मज़दूर मोर्चा ब्यूरो माघ मेला, कुंभ और महाकुंभ मेला धर्म के नाम पर पाखंडी पंडितों की कमाई का जरिया तो सैकड़ों साल से रहा है लेकिन भाजपा की डबल इंजन सरकारों में यह आस्था की जगह महंगे पर्यटन, मौज मस्ती और धर्म के नाम पर दूसरे धर्म व नीची जातियों के अधिकार छीनने का षणयंत्र करने वालों का संगम बनकर रह गया है। सदियों से हो रहे इस धार्मिक आयोजन में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाने आते रहे हैं लेकिन यह पहला महाकुंभ है जिसमें कट्टरता, धर्म के नाम पर आडंबर ढकोसला, मान्यताओं का अपमान तो हो ही रहा है आस्था को बाजारवाद की भेंट चढ़ा दिया गया है। साधारण श्रद्धालु को ठंड से बचने के लिए खुद का रजाई कंबल भी ले जाना पड़ रहा है और स्नान के लिए धक्के भी खाने पड़ रहे हैं। इसके विपरीत 360 डिग्री व्यू वाले पंडालों में पाश्चात्य शौचालय से लेकर एयरकंडीशनर और नर्म मुलायम बिस्तरों की व्यवस्था है तो फाइव स्टार होटल जैसा खाना उपलब्ध है।
ट्रेन, बसों से आने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय श्रद्धालु महाकुंभ मेला स्थल तक पहुंचने के लिए पंद्रह से पच्चीस किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं ऑटो रिक्शा वाले भी मेला स्थल तक ले जाने के नाम पर मनमाना किराया वसूल कर आठ-दस किलोमीटर पहले ही उतार कर चल देते हैं। इसके विपरीत कार से आने वालों के लिए मेला स्थल से महज दो किलोमीटर दूर पार्किंग की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। अमीर श्रद्धालुओं के लिए वीआईपी भोजन-भंडारे की व्यवस्था है तो साधारण श्रद्धालु मेला परिसर में अपना चूल्हा भी चोरी छिप कर ही जला पा रहे हैं, यानी यहां आए हो तो महंगा खरीद कर ही पेट भरो। जानकारों के अनुसार योगी-मोदी की डबल इंजन सरकारों ने महाकुंभ को पर्यटन इवेंट बनाने के लिए अभी तक साढ़े सात हजार करोड़ रुपये खर्च किए हैं और इससे दो लाख करोड़ की कमाई का अनुमान लगाया जा रहा है, यानी आस्था के नाम पर भी सरकार कमाई करने में ही जुटी है।
हिंदू की जगह सनातन कह कर गर्व करने वाले कट्टरपंथियों के लिए यह महाकुंभ अपार भीड़ होने के कारण दूसरे धर्म के लोगों पर निशाना साधने का महत्वपूर्ण प्लेटफार्म बन गया है। सर्व धर्म समभाव की परंपरा वाले हिंदू धर्म में कट्टरता और असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाले बैनर पोस्टर भी मेला परिसर में लगाए गए हैं जिनमें मुसलमान समुदाय का निशाने पर लिया गया है। जाहिर है यह सब योगी-मोदी की डबल इंजन सरकारों की सहमति से ही हो रहा है। धर्म के कथित ठेकेदार और खुद को महामंडलेश्वर बताने वाले कई भगवाधारी हिंदू धर्म की बुराइयां दूर करने के बजाय मुसलमानों व इसाइयों की कमियां उठा कर अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हैं।
यहां धर्म के नाम पर होने वाली धर्म संसद में मनुवादी व्यवस्था को बढ़ावा देने और मुसलमानों-इसाइयों के सामाजिक बहिष्कार की न केवल खुलेआम चर्चा होती है बल्कि उस पर अमल करने के लिए बाकायदा लिखित दस्तावेज तैयार किए जाते हैं जो आम लोगों में नहीं बांटी जाती बल्कि संघ, भाजपा और उसके द्वारा शासित राज्य सरकारों के संघी मंत्री, अधिकारियों को गाइडलाइन के तौर पर दी जाती हैं। निश्चित संख्या में प्रकाशित इन गाइडलाइंस को सार्वजनिक नहीं करने और येन केन प्रकारेण लागू करने का आदेश धर्म संसद की ओर से दिया गया होता है।
