मज़दूर मोर्चा ब्यूरो चुनाव आयोग तथा न्यायपालिका के सक्रिय सहयोग के साथ-साथ विपक्षी दलों की काहिली के चलते भाजपा ने हरियाणा व महाराष्ट्र विधानसभा के हारे हुए चुनाव भारी जीत में बदल दिए। अब भाजपा की गाड़ी बिहार में फंसी हुई है। यहां मोदी के इशारे पर उनके पालतू चुनाव आयोग ने भाजपा की जीत सुनिश्चत करने के लिए एक नई तकनीक ईजाद की है। लोकतंत्र में जहां मतदाता सरकार को चुनते हैं वहीं बिहार में सरकार मतदाताओं को चुन रही है। जी हां, मतदाता सूची में वही मतदाता रखे जाएंगे जिन्हें सरकार चाहेगी। हरियाणा व महाराष्ट्र में भाजपा को जीत दिलाने के लिए चुनाव आयोग ने जिस तरह से वोटिंग मशीनों में, मतगणना व मतदाता सूचियों में धांधली करके अपने आप को कटघरे में फंसा लिया था, जिससे बचने के लिए मोदी सरकार को तुर्त-फुर्त चुनाव कानून में परिवर्तन करना पड़ा था, उस जोखिम से बचने के लिए नए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश गुप्ता ने उक्त नई तकनीक ईजाद की है।
इस तकनीक के द्वारा बिहार की वह मौजूदा पूरी की पूरी मतदाता सूची रद्द कर दी जाएगी, जिसके द्वारा बीते वर्ष लोकसभा के लिए सांसदों को चुना गया था। नई सूची में नाम लिखवाने के लिए प्रत्येक मतदाता को चुनाव आयोग द्वारा जारी नए फार्म भरने का आदेश दिया गया है। फार्म के साथ उसे नागरिकता के सबूत के तौर पर 11 दस्तावेजों में से जन्म प्रमाणपत्र, मैट्रिक का प्रमाणपत्र, माता-पिता का जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट आदि जैसे दस्तावेज़ लगाने होंगे। मजे की बात यह है कि मात्र एक महीने में बिहार के करीब आठ करोड़ मतदाताओं को यह काम पूरा करना है। दूसरी मजेदार बात यह है कि फार्म व दस्तावेज जमा कराने का कोई सबूत किसी मतदाता को नहीं दिया जा रहा। यानी चित्त भी मेरी-पट्ट भी मेरी खाता मेरे बाप का।
इस घपलेबाजी के परिणामस्वरूप चुनाव आयोग जिसको चाहे मतदाता बना दे और जिसको चाहे उसका नाम काट दे। भारत के जिस संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान कर रखा है उसे चुनाव आयोग ने झपट लिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अभी तक 85 लाख मतदाताओं ने फार्म ही नहंी भरे हैं। यानी कि उनके नाम के सीधे तौर पर मतदाता सूची से कट गए। उनकी सुनने वाला कोई नहीं कि उन्होंने तो फार्म भर कर दस्तावेज भी दिए थे। इसके अलावा अभी कितने मतदाताओं को मृत बता कर अंतिम सूची से काटा जाएगा इसका इंतजार है। समझा जा रहा है कि बिहार के आठ करोड़ मतदाताओं में से एक करोड़ से अधिक मतदाताओं का मताधिकार छिन लिया जाएगा।
मताधिकार से वंचित होने वालों में मुस्लिम, ईसाई, दलित तथा यादवों को रखा गया है। इन सभी को भाजपा का विरोधी वोट बैंक माना जाता है। चुनाव आयोग की इस गुंडई का विरोध करने के ेलिए तमाम विपक्षी दल जब चुनाव आयुक्तों से मिलने उनके दिल्ली स्थित कार्यालय पहुंचे तो उन्होंने प्रतिनिधिमंडल से सौहार्दपूर्ण ढंग से बात करने की जरूरत भी नहीं समझी। समझे भी क्यों? उनके अंदर तो मोदी बोलता है। मोदी ने उन्हें बातचीत करने के लिए नहीं बल्कि चुनाव लूटने के लिए रखा है। विदित है कि मोदी ने चुनाव आयुक्तों की पुरानी परम्परा जिसके अनुसार प्रधानमंत्री भारत का मुख्य न्यायाधीश व लोकसभा में विपक्षी नेता मिल कर चुनते थे, को तोड़ कर सारा काम अपने हाथ में ले लिया। इसका लाभ उठाते हुए मोदी उन्हीं लोगों को आयोग में बैठाते हैं जो इनके इशारों पर कठपुतली बन कर नाचते रहेंगे।
