फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) फरीदाबाद नगर निगम में भ्रष्टाचार के एक से बढ़कर एक नगीने भरे हुए हैं। ऐसा ही एक नगीना है, धर्मपाल सिंह। यहां 2020 से चीफ टाऊन प्लानर (सीटीपी) पद पर विराजमान रहने वाला धर्मपाल बीच में डेढ़ साल तक निलंबित भी रहा, इस दौरान वह शहर से बाहर ही रहा। जिस तरह एक भ्रष्टाचारी अपनी हराम की कमाई खर्च कर और आला अधिकारियों व राजनेताओं को खुश कर लूट कमाई वाले पद पर लौट आते हैं उसी तरह धर्मपाल ने भी करीब एक साल पहले नगर निगम में सीटीपी की कुर्सी फिर से हासिल कर ली। सीट हासिल करने के बाद अब वह उन लोगों से चुन चुन कर बदला ले रहा है जिनकी शिकायत पर उसका निलंबन हुआ था, परेशान करने वाली बात यह है कि धर्मपाल के इस ‘कर्मÓ में निगमायुक्त धीरेंद्र खटगटा भी पूरी तरह साथ दे रहा है। इन दोनों अधिकारियों के निशाने पर शिकायतकर्ता अनमोल खुराना हैं।
शिकायतकर्ता अनमोल खुराना के साथ धर्मपाल और निगम के अधिकारियों का व्यवहार जिस तरह का रहा है वह न केवल नगर निगम में भ्रष्टाचार बल्कि पंचकूला में बैठे शहरी स्थानीय निकाय विभाग के अधिकारियों की भी कलई खोलता है। खुराना कोई आम शिकायतकर्ता नहीं, बल्कि फरीदाबाद की प्रमुख पैरामाउंट रबड़ फैक्ट्री के मालिक हैं। उनका कसूर सिर्फ इतना है कि वह 1950 के दशक में स्थापित होने के बाद जर्जर हो चुकी अपनी फैक्ट्री को आधुनिक रूप देना चाहते थे। इसके लिए सारी सरकारी फीस देने के लिए तैयार हैं, लेकिन धर्मपाल जैसे हरामखोरों की लूट कमाई खाने की आदत के चलते नियम-कानून का पालन करने के बावजूद खुराना को उनकी फैक्ट्री की इमारत नहीं बनाने दी गई और इतना परेशान किया कि उनका सारा काम धंधा ही चौपट हो गया। इसके चलते फैक्ट्री में कार्यरत 150 मजदूरों से कुछ तो छोड़ कर चले गए बाकी जो बचे उनको लेऑफ के नियमानुसार आधा वेतन कंपनी की ओर से दिया जाता रहा।
धर्मपाल जैसा घाघ अधिकारी और उसके लगुए भगुए कर्मचारी टाउन प्लानिंग शाखा में आवेदन करने वालों से जबराना वसूले बिना काम ही नहीं करते लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि अनमोल खुराना आम फैक्ट्री मालिक नहीं हैं। खुराना के दादा केबी खुराना उन पुरुषार्थियों में से थे, जिन्होंने भारत पाक विभाजन के बाद फरीदाबाद में आकर फैक्ट्री स्थापित की। आजादी के बाद नए शहर के रूप में जब फरीदाबाद बसाया जा रहा था उसी समय सबसे पहला एनआईटी इंडस्ट्रियल एरिया बसाया गया। उस समय देश विभाजन की विभीषिका झेल रहा था, लोगों के पास रोजगार नहीं था, ऐसे वक्त में उन्होंने न केवल खुद को खड़ा किया, बल्कि सैकड़ों लोगों को रोजगार भी दिया। उस समय केबी खुराना ने तत्कालीन इंडस्ट्रियल एरिया में एक प्लॉट लिया और रबड़ उत्पाद फैक्ट्री लगाई। देखते ही देखते पैरामाउंट रबड़ इंस्ट्रीज को भारतीय रेलवे जैसी बड़ी सरकारी संस्था का काम मिलने लगा। खुराना के पिता सुनील खुराना ने फैक्ट्री को नई ऊंचाइयां दीं। अनमोल खुराना दसवीं के बाद पढ़ाई के लिए विदेश चले गए और वहां बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट ग्रेजुएट कर परिवार की फैक्ट्री संभालने लौटे, उस समय देश कोविड और लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा था।