देश की गंगा जमुनी संस्कृति को समाप्त करने में जुटे मोदी-योगी ने अखाड़ों द्वारा किए जाने वाले शाही स्नान का नाम बदल कर अमृत स्नान कर दिया। इतिहासकार बताते हैं कि कुंभ के दौरान पहले स्नान करने की लड़ाई खत्म करने के लिए मुगल सम्राट अकबर ने सुलह समझौता करवा सभी अखाड़ों के स्नान का समय तय कर दिया था। तब से इसे शाही स्नान कहा जाने लगा लेकिन इतिहास से मध्यकालीन भारत का अध्याय ही समाप्त करने वाले योगी-मोदी ने यहां से भी मुगलकाल की यादें समाप्त कर अपने कार्यकाल को अमृतकाल के रूप में प्रचारित करने के लिए इसे भी अमृत स्नान कर दिया।
धर्म के नाम पर सिर में फसल उगाने वाले, संन्यासी होने के बावजूद लोगों को चिमटे से पीटने वाले कथित शांति खोजी बाबाओं के साथ ही संन्यासियों के अखाड़ों में खूबसूरत बालाओं को दीक्षित कर अपने साथ रथों पर बैठाने और स्नान कराने की होड़ मची है। काम, क्रोध, मोह-माया को त्यागने वाले अखाड़ों के कथित संन्यासी इन्हीं ग्रंथियों से घिरे हुए हैं, आस्था के नाम पर जितना अधर्म इस महाकुंभ में देखने को मिल रहा है शायद इससे पहले कभी नही हुआ है। क्योंकि यह महाकुंभ योगी-मोदी की सरकारों द्वारा कराया जा रहा है तो गोदी मीडिया भी डंका बजाने में जुटा है।
सीएम योगी के राज में हो रहे पहले महाकुंभ को ऐतिहासिक बनाने और खुद को हिंदू हितैषी साबित करने में जुटी उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार सफलता के रूप में प्रचारित प्रसारित करने के लिए दिल खोल कर विज्ञापन लुटा रही है। सनातन का डंका बजाने में सरकार के साथ ताल में ताल मिला रहा मीडिया जोर शोर से प्रचार कर रहा है कि यह 144 साल बाद यह महाकुंभ पड़ा है इसलिए बहुत खास योग बन रहे हैं। 144 साल पहले के कुुंभ में क्या विशेषता थी उस कुुंभ का ऐतिहासिक महत्व और साक्ष्य क्या था इसका कोई उल्लेख नहीं किया जा रहा। बस, भाजपा सरकारों में हो रहा है तो इसे बहुत खास बनाने के लिए अंधभक्तों को आस्था की अफीम चटाई जा रही है। मीडिया में ही हिंदू धर्म के अनेक जानकारों को उल्लेख करते हुए बताया गया है कि माघ मेले का पहला उल्लेख गुप्त साम्राज्य के अंतिम शासकों में से एक सम्राट शिलादित्य (617-647) के शासनकाल में श्रीमद आग़ा जगतगुरू और उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य के वंशजों ने दशनामी संत अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की थी। हालांकि धर्म को सनातन बताने वाले ऋग्वैदिक काल में भी महाकुंभ होने का झूठ फैलाने में लगे हैं। बताते चलें कि ऋग्वैदिक आर्यों को सिंधु नदी जो अब पाकिस्तान में है से आगे की नदियों की जानकारी ही नहीं थी, इसीलिए ऋग्वेद में गंगा नदी का भी उल्लेख नहीं मिलता। यानी 144 वें कुंभ का डंका पीट कर योगी-मोदी के कार्यकाल को अमृत काल बनाया जा रहा है।