“भाईयो बहनों, मैं आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहताब हूंं कि शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रही होगी, जिसके के कारण, दिए के प्रकाश जैसा सत्य, कुछ किसान भाईयों को हम समझा नहीं पाए। आज गुरु नानक जी का पवित्र प्रकाश पर्व है। ये समय किसी को भी दोष देने का नहीं है। आज मैं आपको, पूरे देश को यह बताने आया हूंँ कि हमने तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने का,रिपील करने का निर्णय लिया है। इसी महीने शुरू होने जा रहे सत्र में इन क़ानूनों को वापस लेने की वैधानिक कार्यवाही पूरी की जाएगी…”- प्रधानमंत्री मोदी, दिनांक 19 नवंबर 1921।
38 महीने बीत गए, लेकिन टीवी के माध्यम से हुई यह विनम्र घोषणा सभी को याद है। ‘फ़ासीवादी राज़’ को ‘कॉर्पोरेट राज़’ भी कहा जाता है, और इतिहास हमें बताता है कि फ़ासिस्ट, कॉर्पोरेट की ताबेदारी से क़दम पीछे नहीं हटाते। ऐसा कभी करना भी पड़ जाए, तो वह एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जाता है, जैसे जंग लड़ रही सेनाएं करती हैं, जिससे और ज्यादा तैयारियों के साथ, आक्रामकता और आक्रोश से आगे बढ़ा जा सके। कृषि, राज्य का विषय है लेकिन केंद्रीय ‘कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय’ ने 25 जून 2024 को, “कृषि-उत्पाद मार्केटिंग ढांचा बनाने की राष्ट्रीय नीति” का मसौदा जनता की राय जानने के घोषित मक़सद से ज़ारी किया है। मज़दूर जनता के एक हिस्से का नुमाइंदा होने की हैसियत से ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ इस लेख के माध्यम से, विनम्रतापूर्वक अपनी राय ज़ाहिर कर रहा है।
घोषित उद्देश्य और क्रूर हकीक़त “देश में एक जीवंत मार्केटिंग तंत्र का निर्माण करना, जिससे सभी श्रेणी के किसानों को अपनी उपज के लिए सर्वोत्तम मूल्य प्राप्त करने के लिए, मनचाहा बाजार मिल सके, जिससे बेहतर दक्षता, बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा, कई मार्केटिंग चैनलों की जगह एकाधिकार बाजार संरचना, पूरी पारदर्शिता के साथ प्रस्थापित की जा सके, तथा नवीन डिजिटल प्रौद्योगिकी संपन्न कृषि का बुनियादी ढांचा और मूल्य शृंखला आधारित विपणन की व्यवस्था मज़बूत हो सके।” लच्छेदार भाषा के इस्तेमाल से ही अगर विकास आ जाया करता तो मोदी सरकार वाक़ई भारत को विश्वगुरु बन चुकी होती। पिछले 10 साल का तजुर्बा बताता है कि मोदी सरकार ऐसी अलंकृत भाषा की लफ्फाज़ी अपने असल मक़सद को छुपाने और लोगों को भरमाने के लिए इस्तेमाल करती आई है। आइये, बहुत ही अहम मुद्दे पर जारी इस ड्राफ्ट को गंभीरता से परखें।
ड्राफ्ट स्वीकार करता है कि कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। वर्ष 2023-24 में, अन्न का उत्पादन 328.85 मिलियन टन, तिलहन का उत्पादन 39.59 मिलियन टन तथा फलों का उत्पादन 352.23 मिलियन टन के रिकॉर्ड को छू गया। सरकारें नहीं, बल्कि देश के मेहनतक़श किसान और खेत मज़दूर इस शानदार उपलब्धि के लिए दिली मुबारकबाद के हक़दार हैं। हम देश के इन बहादुर योद्धाओं को बा-अदब सलाम करते हैं। ड्राफ्ट भी हालांकि इस क्रूर हक़ीक़त को नहीं नकार पाया कि छोटे और सीमांत किसानों तक, जो कि किसानों की कुल तादाद का 87 प्रतिशत हैं, इस बंपर उत्पादन का फ़ायदा नहीं पहुंचा तथा ग्रामीण क्षेत्र में विकास दर, शहरी क्षेत्र से कम रही। हम तो जानते हैंैं लेकिन हुकूमत को भी जानना चाहिए, ऐसा क्यों हुआ?
