जगदीश्वर चतुर्वेदी कम्युनिस्ट घोषणापत्र के निर्माण में कार्ल मार्क्स की अग्रणी भूमिका थी।लेकिन फ्रेडरिक एंगेल्स की भूमिका कम न थी. जब भी इसके बारे में बात होती है तो अमूमन एंगेल्स की भूमिका को मात्र सहयोगी की भूमिका के रुप में देखते हैं।
मार्क्स- एंगेल्स मित्रता और भूमिका के बारे में हेराल्ड जे. लास्की ने लिखा ‘ एंगेल्स के पास एक त्वरित और तत्पर मस्तिष्क था।वे हमेशा दोस्ताना और आम तौर पर आशावादी रहते थे और व्यावहारिक कार्रवाई और अन्य लोगों के साथ काम कर सकने के महान गुण भी उनके पास मौजूद थे।उन्हें यह बात पहले से ही मालूम थी कि वे कहां जाना चाहते हैं लेकिन उनके पास यह मान लेने के लिहाज़ से जरूरी आत्मज्ञान भी था कि वे न तो अपनी यात्रा अकेले तय कर सकते हैं और नहीं अपने अभियान का नेतृत्व ही कर सकते हैं।वे काफ़ी पढ़े -लिखे थे और ढेरों सामग्री को पढ़ जाने की क्षमता उनमें थी। वे दृढ़ होने की बजाए काफ़ी लचीले थे।ईर्ष्या और नकचढ़ेपन से वे सर्वथा मुक्त थे।वे प्रसन्न स्वभाव के व्यक्ति थे और सोच की मुश्किलों से उन्हें कभी ग़ुस्सा नहीं आता था।मार्क्स के साथ पहली ही मुलाक़ात के बाद संदेह की एक छोटी सी अवधि बीतते ही उन्होंने मार्क्स को पथप्रदर्शक का दर्जा दे दिया था और सिफऱ् एक बार एक छोटी सी गलतफहमी को छोडक़र पूरे चालीस वर्षों की दोस्ती के दौरान मार्क्स की हर संभव सेवा करने के अपने कर्त्तव्य पर सवाल खड़ा करने की बात तक उनके मन में नहीं आई। वे मार्क्स के बेहतर संगठक थे, स्थिति की व्यावहारिक जरुरतों का तात्कालिक बोध उनमें कहीं ज़्यादा था।उन गहरे ऐतिहासिक संबंधों की पहचान करने के बजाय,जिनसे कोई ख़ास काम करने की जुगत उत्पन्न हुई हो, वे यह कहीं तेज़ी से देख लेते थे कि करना क्या है ? मार्क्स उन्हें यदि दर्शन के ऐसे आयाम दिखाते थे जिनका एहसास उन्हें भी नहीं हुआ था तो एंगेल्स प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टि के ज़रिए उनके लिए उन आर्थिक वास्तविकताओं का खुलासा कर देते थे जिन्हें समझ पाना मार्क्स के लिए अन्यथा बहुत कठिन होता। यह भी कि एंगेल्स ने मार्क्स को उन्नीसवीं सदी के मध्य के ग्रेट ब्रिटेन के महत्व को उसके ऐतिहासिक क्रम विकास में देख पाने में सक्षम बनाया और यह उन्होंने एक ऐसे समय में किया जब मार्क्स जर्मनी को ही विकास का केन्द्रीय कारक माने चले जा रहे थे।उनके वग़ैर भी हर हाल में मार्क्स वामपंथ के महान सामाजिक दार्शनिक होते लेकिन उनके साथ रहने से मार्क्स के लिए यह संभव हो सका कि वे उत्कृष्ट बौद्धिक उपलब्धि को विराट व्यावहारिक प्रभाव के साथ जोड़ सकें। उनकी साझीदारी उस समय बनी जब समाजवाद को अमल में लाने वाले सिद्धांत और आंदोलन के असंबद्ध समूह भर हुआ करते थे।जब यह साझेदारी ख़त्म हुई तब तक उन्होंने ऐसे एक विश्वव्यापी आंदोलन की बुनियाद रख दी थी जिसके पास अपना एक सुसंबद्ध इतिहास -दर्शन था।इस दर्शन से सीधे जन्मी एक स्पष्ट भावी कार्यविधि थी।’ ‘ इस प्रकार जब मार्क्स और एंगेल्स कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखने को हुए तो वे न सिफऱ् घनिष्ठ मित्र थे बल्कि उन्होंने दृढ़ दार्शनिक आधारों पर निर्मित एक अंतर्दृष्टि को इतने विस्तीर्ण और गहन ऐतिहासिक और समकालीन ज्ञान के साथ जोड़ दिया था जिसकी उस समय में सामाजिक विकास की समस्याओं के लिए प्रासंगिकता की दृष्टि से कोई बराबरी हो ही नहीं सकती थी।