इन विषम परिस्थितियों में अनमोल ने काम संभाला और कोविड से ठीक पहले रेलवे ने फैक्ट्री को आधुनिक करने को कहा तो अनमोल तैयार हो गए। बस यहीं से उनकी दिक्कतें शुरू हो गईं। फैक्ट्री की बिल्डिंग तोड़ कर नए सिरे से बनाने के लिए उन्होंने शहर के नामी आर्किटेक्ट शिव सिंघला को आठ लाख रुपये में हायर किया जिसमें सरकारी फीस भी शामिल थी। सिंघला तो धर्मपाल का चेला है, उसने अनमोल से कहा कि नक्शा तो बन जाएगा, लेकिन उसे नगर निगम से पास कराना बड़ी टेढ़ी खीर है। सिंघला ने कहा कि इसके बजाय वह नगर निगम के अधिकारियों से बात करके एक तय रकम फिक्स करा लेगा, जिसे देकर खुराना बिना नक्शे के ही फैक्ट्री की बिल्डिंग खड़ी कर सकते हैं। अनमोल ने इसके लिए मना कर दिया क्योंकि वे जानते थे कि बगैर नक्शे की फैक्ट्री बनाने पर निगम वाले उसकी जान को परमानेंट ग्राहक बन जाएंगे। वास्तव में निगम के चोर अधिकारियों की नीयत ही यही है। इस पर सिंघला ने नक्शा बनाना शुरू किया, इधर फैक्ट्री की पुरानी बिल्डिंग गिरा दी गई। जून 2021 में नक्शा सब्मिट किया गया लेकिन सौदेेबाज अधिकारी सीटीपी धर्मपाल और जेई दीपक अहलावत नक्शा पास करने के बजाय लगातार सौदा करने का दबाव बनाते रहे, जब अनमोल नहीं माना तो पांच महीने बाद नवंबर 2021 मजबूरन नक्शा पास करना पड़ा। 14 जनवरी 2022 को बिल्डिंग बनाने का काम शुरू किया गया। बिल्डिंग अभी आधी ही बनी थी कि नगर निगम का तोडफ़ोड़ दस्ता आ धमका।
खुराना ने तोडफ़ोड़ की वजह जाननी चाही तो बताया गया कि प्लानिंग ब्रांच में जाकर मिलिए। दरअसल, यह सारा खेल धर्मपाल ने रचा था, उसे इस बात की खुंदक थी कि अनमोल खुराना ने उसे रिश्वत देने की बजाय नक्शा पास करवा लिया। धर्मपाल ने खुराना को परेशान करने के लिए बताया कि उसके प्लॉट पर सब डिविजन हुआ है इसलिए मोटा जुर्माना बनता है। खुराना ने सफाई दी कि सबडिवीजन 1968 में हुआ था और फरीदाबाद काँप्लेक्स रेगुलराइजेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट 1971 की धारा 42/1971 में साफ लिखा है कि 15 जनवरी 1972 से पहले के सबडिवीजन पर यह नियम लागू नहीं होगा, इसके बावजूद मोटी कमाई की लालच में अड़े धर्मपाल ने एक नहीं सुनी। खुराना ने तत्कालीन कमिश्नर जितेंद्र दहिया से मुलाकात की जिसको धर्मपाल ने पहले ही सब कु़छ समझा रखा था, इसलिए दहिया कहता रहा कि मुझे ये केस समझ नहीं आया। अब समझे समझाए को खुराना भला क्या समझा सकता था। इन हालत में फैक्ट्री बिल्डिंग निर्माण का काम रोक दिया गया। इसी बीच धर्मपाल को पता लग गया कि खुराना पर जल्दी माल सप्लाई करने का रेलवे द्वारा दबाव बढ़ता जा रहा है। इसलिए वह जानबूझ कर जितना टाल मटोल कर सकता सकता था, करता रहा। इस मामले में फरीदाबाद इंडस्ट्री एसोसिएशन, फरीदाबाद स्माल इंडस्ट्री एसोसिएशन के प्रधान जीएस त्यागी भी खुराना के पक्ष में आ गए, लेकिन न तो कमिश्नर सुनने को तैयार था और न धर्मपाल। इस बीच धर्मपाल का चेला जेई दीपक अहलावत अक्सर साइट पर पहुंच जाता। वह कभी धमकाता और कभी समझाता कि धर्मपाल जितना पैसा चाहता है, उतना दे, जबराना देने के बाद ही फैक्ट्री बन पाएगी, आर्किटेक्ट सिंघला भी उन्हें यही समझाता रहा।