31.03.24 को देश में कुल 7027 कृषि मंडियां थींं। ‘कृषि उपज मंडी कमेटी क़ानून 2003’ को देश के कुल 27 राज्यों और 3 केंद्र शासित राज्यों ने लागू किया लेकिन 3 राज्यों; बिहार, केरल तथा मणिपुर ने लागू नहीं किया। केरल का तो समझ आता है, क्योंकि वहां मुख्य फसलें, मसाले और रबर हैं, जिनकी खऱीद के लिए सुसंगठित सहकारी संस्थाएं हैं, जिन्हें बेचना किसानों के हित में रहता है, मणिपुर की कृषि भी विशिष्ट है और मंडी व्यवस्था से मेल नहीं खाती, लेकिन कृषि मंडी क़ानून को काल-वाह्य बताने वाले महा विद्वानों को यह ज़रूर जानना चाहिए था कि मंडियां ख़त्म होने से बिहार की खेती का कितना सत्यानाश हुआ है। मोदी सरकार के घोषणावीरों को उसकी ज़रूरत महसूस नहीं हुई क्योंकि अन्य घोषणाओं की तरह मौजूदा ड्राफ्ट का घोषित उद्देश्य कुछ और है और असल मक़सद कुछ और।
मंडियों की ‘न्यू डायनामिक्स’, मतलब कृषि बाज़ार को कॉर्पोरेट की शिकारगाह बनाना 39 पृष्ठ के ड्राफ्ट में आधे से ज्यादा पन्ने बेतुके आंकड़ों, नक्शों और अलग-अलग डिज़ाइन की ग्राफि़क्स से भरे हैं। इस क़वायद का असल मक़सद रायदाताओं को भरमाना मात्र है। संयुक्त राष्ट्र निर्धारित ‘टिकाऊ विकास लक्ष्य की बात भी बाजीगरी करने के अंदाज़ में बेवजह घुसेड़ी गई है। मुद्दे की बात, ड्राफ्ट के अध्याय 6 से शुरू होती है जहाँ ‘मंडियों में प्रोफेशनलिज्म लाना और मंडियों की न्यू डायनामिक्स’ जैसे धमाकेदार शाब्दिक आडंबर की भरमार है। ‘वैल्यू एडिशन से किसानों के उत्पाद भी व्यापार के योग्य बनेंगे, उनके उत्पाद की शेल्फ़ लाइफ भी बढ़ेगी, उनका भी लाभ होगा और मंडियों का लाभ भी बढ़ेगा! ऐसे जुमले ठग इस्तेमाल करते हैं। मोदी सरकार किसी भी बात को सीधी सरल भाषा में क्यों नहीं कहती? क्या किसानों को इतना मूर्ख समझा है कि वे ऐसे लच्छेदार लफ्ज़़ों से बहक जाएंगे?
