अरावली का विनाश सिफऱ् मज़दूर बस्तियों से होता है, अमीरों की ऐशगाहों से तो पर्यावरण मज़बूत होता है ! क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा 12 दिसंबर को फऱीदाबाद की एक और मज़दूर बस्ती उजाड़ दी गई। 50 झुग्गियों को नेस्तोनाबूद करने में बुलडोज़र को 50 मिनट भी नहीं लगे। इस दैत्याकार मशीन, जिसे भी फऱीदाबाद के मज़दूर ही बनाते हैं की एक ठोकर से झुग्गी का ढांचा चरमराकर ज़मीन पर बिखर गया। बर्तन-भांडे, बच्चों की कि़ताबें-कापियां सब बिखर गए। बच्चे सहम कर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं और बड़े ज़मीन पर बैठकर पहले दूर आकाश में देखते हुए लंबी सांस लेते है, फिर दोनों हाथों में अपना सर रखकर रोने लगते हैं। 30 नवंबर को इसी झुग्गी बस्ती से सुबह 11 बजे एक महिला मज़दूर ने घबराकर हांफते हुए, ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ को फोन किया था; बाबूजी जल्दी आइये, बुलडोजऱ वाले आ गए हमारे घर तोडऩे। मोर्चे के महासचिव कॉमरेड सत्यवीर सिंह जो पड़ोस की हाउसिंग सोसाइटी प्रगति अपार्टमेंट में रहते हैं, तुरंत मौके पर पहुंच गए। नगर निगम अधिकारी से ऊंची आवाज में पूछा, कड़कड़ाती ठंड में ये मज़दूर कहां जाएंगे, कैसे जियेंगे? कम से कम नोटिस तो दिया होता। क्या अरावली जंगल की सरकारी ज़मीन पर इन मज़दूरों का ही अतिक्रमण है? मेरे साथ चलिए, मैं आपको सैकड़ों एकड़ के बड़े-बड़े अतिक्रमण दिखाऊंगा। हिम्मत है तो उन्हें तोड़कर दिखाइये। नगर निगम अधिकारी से पूछे गए इस सवाल का जवाब, बस्ती उजडऩे के विनाशकारी दृश्य पर खुश होकर उछल रहे पड़ोस की हाउसिंग सोसाइटी ‘शिवशक्ति’ और ‘रीटेक’ में रहने वाले स्वयं घोषित छुटभैया नेताओं ने इस तरह दिया; जहां मजऱ्ी जाएं, इनका हमने ठेका लिया है क्या? तुझे ज्यादा चिंता है इनकी, तो तू अपने फ़्लैट में ले जा!
रीटेक सोसाइटी निवासी सुरेंदर सिंह, सतनाम सिंह तथा भाजपा नेताओं के साथ अपने फोटो खिंचवाकर छुटभैया नेताओं की ठसक दिखाते घूमने वाले शिवशक्ति अपार्टमेंट निवासी पंकज सिंघल और उनके दो साथी, बहुत आक्रामक तेवर दिखाते हुए एक साथ चीख पड़े तू 405 नंबर में रहता है ना? मज़दूर नेता बनता है, तुझे मालूम है ये लोग क्या-क्या करते हैं? ये लोग शराब पीते हैं, यहां रंडीबाजी होती है। मारामारी होती है। इनकी वजह से बदनामी होती है। हमारे फ़्लैट की क़ीमत कम होती है। तू नहीं रोक सकता। हम तुझे भी ठीक कर देंगे। ये तेरे क्या लगते हैं? चुपचाप अपने घर चला जा। ये बंगाली हैं, रोहिंग्या हैं। बीच में आया तो तुझे भी मज़ा चखा देंगे। तू सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा कराएगा, तो तुझे भी अंदर करा देंगे। तू अभी तक हमें जानता नहीं है……..धाराप्रवाह गंदी गालियां।
अमीरों के सामने दुम हिलाने का अवसर पाकर ख़ुद को धन्य समझने वाला और गऱीबों से नफऱत कर उन पर टूट पडऩे वाला निम्न मध्य वर्गीय टटपूंजिया वर्ग का यह टोला इस बात से हैरान था कि उनके हमलावर तेवरों के और यह जानने के बावजूद भी कि उन्हें कई बड़े नेताओं की सेवा करने का तजुर्बा है, ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ का ये अकेला, उम्रदराज बंदा डर क्यों नहीं रहा?
