारियों ने सेवानिवृत्ति तक ईएसआईसी के तहत अंश दान दे कर कॉर्पोरेशन का पूरा ढांचा खड़ा किया है। भारत सरकार ने भी घोषणा की है कि 70 साल से ज्यादा आयु के व्यक्तियों को आयुष्मान भारत योजना के तहत नि:शुल्क 5 लाख का इलाज दिया जाएगा।

दूसरे, 2008 से पहले बीमांकित व्यक्ति या उसके परिजन गंभीर बीमारियों के लिए पूरी तरह एम्स, सफदरजंग या इसी स्तर के अस्पतालों पर निर्भर रहते थे। इस दरम्यान बहुत बार ऐसा हुआ कि इन अस्पतालों में जान की जोखिम होने के बावजूद पहुंचने में समय लगने के कारण रास्ते में या आपरेशन आदि की लंबी तारीख मिलने के कारण कुछ बीमांकित व्यक्तियों या उनके आश्रितों का निधन भी हो गया। आखिर में कॉर्पोरेशन ने 2008 में अपनी मीटिंग में निर्णय लेकर तय किया कि जो सुविधा हमारे अस्पतालों में नहीं होगी तो उस हालत में बीमांकित व्यक्तियों और उनके परिजनों को सरकारी अस्पतालों में भेजने की बजाय, निजी अस्पतालों के साथ टाइअप करके हसल फ्री एंड कैशलेस चिकित्सा उपलब्ध कराई जाएगी। कारपोरेशन के इस निर्णय ने बहुत सारे लोगों की जान बचाई और ईएसआईसी के प्रति बीमांकित श्रमिकों के अंदर सकारात्मक समझ बनी और ईएसआईसी के अंदर जाने के लिए मालिकों पर दबाव बनाना शुरू किया।

यह 2008 से 2023 तक चलता रहा । 2023 में कॉर्पोरेशन ने निर्णय करके एक सर्कुलर के द्वारा अवगत कराया कि अब से जो सुविधा ईएसआईसी के अस्पतालों में उपलब्ध नहीं होगी तो ऐसे मरीजों को 2008 से पहले की तरह सरकारी अस्पतालों में भेजा जाएगा। 2023 का यह निर्णय बीमांकित व्यक्तियों और उनके परिजनों के जीवन के साथ एक खिलवाड़ है। कोरोना काल में मजदूरों के अंशदान के करोड़ों रुपये गैर बीमांकित व्यक्तियों पर खर्च किए गए, आज भी हो रहे हैं जैसा के ऊपर कहा गया है, लेकिन कॉरपोरेशन अपने स्टेक होल्डर्स पर जिसे वह आईपी इज योर वीआईपी कहता है, विभिन्न किस्म की पाबंदियां लगा रहा है।

तीसरे, ईएसआई (सेंट्रल) रूल्स की धारा 61 ए के तहत बीमांकित श्रमिकों के माता-पिता को तभी चिकित्सा सुविधा मिलेगी जब उनकी आमदनी 9000 रुपये महीना या उससे कम होगी। अगर उनकी आमदनी 9000 रुपये महीना से ज्यादा होगी तो वे अपने बीमांकित पुत्र या पुत्री के परिवार की परिभाषा में इलाज हेतु नहीं शामिल हो सकते। पत्र में उन्होंने श्रम मंत्री को समझाने का प्रयास किया कि बहुत सारे राज्यों में न्यूनतम वेतन 9000 रुपये से ज्यादा है। इसके अलावा बहुत सारी योजनाओं में भारत सरकार और राज्य सरकारों ने व्यक्तियों की आमदनी 1 लाख 80 हजार रुपया तक सालाना तय की हुई है मगर एक श्रमिक के माता-पिता की सालाना आमदनी एक लाख 8 हजार से ज्यादा होने पर उन्हें इलाज से वंचित कर दिया जा रहा है। यह मानना कितना हास्यास्पद है कि 21 हजार रुपये महीना कमाने वाले मजदूर के माता-पिता की आमदनी लाखों रुपयों में होगी।