जब चुनाव आयोग में सुनवाई न हुई तो विपक्षी दल एवं अन्य लोकतंत्र समर्थक संगठन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। विदित है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से लेकर, उनके द्वारा की गई धांधलियों के विरोध में जब भी ये लोग सुप्रीम कोर्ट गए तो वहां से हमेशा लालीपॉप देकर इन्हें चलता कर दिया गया। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट भी तो मोदी की नाराजगी नहीं लेना चाहती। वही ड्रामा अब बिहार में इस मामले को लेकर हो रहा है। यदि तमाम विपक्षी दल एवं लोकतंत्र समर्थक संगठन मोदी निर्मित चुनाव आयोग तथा न्यायपालिक के भरोसे बैठे रहे तो न केवल बिहार बल्कि अगले वर्ष बंगाल, केरल व अन्य सभी राज्यों में यही खेल होने वाला है।
लोकतंत्र एवं मताधिकार को बचाने का रास्ता सुप्रीम कोर्ट में ढूंढने की बजाय जनता को आन्दोलन की ओर बढऩा होगा। ऐसे भी बिहार आन्दोलनकारियों की भूमि रही है। लगता नहीं कि वे लोग सुप्रीम कोर्ट के भरोसे रह कर अपना लोकतंत्र समाप्त होने देंगे। इसकी आहट राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव के उस बयान से मिलती है जिसमें वे चुनाव का बहिष्कार करने की बात कहते हैं। वैसे तो चुनाव का बहिष्कार उसी दिन कर देना चाहिए था जिस दिन मोदी ने चुनाव आयोग का गठन अपने हाथ में ले लिया था। यदि उस वक्त यह काम हो गया होता तो हरियाणा व महाराष्ट्र का चुनाव लुटने से बच जाता।
कहावत है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते और अब तक यह सच्चाई भारत के तमाम राजनीतिक दलों ने समझ ली होगी कि उनका वास्ता किन भूतों से पडा है। जिन भूतों ने न्यायपालिका सहित तमाम संवैधानिक संस्थाओं को अपने कब्जे में ले लिया हो तो उनको बातों से कभी भी नहीं समझाया जा सकता, चुनाव का बहिष्कार करना ही अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा, बहिष्कार का मतलब यह होना चाहिए कि राज्य में चुनाव प्रक्रिया शुरू ही न होने दी जाए। जाहिर है ऐसे में सत्ता पर काबिज ये भूत पूरी शक्ति लगाने से भी कोई गुरेज नहीं करेंगे। शक्ति यानी कि फौज व पुलिस तक का भी बेशक हिंसक प्रयोग करने में इन्हें कोई गुरेज नहीं होगा। जिन आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने अपराध के बल पर ही सत्ता पाई हो वे कभी भी सत्ता को संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक तरीकों से छोडऩे वाले नहीं होते। किसी भी देश में न्याय पालिका इंसाफ की अंतिम सीढ़ी समझी जाती है, लेकिन जहां ये सीढ़ी भी जनता को उपलब्ध न हो यानी कि यह सीढ़ी भी सत्तारूढ़ भूतों ने कब्जा ली हो तो जनता को न्याय पाने के लिए खुद ही सड़कों पर उतरना पड़ता है। ऐसे में जो भी जन धन की हानि होती है उसके लिए न्याय पालिका भी पूरी तरह से दोषी ठहराई जाती है।