‘कृषि अनाज मंडियां बदलती परिस्थितियों में ज्यादा दिन नहीं टिक पाएंगी’। ‘निर्यात बाज़ार गठित नहीं हो पाएंगे’. ‘प्रतिस्पर्धापूर्ण और विकसित कृषि बाज़ार बनाना है। ड्राफ्ट में निशाने पर अनाज मंडियां हैं, भले, बातों को गोल-गोल घुमाकर रसीली जलेबियां बनाने की कोशिश की गई है। ड्राफ्ट को इन बिंदुओं के ज़रिए समझा जा सकता है ‘डायरेक्ट मार्केटिंग; अर्थात बड़े संगठित व्यापारियों, निर्यातकों, भारी खऱीद करने वाली कंपनियों (बल्क बायर) को कृषि फार्म से ही खऱीदी की इज़ाज़त देना। समझना मुश्किल नहीं कि मोदी सरकार का लक्ष्य, खेती को कॉर्पोरेट के हाथों में सौंपना तथा कृषि मंडियों की समूची व्यवस्था पर प्राण घातक हमला करना है। उन्हीं तीन कृषि क़ानूनों को फिर से लाने का मक़सद साफ़ ज़ाहिर हो रहा है जिन्हें वापस कराने के लिए देश के किसान अक्षरश: अपनी जान पर खेल गए थे, 761 किसानों ने अपनी शहादत देकर प्रधानमंत्री को ‘मेरी तपस्या में कमी रह गई जैसे बोल-वचन बोलकर कृषि क़ानून वापस लेने को मज़बूर किया था। मंडियों की जगह, ‘डायरेक्ट मार्केटिंग वाली यह प्रस्तावित व्यवस्था, 87प्रतिशत सीमांत और लघु किसानों को ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े चौधरियों को भी मार डालेगी।
बड़े-बड़े भंडारगृह, साइलो, कोल्ड स्टोरेज को ही मार्केट यार्ड समझना यह क़दम पूंजी के बड़े-बड़े मगरमच्छों को छोटे-छोटे किसानों को निगल जाने की सुविधा प्रदान करना तथा अभूतपूर्व बेरोजग़ारी और मंहगाई से कराहते देश के सैकड़ों करोड़ मेहनतक़शों को मुट्ठी भर दानों का मोहताज़ बना देने जैसा तथा दूसरी ओर अडानी-अंबानी जैसे धनपशुओं को कृषि बाज़ार की लूट की छूट देने जैसा है। यह नीति लागू करना पहले वाले काले तीन कृषि क़ानूनों में तीसरे क़ानून को, जिसमें किसी भी अन्न का कितना भी स्टॉक जमा करने की छूट दी जाने वाली थी बहाल करने जैसा हैै। ड्राफ्ट में बार-बार नया ‘इको सिस्टम’ बनाने की बात कही गई है। ऐसे क़ानून बनाकर जो नया इको सिस्टम बनेगा वह ज़हरीला इको सिस्टम होगा जिसकी चपेट में मुक़म्मल मुल्क आ जाएगा।
‘निजी ई ट्रेडिंग प्लेटफार्मÓ प्रस्थापित करना और उन्हें चलाने की अनुमति देना जिस देश में 66त्न किसानों के पास 1 हेक्टेयर से भी कम ज़मीन बची हो जहाँ आधे से ज्यादा किसानों को, आधे भूखे, आधे नंगे रहकर अपने परिवार को किसी तरह जिंदा रखने के लिए आधा साल शहरों में मज़दूरी करनी पड़ती हो जहां 48 किसान हर रोज़ ख़ुदकशी करने को मज़बूर हों, वहां हर वक़्त खेती-किसानी में ‘ई नेम और डिजिटल-डिजिटल की लफ्फाजी करना गंभीर अपराध से कम नहीं है। यूरोप जैसी ‘कॉर्पोरेट फार्मिंग लाने के ख़्वाब दिखाना, गावों को वीरान करने का ऐलान करने जैसा है। ई-ट्रेडिंग के नाम परअडानी-अंबानी-टाटा-एलएंडटी के सुब्रह्मन्यन जैसे मुंशियों को शेयर बाज़ार में गेहूं, चावल, तेल, दाल की ‘फॉरवर्ड ट्रेडिंग की छूट मोदी सरकार देने जा रही है।