चौथे, ईएसआई एक्ट की धारा 2 (परिभाषा) की आश्रित की परिभाषा में श्रमिक के बेटे की उम्र 25 साल तय की गई है। यानी मृतक के बेटे को 25 साल तक पेंशन मिलेगी। दूसरी तरफ इसी धारा में परिवार की परिभाषा में श्रमिक के बेटे की अधिकतम उम्र 21 साल तय की गई है। यानी एक श्रमिक के लड़के को 21 साल तक ही इलाज मिलेगा, इससे ज्यादा नहीं। यह आश्चर्यजनक बात है कि जहां कॉरपोरेशन को नगद पैसा देना होता है वहां तो उम्र 25 साल तक है जबकि जहां इलाज देना है, वहां अधिकतम उम्र सिर्फ 21 साल है। इसके अलावा कारपोरेशन की यह समझ कि एक मजदूर का बेटा 21 साल के बाद नहीं पढ़ेगा और श्रमिक पर आश्रित नहीं रहेगा बहुत ही ऐतराज करने लायक समझ है। बीमांकित श्रमिक भी चाहते हैं कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करें, आगे बढ़ें। इस धारा से श्रमिकों को दो प्रकार का नुकसान हो रहा है। एक तो 21 साल के बाद पढ़ाई के खर्चे के साथ-साथ बीमार पडऩे की स्थिति में इलाज पर भी खर्च करना पड़ रहा है और दूसरे कि 21 साल के बाद एक बीमांकित श्रमिक का बेटा कितना भी प्रतिभाशाली हो. वह ईएसआईसी कोटे के तहत ईएसआईसी मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा की पढ़ाई करने के लिए अयोग्य हो जाता है। उसको ईएसआईसी कोटे का लाभ नहीं मिलता है।

श्रमिकों के इन ज्वलंत मुद्दों और समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने श्रम मंत्री को कुछ सुझाव भी दिए हैं। इनके अनुसार 120 रुपये जमा करने वाले सेवानिवृत कर्मचारी या शत प्रतिशत अपंग कर्मचारी को ईएसआईसी ईएसआईएस के अस्पतालों में उपलब्ध इन-हाउस सभी प्रकार की सुविधाओं सहित जरूरत पडऩे पर टाई-अप निजी हॉस्पिटलों से भी सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं। जहां ईएसआईसी या ईएसआईएस अस्पताल न होकर सिर्फ डिस्पेंसरी है. वहां नजदीकी टाई-अप निजी अस्पतालों से सभी प्रकार की चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाएं।

2023 की रेफरल पॉलिसी को खत्म करते हुए 2008 की पॉलिसी लागू की जाए जिससे बीमांकित व्यक्तियों और उनके परिजनों को नजदीक में और आसानी से सभी प्रकार के चिकित्सा सुविधाएं हसल फ्री एंड कैशलेस मिल सकें। मरीज की जान जोखिम में न पड़े। बीमांकित श्रमिकों के माता-पिता के इलाज लिए आमदनी की 9000 रुपये प्रति माह की सीमा खत्म कर दी जाए और कानून में आश्रित की परिभाषा में श्रमिक के लड़के के लिए “जब तक वह शिक्षा ग्रहण कर रहा है” जोड़ा जाए।गौरतलब है कि कामरेड गिरि का यह पत्र मज़दूरोंं के हितों के लिए अति महत्वपूर्ण है लेकिन गौरतलब यह है कि बेचू गिरि कार्पाेरेशन के उन सदस्यों में नहीं हैं जहां मज़दूरों के केंद्रीय नेता बैठ कर नीति निर्धारण करते हैं। प्रश्र यह उठता है कि जिस एटक से बेचू गिरि आते हैं उसकी बड़ी नेता अमरजीत कौर, हिंद मज़दूर सभा के हरभजन सिंह, सीटू के प्रसान्ता नंदी चौधरी, एआईयूटीयूसी के के.राधाकृष्णा आदि जो कार्पाेशन की मीटिगों में बैठकर नीतिगत फैसले लेेेने का अधिकार रखते हैुं उनके मुंह में क्यों दही जमी हुई है? वे ये मुद्दे कार्पाेरेशन की मीटिंग में क्यों नहीं उठाते?

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