आखिर एक दिन धर्मपाल ने खुल कर कह ही दिया कि अगर सबडिवीजन का नोटिस आया तो खुराना को तीन से साढ़े तीन करोड़ रुपए भरने होंगे, इसलिए दो करोड़ रुपये देकर मामला खत्म करते हैं। खुराना ने कहा कि डिमांड नोटिस जारी करो, वह पूरी पेनल्टी भरने के लिए तैयार है। धर्मपाल ऐसा कोई नोटिस जारी नहीं कर सका क्योंकि डिमांड बनती ही नहीं थी। इधर, दबाव बढ़ते देख कमिश्नर ने मामला डायरेक्टर अर्बन लोकल बॉडीज को भेज दिया। वहां तो धर्मपाल के भी गुरु बैठे हैं जिनकी सीधी सांठ गांठ धर्मपाल जैसों से रहती है। खुराना को वहां भी टरकाया जाने लगा। धर्मपाल के इशारे पर तत्कालीन डायरेक्टर यूलीबी आईएएस दुशमंता बेहरा ने भी कोई फैसला नहीं लिया। बेहरा के ट्रांसफर के बाद यशपाल यादव को डायरेक्टर बनाया गया। जाते जाते भी बेहरा के कार्यकाल में एक फर्जी चि_ी जारी की गई जिसको आधार बनाते हुए धर्मपाल ने खुराना को एक लेटर जारी किया, जिसमें कहा गया कि उनके प्लाट पर सबडिवीजन लागू होता है। जब खुराना ने धर्मपाल से चंडीगढ़ वाला कथित लेटर मांगा तो उसने नहीं दिया।
अब खुराना को शक हुआ और वह चंडीगढ़ पहुंच गए और यशपाल यादव से मिले और अपना पक्ष मजबूती से रखा। तथ्यों के आधार पर यशपाल यादव की दाल में काला होने का अंदाजा लग गया। उन्होंने खुराना को चीफ टाउन प्लानर हरियाणा नरेंद्र सोलंकी के पास भेजा। पहले से इस षणयंत्र में शामिल सोलंकी से अनमोल खुराना ने ओरिजनल लेटर और सबडिवीजन से संबंधित नोटिस मांगा लेकिन वह कोई कागज देने को तैयार नहीं हुआ। कहा कि यदि कोई कागज दिया तो धर्मपाल फंस जाएगा। अनमोल फिर यशपाल यादव से मिले तो उन्होंने तुरंत सोलंकी को बुलाया और खुराना के सामने ही उसे खूब जलील किया और धमकाया। उन्होंने अपने हाथ से लिखकर दिया कि इस तरह का कोई लेटर जारी नहीं किया गया। यह लेटर नगर निगम पहुंचने पर धर्मपाल ने नया खेल रचते हुए बोला कि तुम्हारा तो नक्शा ही ऑनलाइन नहीं है, जो उसने खुद ही एचओबीपीएएस पोर्टल से गायब कर दिया था। इसकी असल कॉपी विश्वासपात्र समझे जाने वाले आर्किटेक्ट शिव सिंघला के पास थी जिसे वह धर्मपाल के दबाव में देने को तैयार नहीं था। खुराना ने जुगत लगाकर उससे वह कॉपी हासिल कर ली जिस पर वह बहुत फडफ़ड़ाया।
