अनूप चौधरी चंडीगढ़। ठिठुरते मौसम में शीत लहर के बीच साल 2024 अलविदा हो गया पर जाने से पहले संविधान और लोकतंत्र को तार-तार कर गया। नगर निगम से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में लोकतंत्र लूटने वालों ने सभी मर्यादाएं लांघ कर देश की तमाम सांविधानिक संस्थाओं का चीरहरण कर लिया। अयोध्या में राम और मथुरा में कृष्ण भगवान पापियों की इस लीला को देखते हुए भी मूकदर्शक बने रहे। श्रीराम के नाम पर सत्ता में आए पाखंडी अब किसी देश में महाभारत कर रहे हैं। हालांकि पाखंडी राष्ट्रभक्तों 2014 मे ही लोकतंत्र और संविधान की जड़ें काटनी शुरू कर दी थीं। ये दीगर बात है कि सब जानते समझते हुए भी जनता और बुद्धिजीवी मूकदर्शक बने रहे। उस समय लोग कांग्रेस से बहुत नाराज़ थे और कांग्रेसियों को सबक सिखाना चाहते थे, पर कांग्रेस को सबक सिखाने के चक्कर में अपनी आजादी और मूल अधिकारों से हाथ धो बैठे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उंगली उठाने वालों और सवाल करने वालों को बेबुनियाद आरोप लगा कर गंभीर आपराधिक धाराओं में जेल में डाल दिया गया, आम लोगों की तो बिसात ही क्या थी।
येन-केन प्रकारेण राज्य सरकारों को गिराया गया। मजदूर से लेकर मुख्यमंत्रियों को जेल में डाल दिया गया। न्यायालयों का आलम यह रहा कि जमानत तक नहीं होने दी। इलेक्टोरल बाँड को अवैध ठहरा कर इसे असंवैधानिक करार दिया गया। सभी मर्यादाओं को ताक पर रख कर ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल कर छोटे से लेकर बड़े कार्पोरेट जगत को डरभय दिखाकर जबरन चंदा वसूली की गई।
गौतम अडानी को बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने अपनी और संसद की साख गिरा दी। अडानी पर उंगली उठाने वालों की लोकसभा सदस्यता छीन ली गई। पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु समेत विपक्षी सरकारों को राज्यपालों ने शासन नहीं चलाने दिया गया।
संवैधानिक कामों के रास्ते में रुकावटें खड़ी की गईं। विधानसभा में पारित बिलों को रोके रखा गया। सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद भी कोई असर दिखा नहीं। यह सभी बातें संविधान को अप्रासंगिक करने वाली थीं। सही मायने में लोकतंत्र पर डकैती तो भाजपा ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का गिरोह बना कर लोकसभा चुनाव में डाली। सात चरणों में चली चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं के फैसले को चुनाव आयोग ने ईवीएम के जरिए बदल दिया। चुनाव आयोग ने आज तक भी यह नहीं बताया कि चुनाव में कुल कितने वोट पड़े। इस के विपरीत आज भी बिना प्रमाणित मतदान प्रतिशत की बातें उसके द्वारा की जा रही हैं। इसी के चलते भाजपा अस्सी-नब्बे सीटों पर खेला कर गई। लोगों ने विपक्ष के हक में फैसला दिया था पर मजबूत विपक्ष भी आक्रामक तेवरों के साथ सड़कों पर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
नतीजतन बैकफुट पर आई भाजपा इंडिया गठबंधन की अंदरूनी फूट को देख कर फ्रंट फुट पर आ गई। हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग और ईवीएम का इस्तेमाल कर सत्ता हासिल कर ली। हालांकि की जम्मू-कश्मीर चुनाव में भाजपा घाटी में कुछ नहीं कर पाई, पर जम्मू में खेला कर दिया। इसी तरह झारखंड में तमाम हथकंडे अपना कर भी भाजपा पार नहीं पा सकी। हरियाणा और महाराष्ट्र से ज्यादा मजबूत जुझारू और आत्म सम्मान तो आदीवासियों ने दिखाया। चुनावी राजनीति से हटकर बात करें तो जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सत्तारूढ़ नेताओं के दरबार में पांव में घुंघरू बांध कर मुजरा करते दिखे। ईडी-सीबीआई ने सभी मर्यादाओं को लांघ कर गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की ड्योढ़ी पर खड़े पालतू कुत्तों जैसी हो गई।
पुलिस-प्रशासन का जिक्र करना बेमानी है। अलबत्ता सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले सरपंचों, पेपर लीक होने से आहत छात्रा की आवाज दबाने के लिए सभी भाजपा शासित राज्यों में पुलिस ने लाठियां भांजी। बुलडोजर चलन को बढ़ावा देने के लिए भी 2024 को याद किया जाएगा। संविधान की अनदेखी कर देश के कोने-कोने में मस्जिद के नीचे मंदिर को तलाशने की मुहिम चरम पर है।