फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) लगता है कि भाजपा सरकार को हर काम में नौटंकी व पाखंडतंत्र किए बगैर रोटी हजम नहीं होती। ईएसआई कॉर्पोरेशन का स्थानीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल अनेकों कमियों के बावजूद बहुत ही बेहतरीन सेवाएं दे रहा है। कमियां भी मुख्यालय में बैठे नालायक अधिकारियों की देन हैं। इन्हें अब नवनियुक्त डीजी एवं मंत्री द्वारा काफी हद तक दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। दवा वितरण के काउंटरों, जहां जबरदस्त भीड़ रहती है, उनकी संख्या अब 9 से बढ़ाकर 14 कर दी गई है। इतना ही नहीं कुछ काउंटरों के समय भी बढ़ा दिए गए हैं।
इस सबके बावजूद दो बसों को अस्पताल की शक्ल देकर उन्हें जि़ले के तमाम दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में घुमाया जाएगा। इसे नाम दिया गया है हास्पिटल ऑन व्हील्स यानी पहियों पर अस्पताल। दावा किया गया है कि ये दोनों अस्पताल खुद चलकर ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों के पास जा कर उनका इलाज करेंगे। इनमें तमाम तरह की सुविधाओं के होने का दावा भी किया गया है जो कि एक बकवास के अलावा कुछ भी नहीं है।
यहां समझने वाली पहली बात तो यह है कि ईएसआई कॉर्पोरेशन केवल अपने बीमाकृत मरीज़ों को चिकित्सा सेवाएं देने के लिए बनाया गया है। ऐसे में यह सम्भव नहीं हो सकता कि गांव-दर-गांव जाकर इस तरह के अस्पताल अपने अधिकृत मरीजों को ढूंढ-ढूंढ कर सेवा दे सकें। किसी भी गांव में जाने के बाद इन नुमाइशी अस्पतालों के लिए यह सम्भव नहीं हो पाएगा कि ये गैर बीमाकृत ग्रामीणों को इलाज देने से मना कर सकें। जाहिर है कि मना करने पर झगड़े होंगे और इन से निपटने के लिए सुरक्षाकर्मियों की भी जरूरत पड़ेगी। दूसरी बड़ी बात आवागमन में बर्बाद होने वाले समय की है। जि़ले की तमाम विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र की सड़कों की जो दुर्दशा है, उनसे होकर गांव-दर-गांव जाना कोई आसान काम नहीं। इसके अलावा जगह-जगह लगने वाले जाम आवागमन को और भी कठिन बना देते हैं। इन सबके चलते इन चलते-फिरते अस्पतालों में तैनात होने वाले स्टाफ का आधे से अधिक समय तो केवल सड़कों पर ही बर्बाद होना तय है। सर्वविदित है कि पहले से चल रही स्टाफ की भारी कमी से संकट और भी गहराना तय है।
कॉर्पोरेशन इस झुनझुनेबाजी को छोड़ कर यदि वो काम करे जो इसे करने चाहिए तो बीमाकृत मज़दूरों को कहीं अधिक लाभ हो सकता है। सबसे पहला काम तो जि़ले भर की चौदह डिस्पेंसरियों को सुचारु करके किसी काम लायक बनाए जो अभी तक लगभग नाकारा हैं। इसके बाद आवश्यकतानुसार अतिरिक्त डिस्पेंसरियां भी खोली जाएं। ग्रामीण स्वास्थ सेवा केन्द्र, जो किसी भी मेडिकल कॉलेज के लिए अनिवार्य होता है, के नाम पर पाली गांव में खोले गए नकली केन्द्र के बजाय असली केन्द्र खोला जाए। यह केन्द्र न केवल बीमाकृत बल्कि अन्य लोगों के लिए भी लाभदायी हो सकता है। लेकिन कॉर्पोरेशन इस तरह के वांछित काम करने के बजाय झुनझुनेबाजी करने में ज्यादा माहिर है।
समझा जाता है कि इस झुनझुनेबाजी के पीछे स्थानीय सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर का हाथ है। उन्होंने ही पावर ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन ऑ$फ इंडिया से दो बसों पर ये अस्पताल बनवा कर कॉर्पोरेशन को दान में दिलवाए हैं। यदि मंत्री गूजर को मरीजों की इतनी ही चिंता है तो इस नौटंकी के बजाय, दान की रकम से अस्पताल में कई और काम भी कराए जा सकते थे। परन्तु मसला तो प्रोपेगेंडा का है। अस्पताल में लगवाए गए उपकरण आदि तो प्रोपेगेंडा करने से रहे। जबकि ये तथाकथित चलते-फिरते अस्पताल सरकारी प्रचार के बेहतरीन साधन समझे गए हैं। लेकिन बसों के रख-रखाव एवं परिचालन में आए दिन उत्पन्न होने वाली समस्याओं को समझने की कोई जरूरत नहीं समझी गई।