इस बीच खुराना ने फरीदाबाद स्माल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के माध्यम से तत्कालीन सीएम खट्टर तक भी शिकायत पहुंचा दी। खट्टर ने खुराना व एफएसआईए के प्रधान जीएस त्यागी को बुलाया और मामला पीएस टू सीएम वी उमाशंकर को सौंप दिया गया। उमाशंकर ने खुराना को चंड़ीगढ़ बुलाकर पूरी बात समझी और दोनों चोरों को जेल भेजने के बजाय कमिश्नर दहिया व धर्मपाल का ट्रांसफर कर काम चला लिया ताकि ये दोनों नए स्थान पर जाकर लूट कमाई कर सकें। बाद में शहरी विकास मंत्री सुभाष सुधा ने धर्मपाल को कुछ समय के लिए सस्पेंड भी कर दिया जो बाद में बहाल होकर फिर यहीं आ जमा। खुराना ने अपनी फैक्ट्री की इमारत बनवा ली, इसमें लगभग डेढ़ साल लग गया। अब बारी आयी ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) की। ओसी भी तो इसी सीनियर टाउन प्लानर को ही जारी करनी होती है। निलंबन का बदला लेने के लिए अब धर्मपाल खुराना को ओसी नहीं जारी कर रहा है।
भ्रष्टाचार का अड्डा है नगर निगम नगर निगम में चीफ टाउन प्लानर का कार्यालय भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा है। कुछ निगम कर्मियों की मानें तो सीटीपी धर्मपाल ने इस पद पर रहते हुए अनेकों बेनाम संपत्तियां बनाई हैं। बताया जा रहा है कि लूट कमाई को खपाने के लिए सीटीपी महोदय ने राजस्थान के दौसा और सीकर में कई बेनामी पेट्रोल पंप खोल रखे हैं। इनके अलावा गुडग़ांव मे भी ओयो होटल, गेस्ट हाउस आदि कई बेनामी संपत्तियां भी उन्होंने बना रखी हैं। इन बातों में कितनी सच्चाई है, यह जांच के बाद ही सामने आएगा लेकिन यदि किसी अधिकारी के साथी या मातहत इस तरह की बातें कर रहे हैं तो सरकार को धर्मपाल की संपत्ति की जांच करा लेनी चाहिए। सिर्फ धर्मपाल ही नहीं सीटीपी कार्यालय में जेई दीपक अहलावत भी कम नहीं बताए जाते हैं। निगम सूत्रों के अनुसार इनका काम उन संपत्तियों पर नजर रखना है जो बिना सब डिवीजन, या नक्शा पास कराए बनाई जा रही हैं। ऐसी संपत्तियों को नोटिस भेज कर सौदेबाजी की जाती है। सौदा होने के बाद नोटिस में बताया गया एरिया काफी कम कर बहुत छोटा सा जुर्माना लगाया जाता है ताकि सरकारी रिकॉर्ड मेनटेन रहे और बाकी एरिया का पैसा सबमें बंटता है। सहमर्कियों में चर्चा तो यह भी है कि जेई साहब पत्नी परिवार को छोड़ कर सैनिक कॉलोनी एरिया में एक महिला मित्र के यहां ही रहते हैं और वेतन व ऊपरी कमाई इसी पर दिल खोल कर खर्च करते हैं। निगम में क्लर्क बिंटू सबसे शातिर बताया जाता है, निगम सूत्र बताते हैं कि यह भ्रष्टाचारी धनेश अदलखा का तब से चेला है जब वह पार्षद था। अदलखा के गांव का होने के कारण बिंटू धनेश को चाचा बताता है। सूत्रों के अनुसार बिंटू रिकॉर्ड खंगाल कर निगम क्षेत्र में विवादित, अन अटेंडेड आदि प्रकार की जमीनों की जानकारी धनेश अदलखा को देता और वह उस पर कब्जा करवाता। हार्डवेयर चौक के पास जिस बेशकीमती जमीन पर धनेश अदलखा ने अपना कार्यालय बना रखा है, उसकी जानकारी भी इसी बिंटू ने दी थी बताई जाती है। इस ब्रांच में प्रियंका नागर भी लंबे समय से जमी हुई है। उसे भी केंद्रीय मंत्री गूजर और उसके चेले धनेश अदलखा का वरद्हस्त प्राप्त है। ये सभी कर्मचारी काफी लंबे समय से प्लानिंग शाखा में जमे हुए हैं। जानकार बताते हैं कि ये सारे मिलकर गुट बनाए हुए हैं, यदि जेई का तबादला कर किसी दूसरे