खेती-किसानी को निर्यातोन्मुख बनाना खेती-किसानी को निर्यातोन्मुख बनाना, फलों-सब्जियों की प्रेसिसिंग यूनिट बनाना, जेम और कैचअप आदि बनाना, सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन ये तजवीज़ कितने और कौन से किसानों को लाभ पहुंचाएंगी? सरकार यह भूलने, पता न होने का ढोंग क्यों करती है कि 87प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टर से कम जिनमें से 66प्रतिशत के पास 1 हेक्टर से भी कम ज़मीन बची है जो अपनी खड़ी फ़सल को व्यापारियों को दिखाकर कज़ऱ् लेने को मज़बूर होते हैं फसल आते ही सारी की सारी उपज तुरंत, किसी भी भाव बेच डालने को मज़बूर होते हैं भले 4 महीने बाद उन्हें अपने घर के खाने के लिए ही गेहूं और चावल बाज़ार से बढ़े दामों पर खऱीदने ही क्यों ना पड़ें। ऐसे किसान क्या टोमेटो-कैचअप प्लांट लगा पाएंगे? क्या वे अपनी 4-5 क्विंटल गेहूं का निर्यात कर पाएंगे? सरकार खुलकर क्यों नहीं कहती कि उनका असल मक़सद 1त्न अत्यंत धनी फार्मरों और मुख्य रूप से अकूत पूंजी के पहाड़ पर बैठे कॉर्पोरेट अडानी, अंबानी, टाटा, नारायण मूर्ति, एलएंडटी आदि के हाथों खेती-किसानी को सौंपना है? मोदी सरकार मौजूदा कृषि मार्केटिंग संबंधी इस ड्राफ्ट के असल मक़सद को छुपाने में क़ामयाब नहीं हो पाएगी।
‘व्यापार करने की सुगमता के बाद प्रस्तुत है ‘कृषि व्यापार करने की सुगमता का झुनझुना श्रम विभाग, भविष्य निधि विभाग तथा कर्मचारी राज्य बीमा निगम के अधिकारी स्पष्ट कहते हैं ‘वे जानते हैं कि कारखानेदार किसी भी श्रम क़ानून का अनुपालन नहीं कर रहे, 70 प्रतिशत मालिक अपने मज़दूरों के वेतन से काटी गई पीएफ़ और ईएसआईसी की कटौती भी डकार रहे हैं, उसे भी सरकारी खज़ाने में जमा नहीं कर रहे लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि हमें लिखित आदेश हैं कि मालिक जो मजऱ्ी करें आपको बीच में नहीं आना है। अगर किसी कारख़ाने में चेकिंग करने जाना है तो पहले राज्य मुख्यालय मतलब चंडीगढ़ कार्यालय से अनुमति लो। वह अगर मिल जाए तो कारखानेदार को सूचित करो कि हम फलां तारीख को इस वक़््त आपके कारखाने में आने की सोच रहे हैं, आपको कोई आपत्ति तो नहीं, आप बुरा तो नहीं मानेंगे! ये है मोदी सरकार की कारखानेदारों को दी गई ‘व्यापार की सुगमता की हक़ीक़त!