उन्हें जवाब देने की बात के जिक्र से पहले एक और ज़रूरी हक़ीक़त बयां होना चाहती है। मौक़ा-ए-वारदात पर अब मारामारी होने वाली है इस माहौल का एक कोलेटरल फायदा यह हुआ कि नगर निगम अधिकारी अपने बुलडोजऱ के ड्राईवर से बोला; ‘चल मोड़ ले भाई, यहां तो अब ल_ बजने वाला है’! एक झुग्गी तोड़ चुका बुलडोजऱ, तेज़ी से बस्ती से बाहर निकल गया।
अब उस कमज़र्फ टोले को बिलकुल उसी तेवर से जवाब दिया गया : ये सरकारी ज़मीन है जो सरकार की होती है किसी स्वयं घोषित जागीरदार की नहीं। तुम लोग चाहे कितने भी नेताओं की मालिश क्यों न करते हो, सरकार नहीं हो। इन सोसायटियों में आधे से ज्यादा फ्लैटों में हर रोज़ दारू पी जाती है। गाली-गलौज वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हर रोज़ होते हैं। ये लोग गरीब हैं इसीलिए तुम रंडीबाजी का आरोप लगा रहे हो, थोड़ी तो शर्म करो। बंगाली होना, रोहिंग्या होना नहीं होता। वहां सिफऱ् एक मुस्लिम परिवार है, और उस परिवार को कोई भी बंदा शराब नहीं पीता। मुस्लिम होना भी गुनहगार होना नहीं होता।
भाजपा सरकार हर चौक-चौराहे पर शराब के ठेके क्यों खोल रही है, अपने नेताओं से ये सवाल तुम क्यों नहीं करते? तुम अपने नेता नरेंद्र मोदी से क्यों नहीं पूछते, जिसने नारा दिया था, 2022 तक, ‘जहां झुग्गी, वहां पक्का मकान’ देंगे। सरकारी जंगल की गंदे नाले किनारे की क्या इसी ज़मीन पर अतिक्रमण है? अनखीर चौक से शूटिंग रेंज तक एक लाइन से जो अतिक्रमण है, क्या उसके बारे में मुंह खोलने की हिम्मत है तुम लोगों में? शिक्षा माफिय़ा ने इन झुग्गियों के सामने कई एकड़ ज़मीन की स्टील के पतरों से जो घेराबंदी की हुई है उसे क्यों नहीं हटवाते? इससे क्या संबंध है? सवाल नगर निगम अधिकारी से पूछा जा रहा था तो तुम लोग क्यों जागीरदारी दिखलाने लगे?
उसी दिन यह भी पता चला कि ख़ुद को भाजपा का बड़ा नेता बताने वाला यही पंकज सिंघल पिछले चुनाव में गुडग़ांव में भाजपा की रैली में भीड़ बढ़ाकर अपनी राजनीतिक दुकान चमकाने की नीयत से इसी झुग्गी के इन्हीं मज़दूरों को बस में भरकर ले गया था। उन्हें पूड़ी भाजी और 500 का पत्ता भी मिलेगा, यह बोला गया था। इन मज़दूरों को उस 500 के पत्ते का अभी तक इंतज़ार है! एक गंभीर सवाल यह भी है कि आस-पास बिल्डिंगों के बहुत सारे लोग, तमाशबीन बने यह सब देख रहे थे लेकिन कोई भी मुंह नहीं खोल रहा था। उनमें कुछ ख़ुद को माक्र्सवादी और मज़दूर वर्ग का चैम्पियन भी कहलाना पसंद करते हैं। बुलडोजऱ लौट गया। इस बात की ख़ुशी होने के बावजूद मज़दूर बहुत गुस्से में थे लेकिन चुपचाप खड़े थे। उनकी चुप्पी समझी जा सकती है क्योंकि वे गऱीब हैं और असंगठित हैं। उनके मुंह खोलते ही ये उन्मादी फिऱकापरस्त टोला उन पर टूट पड़ता।