को भेजा जाता है तो सारा स्टाफ उससे इतना असहयोग करता है कि वह बेचारा खुद ही तबादला करवा लेता है। यदि इनमें से किसी कर्मचारी का तबादला किया जाता है तो जेई महोदय नए आने वाले को इतना परेशान करते कि वह भी बेचारा कभी दोबारा प्लानिंग ब्रांच की ओर देखने की हिम्मत नहीं करता। समझा जा सकता है कि यह सारा खेल मोटी लूट कमाई के लिए ही होता है। दरअसल यह सारा खेल, सरकार के संरक्षण व हिस्सापत्ती में चलता है। नगर निगम हो या हूडा या ऐसे ही कमाई के अन्य अड्डे उन सबका कमाई का ठेका बाकायदा मुख्यमंत्री कार्यालय से छोड़ा जाता है, इसीलिए हर साल छह महीने में किसी नए ठेकेदार के रूप में अधिकारियों के तबादले होते रहते हैं। यदि सरकार की मिलीभगत निगम अधिकारियों के साथ न होती तो अनमोल खुराना की पहली शिकायत पर ही धर्मपाल व निगमायुक्त दहिया के कान सही ढंग से मरोड़े जा सकते थे। इसी तरह पंचकूला स्थित मुख्यालय कार्यालय में बैठे अधिकारी भी इसी खेल के माहिर खिलाड़ी हैं जो खुल कर लूट कमाई का खेल खेलते हैं। मुख्यमंत्री केवल दिखावे के लिए इन चोरों के खिलाफ कार्रवाई करने का भरोसा तो देते हैं लेकिन वास्तव में कुछ करना नहीं चाहते, क्या वे खडगटा से पूछ नहीं सकते कि वह ओसी देने के लिए धर्मपाल के विरुद्ध शिकायत वापसी की शर्त क्यों लगा रहे हैं।
नेताओं को माला पहनाने के लिए ही हैं औद्योगिक संस्थाएं उद्यमियों के हितों की रक्षा के दावे करने वाले औद्योगिक संगठन शहर में आधा दर्जन से भी ज्यादा हैं लेकिन कोई संगठन पांच साल से फैक्टरी चलाने की लड़ाई लड़ रहे अनमोल खुराना का साथ देने नहीं आया। धिक्कार है ऐसे संगठन और उनके पदाधिकारियों पर जो नेता-मंत्रियों के आगे बिछे रहते हैं, इवेंट में मालाएं पहना कर गिफ्ट देकर उनके साथ फोटो खिंचा कर खुद को धन्य समझते हैं। चुनाव में इन्हें मोटा चंदा भी देते हैं लेकिन जब किसी उद्यमी के हक की बात आए तो नेता-मंत्री के सामने हक की बात रखने की भी इनमें हिम्मत नहीं होती, समझा जा सकता है कि ये उद्यमियों के कितने भले हैं। खट्टर-सैनी की निकम्मी सरकार और उसके रिश्वती अधिकारियों ने लूट कमाई के लिए एक फैक्टरी को पांच साल से लटकाए रखा है, इससे सैकड़ों कामगार रोजगार से वंचित रहे और देश की जीडीपी को भी योगदान न होने नुकसान हुआ। मोदी-खट्टर-सैनी सरकार बीते दस बारह साल से ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का ढिंढोरा पीट रही हैं, अनमोल खुराना की फैक्टरी का नहीं चल पाना बता रहा है कि ये सारी बातें चोंचलेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं, इसके उलट शासन और प्रशासन में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, लाल फीताशाही का बोलबाला है। अनमोल खुराना का मामला उद्यमियों को यह सबक भी देता है कि कथित औद्योगिक संगठन और उनके पदाधिकारी उद्यमियों से वसूले गए चंदे की रकम उद्योगों के हित में नहीं बल्कि सत्ता के मंत्री-नेताओं के आगे बिछने और उनकी चाटुकारिता में बर्बाद करते हैं।