अब मोदी सरकार बड़े धन्ना सेठों और उनके ही जैसे अरबपति फार्मरों को ‘कृषि व्यापार की सुगमता प्रदान करने जा रही है। पूंजीपति वर्ग, उसके भी सबसे वर्चस्वकारी तबक़े ‘कॉर्पोरेट वर्ग, उसमें भी उनके सबसे लाडले, लगभग 1 दजऱ्न अति-धनी मगरमच्छों को हर कि़स्म की सुगमता प्रदान करना और किसी भी प्रकार के विरोध को बेरहमी से कुचल डालना ही ‘कृषि व्यापार की सुगमता का असल मक़सद है।
राष्ट्रीय स्तर पर ‘कृषि का एकीकृत बाज़ार बनाने का विचार ख़तरनाक है मोदी सरकार को ‘एक देश एक चुनाव की तजऱ् पर इतने विशाल और विविधतापूर्ण देश में सब कुछ एक समान करने की जो सनक चढ़ी है, उसके परिणाम देश के लिए घातक होंगे। विविधता की खूबसूरती इस सरकार को क्यों नहीं भाती? महाद्वीप जैसे हमारे देश में सब कुछ एक समान करने की जि़द एक विकृति है। ड्राफ्ट में समूचे देश में ‘एकीकृत बाज़ार बनाने को उचित ठहराने वाले कुतर्कों में लिखा हुआ है “राज्यों द्वारा नियंत्रित मंडी क़ानून एकीकृत बाज़ार बनाने के अभियान में बाधक हैं”। घूम फिर कर मंडी क़ानून पर हमले की मोदी सरकार की नीयत ड्राफ्ट के हर पैराग्राफ में उभरकर सामने आती है। केरल और कश्मीर तथा मणिपुर और भुज की खेती किसानी में क्या कोई समानता है? अपने राज्यों की खेती के लिए किस सीजन में क्या योजना ठीक रहेगी यह बात उक्त राज्य के लोग बेहतर समझते हैं या नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक रायसीना हिल में बैठे बाबू? संविधान निर्माताओं ने जो फ़ेडरल स्ट्रक्चर तैयार किया है हर मुद्दे पर उसकी बुनियाद हिलाने की हिमाक़त घातक होगी। इस गुलदस्ते की खूबसूरती इसकी विविधता में है सभी फूल यकरंगी मत बनाइये, हुजूर।
सरकार का नीतिगत हस्तक्षेप ड्राफ्ट के 39 पृष्ठ रसीले लेकिन बेतुके और बेवज़ह जुमलों से भरे पड़े हैं जिन पर टिप्पणियां करना वक़्त की बरबादी है। सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप वाले अध्याय में मौजूद जुमलों की बानगी प्रस्तुत है : ‘सशक्त कृषि सुधार कमेटी द्वारा राज्यों के कृषि मंत्रियों से बातचीत ‘कृषि बाज़ार सुधार कमेटी की सिफ़ारिशें, ‘कृषि बाज़ार की सुगमता, ‘सूचना तकनीक द्वारा खेती एवं कृषि बाज़ार के सशक्तिकरण, ‘प्रक्रिया का एक सिरे से दूसरे सिरे तक स्वचालन (एंड टॅू एंड प्रोसेस ऑटोमेशन), ‘लाइसेंस और पंजीकरण के डिजिटलीकरण और सरलीकरण, ‘किसानों के भुगतान के सरलीकरण, ‘कृषि बाज़ार में शोध नेटवर्क ‘एग्मार्कनेट, ‘ई-नेम, ‘किसानों का मौसम और बाज़ार के ज़ोखिम से बचाव, ‘ठेका खेती को लाभदायक बनाना, ‘प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना को किसानों के लिए आकर्षक बनाना ‘खेती को निर्यातोन्मुख तथा प्रतिस्पर्धा में बाज़ी मारने लायक़ बनाना, ‘क्षमता का निर्माण (कैपिसिटी बिल्डिंग), ‘एग्री वैल्यू चेन को किसान अनुकूल बनाना!