वे दोनों ही हेगेलीय द्वंद्ववाद से सम्मोहित रह चुके थे, शुरुआती परिचय के बाद से ही वे दोनों इसकी ओर खिंच गए थे, यानी पहले हेगेलीय वामपंथ की ओर फिर इससे परे जाते हुए उस बिंदु तक ,जिसके बारे में मार्क्स ने कहा था कि हेगेल को उनके सिर के बल खड़ा करना जरूरी है। वे दोनों ही घनिष्ठ परिचय के आधार पर सुस्त, तुच्छ और सदा नौकरशाहाना जर्मन रियासतदारों में मौजूद गहरी निरंकुश प्रवृत्ति को जानते थे।’ लास्की ने लिखा ‘ जब वे कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखने को हुए तो उनके नज़रिए का ऐतिहासिक आधार भी कोई मामूली सर्वेक्षण पर नहीं टिका हुआ था।मार्क्स केवल एक सुयोग्य दार्शनिक और असाधारण ज्ञान वाले विधिशास्त्री ही नहीं थे।उन्होंने जर्मन इतिहास का व्यापक अध्ययन किया था।फ्ऱांस की अठारहवीं सदी का उन्होंने विशेष और गहरा अध्ययन किया था और 1789 और इसकी परिणतियों का तो उन्होंने लगभग विशिष्ट संपूर्णता के साथ अध्ययन किया था।’
सामान्य तौर पर एक सवाल बार बार उठता रहा है कि मार्क्स का दुनिया पर और ख़ासकर भारत पर क्या असर पड़ा ? कम्युनिस्ट घोषणापत्र का क्या असर पड़ा? इन दोनों सवालों के बारे में यह कह सकते हैं कि कम्युनिस्ट घोषणापत्र का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि मज़दूरों में अपने संगठन बनाने और अपने अधिकारों के लिए सचेत होकर लडऩे की भावना पैदा हुई।भारत में कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के पहले तक मज़दूरों में संगठन बनाने या अपने हक़ों के लिए लडऩे की कोई परंपरा नजऱ नहीं आती।आज स्थिति यह है कि भारत के विभिन्न समुदायों और वर्गों के बीच में संगठन हैं।ख़ासकर मजदूरों के संगठन हैं।ये संगठन कहने को विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े हैं लेकिन करोड़ों मज़दूर इन संगठनों में सक्रिय हैं।यह संगठन चेतना या ट्रेड यूनियन चेतना कम्युनिस्ट घोषणापत्र की देन है। इसका असर आरएसएस से लेकर कांग्रेस तक सब पर है। मज़दूर अपनी माँगो के प्रति सचेत बनें और संगठन बनाएँ ,यह बुनियादी विचार घोषणापत्र ने सारी दुनिया को दिया और आज सारी दुनिया उसकी ऋणी है।
‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ मूल रुप से दिसम्बर 1847 से जनवरी 1848 के बीच लिखा गया ।इसके निर्माण में अकेले मार्क्स की भूमिका नहीं थी बल्कि जर्मन क्रांतिकारियों के छोटे से ग्रुप के लंबे विचार विमर्श ,सन् 1847 में गठित कम्युनिस्ट लीग और एंगेल्स द्वारा अक्टूबर 1847 में लिखे गए ‘प्रिंसिपल्स ऑफ कम्युनिज्म’ की महत्वपूर्ण भूमिका थी।हेराल्ड लास्की ने लिखा ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र की रचना निर्वासित क्रांतिकारियों के ऐसे कई समूहों की उभरती हुई एकता की पृष्ठभूमि में निबद्ध है जो दमन और प्रतिक्रिया की अनिवार्य पैदाइश हैं।’
जर्मन संस्करण की भूमिका में सन् 1872 में मार्क्स-एंगेल्स ने लिखा ‘ कम्युनिस्ट लीग नामक मज़दूरों के अंतर्राष्ट्रीय संघ ने, जो उस ज़माने की हालतों में एक गुप्त संघ ही हो सकता था,1847 के नवंबर में लंदन में हुई अपनी कांग्रेस में हम दोनों को यह काम सौंपा कि हम पार्टी का विस्तृत सैद्धांतिक और व्यावहारिक कार्यक्रम प्रकाशनार्थ तैयार करें।यही ‘घोषणापत्र’ के जन्म की कहानी है, जिसकी पांडुलिपि फऱवरी क्रांति से कुछ ही सप्ताह पहले छपने के लिए लंदन भेजी गई थी।यह सबसे पहले जर्मन भाषा में छपा ,और उसके बाद उसके कम से कम बारह भिन्न -भिन्न संस्करण जर्मनी,इंग्लैंड और अमरीका में प्रकाशित हुए।अंग्रेजी में सबसे पहले यह घोषणापत्र 1850 में रेड रिपब्लिकन पत्रिका में लंदन में प्रकाशित हुआ।’