इस घटना के बाद भी झुग्गी बस्ती बर्बाद कराने वाला संघी टोला अपने काम में लगा रहा। लगातार प्रशासन पर दबाव बनाता रहा। 11 दिसंबर को लाउडस्पीकर से ऐलान हुआ कि कल झुग्गियां टूटेंगी सब अपना सामान निकाल लें। आखिरकार 12 दिसंबर को उन्हें क़ामयाबी मिल ही गई। सेक्टर 21 सी के अरावली से सटे इस क्षेत्र में 20 हाउसिंग सोसाइटी हैं जो सन 2000 के आस-पास बननी शुरू हुई थीं। बुंदेलखंड, जो यूपी और एमपी दोनों राज्यों में फैला है, जहां के देहात में कंगाली एक तरह की तबाही में बदल गई है, वह लगभग पूरा ही खाली होकर शहरों की झुग्गियों में समा गया है। छतरपुर जि़ले के एक मज़दूर साथी ने बताया कि अकेले उनके गांव के लगभग 200 लोग यहीं आस पास की झुग्गियों में किसी तरह जिंदा हैं।
वैसे तो समूचे ‘विकसित भारत’ के बिलकुल यही हाल हैं लेकिन बुंदेलखंड जैसे ही हालात पश्चिम बंगाल के गांव-देहात के भी हैं। इस वीरान झुग्गी में लगभग सभी मज़दूर, बुंदेलखंड और पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं। आस-पास की बिल्डिंगों में जो मध्य वर्ग रहता है उन्हें सुबह की बिस्तर वाली चाय से रात के खाने तक के लिए घरेलू मज़दूर चाहिए, बच्चों को पालने के लिए भी मज़दूर चाहिए और ऐसी महिला मज़दूर चाहिए जो बहुत कम मज़दूरी ले, जीवन में कभी भी छुट्टी ना ले, जो कभी बीमार ना पड़े। इस बस्ती की सारी महिलाएं इन्हीं फ्लैटों में झाडू, बर्तन, खाना आदि का काम करती थीं अभी भी करती हैं।
ये मध्य वर्ग, जिसकी मध्यवर्गीयता आज ख़तरे में है इसके बड़ा, मालदार आदमी बनने के सपने लगातार चकनाचूर हो रहे हैं। अगली पीढ़ी को सुरक्षित जीवन और आजीवन पेंशन वाली सरकारी नौकारियां मिलनी बंद हो चुकी हैं। ये कुंठा इस हताश-निराश निम्न मध्य वर्ग को फासीवादी टोले की ओर धकेल रही है। घरेलू महिला मज़दूर जो पहले दो-तीन बार घरों में काम करने आ जाती थीं अब चूंकि अनखीर गांव में किराए के कमरे में रहने लगी हैं, बस एक बार ही आ पाती हैं। आधी मज़दूरी किराए में चली जाती है, इसलिए मज़दूरी बढ़ाने की उनकी अपेक्षा भी वाजिब है। अधिकतर ‘साहब’ अब कुलबुलाने लगे हैं, ‘झुग्गियां ख्वामख्वाह तुड़वा डालीं! अनखीर में जो कमरा पहले 2500 में मिल जाता था, उसका किराया 5000 हो गया है।
झुग्गी बस्ती के टूटने में कोई साजि़श तो नहीं ! गंदे नाले के पास वाली इस सरकारी ज़मीन को ख़ाली कराने का जितना जोश इस क्षेत्र के 5-6 छुटभैय्या भाजपा नेताओं ने दिखाया वह हैरान करने वाला है। मानो यह उनकी निजी ज़मीन हो। यहां तक कि नगर निगम अधिकारी तथा उनके साथ पुलिस बंदोबस्त के लिए आए अधिकारी भी यह कहते सुने गए कि आपके इसी क्षेत्र के कुछ लोग पीछे ना पड़े होते तो हम ऐसी ठंड में आप लोगों को बेघर करने न आते। प्रगति अपार्टमेंट में रहने वाली मज़दूरों से हमदर्दी रखने वाली एक संवेदनशील महिला ने स्थानीय कांग्रेस नेता विजय प्रताप सिंह के प्रभाव से इन मज़दूरों को 6 महीने अर्थात होली तक रहने देने का आश्वासन भी दिला दिया था लेकिन उसके बाद ‘तुरंत झुग्गी तोड़ो गिरोह’ और ज्यादा आक्रामक हो गया। बार-बार डीसी दफ्तर जाता रहा, मानो फरीदाबाद का विकास इन 50 झुग्गियों ने ही रोका हुआ है।