मोदी सरकार की ‘प्रस्तावित कृषि बाज़ार नीति को नाकाम करो लोगों की राय जानने के लिए, केन्द्रीय ‘कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी कृषि उपज मार्केटिंग नीति ड्राफ्ट काले कृषि क़ानूनों को और भी विकराल रूप में वापस लाने की क़वायद है। रायशुमारी करना भी एक नौटंकी है क्योंकि मोदी सरकार किसी योजना को लागू करने की तैयारी और दृढ निश्चय कर लेने के बाद ही उस मसले पर जनमत जानने का पाखंड करती है। देश के किसानों और मज़दूरों द्वारा 13 महीने तक बहुत ही शानदार आंदोलन चलाकर मोदी सरकार ने जिन 3 काले कृषि क़ानूनों को वापस लेने पर मज़बूर किया था उन्हें लाने से पहले भी कॉर्पोरेट के बड़े ताबेदार अशोक गुलाटी की अध्यक्षता में कमेटी बनाकर इसी तरह राय जानने का दिखावा किया गया था। संसद में क़ानून पास करा लेना भी महज़ एक औपचारिकता ही है। उनका कोई क़ानून संसद में नहीं अटकता।
24 जनवरी को सुरजीत भवन, नई दिल्ली में संयुक्त किसान मोर्चे की जनरल बॉडी की मीटिंग हुई। इसमें क्रांतिकारी किसान मोर्चे ने भी भाग लिया। हमें यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई कि किसान नेता इस हकीक़त को जान चुके हैं कि यह प्रस्तावित क़ानून रद्द हुए 3 काले कृषि कानूनों को वापस लाने की साजिश है और उन्होंने ऐलान किया है कि इस साजिश को भी नाकाम किया जाएगा। समूचे देश में एक व्यापक किसान-मज़दूर आंदोलन छेडऩे की तैयारियां पूरी शिद्दत से शुरू हो गई हैं। सभा में हमें अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला। हम अपनी मंशा इस लेख के माध्यम से ज़ाहिर कर रहे हैं।
समझना मुश्किल नहीं कि फासिस्ट मोदी सरकार अरबों लोगों के जीवन-मरण से सीधे जुड़े कृषि बाज़ार को भी बाक़ी उद्योगों की ही तरह कॉर्पोरेट को समर्पित करने के लिए बेचैन है। हमने दिसंबर 2021 में ही बता दिया था कि यह किसानों की जीत नहीं, बल्कि उन्हें दिल्ली की सीमाओं से हटाने का पैंतरा है। हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि कॉर्पोरेट के विरुद्ध लड़ाई, मज़दूरों को साथ लिए बगैर नहीं लड़ी जा सकती। किसान आंदोलन में मज़दूरों के शामिल होते ही कॉर्पोरेट की सांस फूल जाती है क्योंकि उनका मुनाफ़ा मज़दूरों की मेहनत के एक बड़े हिस्से को हड़प जाने से ही आता है। संयुक्त किसान मोर्चा भले मज़दूरों को आंदोलन का हिस्सा बनाने का ऐलान कर चुका है लेकिन उसकी कोई रुपरेखा ज़मीन पर नजऱ नहीं आ रही।
दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनें बैठकों में शामिल हो गईं मतलब देश के सारे मेहनतक़श मज़दूर, किसान आंदोलन में शामिल हो गए; ऐसा सोचना भूल है। वह ज़माना गुजर चुका। दस बड़ी ट्रेड यूनियनें अब उतनी बड़ी नहीं रहीं जितना दिखना चाहती हैं। यह बात इन यूनियनों के नेता भी जानते हैं। ऐसा होता तो हर जि़ले में मौजूद ‘संयुक्त ट्रेड यूनियन कौंसिल दफ़्तर इतने वीरान ना पड़े होते। गुडग़ांव-मानेसर को ही देख लीजिए मज़दूर ज़बरदस्त लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन वहां के इन ट्रेड यूनियन कौंसिल दफ्तरों में सन्नाटा पसरा है। फऱीदाबाद का हमारा तजुर्बा भी यही है। इन्हीं ट्रेड यूनियन कौंसिलों को ही संयुक्त ‘किसान-मज़दूर मोर्चा जि़ला कमेटी मान लिया गया है।
