आदरणीय डीन साहब ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज, फरीदाबाद,
आपका ईमेल दिनांकित 24.8.2024 का मुझे प्राप्त हुआ है। जिसे ज्यों का त्यों बगल में प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें आपने ‘मज़दूर मोर्चा के 18-24 अगस्त के अंक में ‘बाँड के नाम पर वेतन से 50 हजार मासिक की कटौती शीर्षक से प्रकाशित समाचार पर आपत्ति जताई है। प्रकाशित समाचार के स्रोत को आपने डॉक्टर मोहित का नाम देते हुए उसे अनाधिकृत बताया है। संस्थान द्वारा कोई भी अधिकृत बयान देने के लिये आपने अधिकारियों की एक कमेटी का जिक्र किया है जो पे्रस विज्ञप्ति जारी करने को अधिकृत है। इस संदर्भ में पहली बात तो यह है कि इस कमेटी में कौन लोग हैं और वे कहां रहते हैं व इन्होंने कब कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, मुझे मालूम नहीं।
‘मज़दूर मोर्चा सच्चाई को छिपाने वाले तथाकथित अधिकृत बयानों के सहारे नहीं चलता। इसमें जानकार एवं भरोसेमंद सूत्रों से खोजबीन करके हकीकत को प्रकाश में लाया जाता है। अपने सूत्रों की जानकारी देने के लिये ‘मज़दूर मोर्चा बाध्य नहीं है। हां, तथ्यों की सत्यता को साबित करने के लिये पूर्णतया बाध्य है। किसी पीजी छात्र के मासिक वेतन से 50 हजार रुपये काट लेने वाला कोई बाँड मैने कभी कहीं देखा व सुना नहीं। जिस तरह की भाषा उस बाँड में लिखी गई है तथा जिस तरह से उसका क्रियान्वयन किया जा रहा है, उसे देख कर लगता है कि बनाने वाले का बुद्धि से कोई ताल्लुक नहीं। ऐसी व्यक्ति को बुद्धिहीन अथवा मूर्ख न कह कर क्या कहा जाए, डॉक्टर पांडे आप स्वयं बता दें?
आपने अपने पत्र में ‘मज़दूर मोर्चा की भाषा को अशिष्ट तो बताया है लेकिन यह नहीं बताया कि कौन से शब्द अशिष्ट हैं? अस्पताल परिसर में नई बिल्डिंग बनने का सैद्धांतिक निर्णय करीब तीन वर्ष पहले हो चुका है। लेकिन उसके तुरन्त क्रियान्वयन की अपेक्षा उसके बिस्तरों की संख्या 500 या 600 होने पर ही लम्बे समय तक बहसबाज़ी होती रही। उसका निर्माण कार्य किस एजेंसी को दिया जाए, इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका। करीब तीन वर्ष पूर्व मानेसर स्थित सात एकड़ के प्लॉट पर भूमि पूजन हो चुकने के बाद आज तक वहां कोई ईंट नहीं लगी। न केवल दिल्ली, नोएडा व गुडग़ांव बल्कि बसई दारापुर स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल से मरीज़ों को $फरीदाबाद इस लिये रे$फर कर दिया जाता है क्योंकि उन अस्पतालों में इलाज की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। धन की कोई कमी न होने के बावजूद उन अस्पतालों में सुविधाओं की कमी बनाये रखने वाले उच्चाधिकारियों को हरामखोर तथा जनविरोधी न कहा जाए तो क्या कहा जाए, डॉ. पांडे साहब खुद ही बता दें?
किसी भी चिकित्सा संस्थान के लिए वहां कार्यरत फैकल्टी अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। देश भर में दस मेडिकल कॉलेज चलाने वाले कॉर्पोरेशन अधिकारियों को न तो कोई समझ है न ही उनकी कोई रुचि है कि फैकल्टी को विकसित कैसे किया जाए? न तो इनकी भर्ती व पदोन्नति प्रक्रिया उचित है और न ही फैकल्टी को वो सुविधाएं दी जा रही हैं जो अन्य सभी संस्थानों में उपलब्ध हैं। कोढ़ में खाज की स्थति बनाते हुए फैकल्टी के सिर पर तबादले की तलवार अलग से लटका दी जाती है, इसके परिणाम स्वरूप हर साल कितने ही बेहतरीन डॉक्टर (प्रोफेसर)कॉर्पाेरेशन की नौकरी छोड़कर बेहतर स्थानों पर पलायन कर जाते हैं। कॉर्पोरेशन ने कभी ये समझने की चेष्टा नहीं की कि उनके यहां बेहतरीन फैकल्टी टिकती क्यों नहीं? दरअसल, दस मेडिकल कॉलेजों को चलाने वाले ये उच्चाधिकारी न तो खुद कभी कोई फैकल्टी रहे हैं और न ही किसी मेडिकल कॉलेज की इन्हें समझ है। डिस्पेंसरी स्तर के ये डॉक्टर/अफसरान केवल अपने अहम की संतुष्टि के लिए फैकल्टी को इधर से उधर घुमाए रखते हैं।
दिल्ली व नोएडा के तमाम कॉर्पोरेशन अस्पताल अपनी आधी क्षमता पर चल रहे हैं। जबकि फरीदाबाद का अस्पताल दोगुणी क्षमता पर चल रहा है। इसके बावजूद बीते तीन वर्षों से फरीदाबाद में स्टाफ बढ़ाने की मांग पर ‘विचार विमर्श चल रहा है। अब तो यहां तक भी सुनने में आ रहा है कि जब कम स्टाफ से ही काम चल रहा है तो बढ़ाने की क्या जरूरत है? विदित है कि रेफर होकर आने वाले बाहरी मरीजों को बड़ी संख्या में, लम्बी तारीख देकर लौटा दिया जाता है अथवा एम्स रेफर कर दिया जाता है। यानी कि मज़दूर से पूरी वसूली करने के बावजूद उसे इलाज के नाम पर धक्के ही खिलाये जा रहे हैं। इसके लिये जिम्मेवार अधिकारियों को धूर्त, हरामखोर एवं जनविरोधी न कहा जाए तो कोई उपयुक्त सम्बोधन डॉ. पांडे साहब बता दें तो बहुत मेहरबानी होगी।
यदि इन उच्चाधिकारियों को ‘मज़दूर मोर्चा के शब्द अशिष्ट लगते व चुभते हैं तो कृपया अपनी कार्यशैली को बदलें। ‘मज़दूर मोर्चा तो एक दर्पण के समान है जिसमें कि सामने वाले की छवि जस की तस ही प्रतिबिम्बित होती है। भवदीय सतीश कुमार सम्पादक मज़दूर मोर्चा