दरअसल, गंदे नाले के किनारे की कुल ज़मीन 1000 गज़ से भी कम पर 50 झुग्गियों में मज़दूर परिवार गुजर-बसर कर रहे थे लेकिन इसके ठीक पूरब में एक बहुत ही बेशकीमती 4 एकड़ से भी ज्यादा क्षेत्रफल का सैकड़ों करोड़ की क़ीमत का प्लाट पड़ा हुआ है। वह भी सरकारी ज़मीन है जिसके चारों ओर पक्की कंक्रीट रोड है। इस प्लाट पर शिक्षा माफिय़ा की नजऱ है। दो साल पहले तक इस प्लाट में कोई भी जा सकता था, लेकिन अब इस प्लाट की स्टील के ऊंचे पतरों से पक्की घेराबंदी हो चुकी है। यहाँ दिन-रात गार्ड तैनात है जो बस ‘मालिक’ के लोगों को ही अंदर प्रवेश करने देते हैं। यह क़ब्ज़ा इन गऱीब मज़दूरों के झुग्गियों वाले क़ब्ज़े जैसा नहीं है बल्कि ये क़ब्ज़ा चाक-चौबंद और पक्का वाला है।
‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ ने उस दिन झुग्गियां तुड़वाने को बेचैन इस उन्मादी गिरोह से जब पूछा कि वे इस प्लाट पर कसते जा रहे शिकंजे के बारे में क्यों कुछ नहीं बोलते तो उन्होंने दबी आवाज़ में कहा, ‘इसका तो कोर्ट में केस चल रहा है।’ सुधी पाठकों को याद दिला दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश बिलकुल स्पष्ट और कड़क है, ‘अरावली पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हरियाणा राज्य सचिव ने लिखकर दिया हुआ है कि सारे अतिक्रमण हटाए जाएंगे और आगे किसी भी तरह का अतिक्रमण किसी भी बहाने से नहीं होने दिया जाएगा।’ सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कौन सी कोर्ट है, जिसमें इस प्लाट का मुक़दमा चल रहा है? मुक़दमे का फैसला आने से पहले ही कोई क़ब्ज़ा कैसे कर सकता है? फऱीदाबाद के लोग भूले नहीं हैं जब सुप्रीम कोर्ट का हुक्म मज़दूरों की खोरी बस्ती पर तो बहुत ही मुस्तैदी से लागू हो गया था। 50-50 सालों से रह रहे 1,25,000 मज़दूरों को तो बारिश और कोरोना के वक़्त घरों से खींच-खींच कर निकाला गया था, उनके घरों पर बुलडोजऱ चले थे लेकिन पूरी अरावली पर छाए अनगिनत बैंकट हाल, फार्म हाउस, अखाड़े, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, आश्रम और असंख्य दारू के ठेके और ढाबों को छुआ तक नहीं गया। जो चंद बाउंड्रीवाल गिराकर उनके फोटो खींचकर सुप्रीम कोर्ट को दिखाए गए थे उनकी भी मरम्मत हो चुकी है। यह झुग्गी तोड़ो अभियान कहीं उसी शिक्षा माफिय़ा द्वारा प्रायोजित तो नही जिसका इस बहुमूल्य प्लॉट पर क़ब्ज़ा है! यह चर्चा मोहल्ले में आम है।
बाबूजी आपने तो बहुत कोशिश की, अकेले लड़े। वे लोग जब आपको गालियां दे रहे थे तब हमारा खून खौल रहा था लेकिन क्या करें, हम गऱीब लोग हैं। हम मुंह खोलते तो हमारा जीना हराम कर देते। मुंह खोलने से पहले बच्चों का सोचना पड़ता है। मज़दूरों की भावनाएं दिल को छूने वाली थीं। हम मज़दूर कार्यकर्ताओं को भी एक सबक़ मिला। कई पम्फलेट बांटकर, बातचीत, चर्चा-डिबेट कर भी जिन मेहनतक़श मज़दूरों का विश्वास हम हासिल नहीं कर पाए थे उसे, उनके घर उजडऩे का दर्द बांटकर जीत लिया। हमारे संगठन की हैसियत इतनी नहीं है कि हम उनके घर उजडऩे से रोक पाते, ये मज़दूर ख़ुद भी संगठित होने को तैयार नहीं हुआ लेकिन उसके बावजूद भी सारे मज़दूर जान गए कि हम लफ्फाजी नहीं करते। हम मज़दूर वर्ग को संगठित करना चाहते हैं, उनके जीवन के कठिन संघर्षों में हिस्सेदार बनना चाहते हैं, अगुवाई करना चाहते हैं यह हक़ीक़त मज़दूर संगठनों की पम्फलेटों में ही नही उनके कामों में भी नजऱ आनी चाहिए।