24 जनवरी को सुरजीत भवन नई दिल्ली में हुई संयुक्त किसान मोर्चे की जनरल बॉडी मीटिंग। पिछली 26 नवंबर को फऱीदाबाद में हुए किसानों-मज़दूरों के संयुक्त आक्रोश मार्च में जि़ले में मज़दूरों में काम कर रहे सभी संगठनों को भी शामिल किया जाए, हमारी इस मांग को ‘ट्रेड यूनियन कौंसिल ने कोई महत्व नहीं दिया। फिर भी हम आम पब्लिक की तरह पूरे कार्यक्रम में उपस्थित रहे और आगे भी रहेंगे। वेक़्त की ज़रूरत लेकिन यह है कि हर जि़ले में मज़दूरों में ज़मीनी काम कर रहे सभी संगठनों को जि़ला कमेटियों में शामिल किया जाए। ऐसे संगठनों को बोलने से रोकने की नहीं बल्कि उनकी बात सुनने की ज़रूरत है। केंद्रीय स्तर पर तय हुईं जन-आंदोलन की योजनाओं को प्रभावशाली ढंग से लागू करने के लिए जि़ला कमेटी बहुत अहम यूनिट ह। जिला कमेटियों को तथाकथित बड़ी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के चंगुल से आज़ाद करना होगा। इन्हें विस्तृत और जीवंत बनाने की दरक़ार है। उसी आधार पर प्रदेश स्तर तथा केंद्रीय स्तर पर भी दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के सीखचे से बाहर झांकने की ज़रूरत ह। दायरे को विस्तृत करने में संकोच मत करो। सभी क्रांतिकारी मज़दूर संगठनों को आंदोलन में शामिल करो। संकीर्णता छोड़ो सभी को बोलने दो। लड़ाई बड़ी और गंभीर है। मोदी सरकार भाव विभोर होकर कॉर्पोरेट की धुन पर नाच रही है। किसान आंदोलन में मज़दूरों को ही नहीं बल्कि सभी मेहनतक़श तबक़ों को गोलबंद किया जाना ज़रूरी ह।
‘दिल्ली चलो की कॉल देने में आवेशपूर्ण जल्दबाज़ी नहीं की जानी चाहिए। पिछले ऐतिहासिक किसान आंदोलन से पहले तीनों कृषि क़ानूनों के क्या भयानक परिणाम होंगे यह बात सारा देश जान चुका था। लोगों को यह सच्चाई बताने का काम किसानों ने तो किया ही था लेकिन मोदी सरकार ने ख़ुद भी किया था। ‘चारपाई पर चर्चा, ‘चाय पर चर्चा जैसे सरकारी कार्यक्रम चलाए गए थे जिनका मक़सद लोगों को यह बताना था कि कृषि क़ानून देश के लिए बहुत कल्याणकारी हैं! उस प्रक्रिया से लेकिन लोग उन क़ानूनों की असलियत जान गए। वे समझ गए कि मोदी सरकार उनके साथ फऱेब करने जा रही है। उसी का परिणाम था कि लाखों लोग, बिना बुलाए किसान मोर्चों की ओर खिंचे चले आते थे। यहां तक कि पुलिस के लोग भी लंगर छकते थे और हुक्का गुडग़ुड़ाते थे। सरकार भी यह सच्चाई जानती है इसीलिए जून 2024 में जारी इस ड्राफ्ट की चर्चा गोदी चेनलों से भी ग़ायब है। इस बार मोदी सरकार भी प्रस्तावित मार्केटिंग ढांचे के फ़ायदे नहीं गिना रही। ड्राफ्ट आए 7 महीने बीत गए लेकिन कहीं कोई चर्चा नहीं। किसानों, मज़दूरों और उनके साथ प्रतिबद्धता रखने वालों का फज़ऱ् है कि इस हकीक़त को देश के कोने-कोने में ले जाए। क़ामयाबी की तीसरी शर्त है कि इस आंदोलन को सही माने में अखिल भारतीय स्वरूप दिया जाए। हर प्रदेश के लोग साथ नजऱ आने चाहिएं, टोकन के रूप में नहीं बल्कि जन सैलाब के स्तर पर। पहला किसान आंदोलन सही माने में पूरे देश का आंदोलन नहीं बन पाया था। वैसा हो गया होता तो सरकार इतनी आसानी से ठगी न कर पाती। इस बार वह कसर नहीं रहने दी जानी चाहिए। दुबारा नहीं ठगा जाना चाहिए।
क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा घोर जन-विरोधी, किसान विरोधी, प्रस्तावित कृषि विपणन नीति के पुरज़ोर विरोध का ऐलान करता है और वह इसके विरुद्ध उठने वाले जन-आंदोलन में पूरी शिद्दत से भाग लेगा।