देश जा रहा है सेठों की जेब मे
देश जा रहा है सेठों की जेब में समाधान ढूंढते हो औरंगजेब में
बेटियां लाचार बनाते हो घर में सुरक्षा चूक खोजते हो बाहर में
जब गीता में कर्म का संदेश है फिर भी रोजगारविहीन देश है
अखंड भारत की बात करते हो बांट कर राज करो पर चलते हो
किसी दिन ये सवाल खड़े होंगे हर जवाब पर बवाल खड़े होंगे
काफिर हूं सरफिरा हूं मुझे मार दीजिए काफिर हूं सरफिरा हूं मुझे मार दीजिए मैं सोचने लगा हूंं मुझे मार दीजिए
है एहतिराम-ए-हजऱत-ए-इंसान मेरा दीन बे-दीन हो गया हूंं मुझे मार दीजिए
मैं पूछने लगा हूं सबब अपने क़त्ल का मैं हद से बढ़ गया हूं मुझे मार दीजिए
करता हूं अहल-ए-जुब्बा-ओ-दस्तार से सवाल गुस्ताख़ हो गया हूं मुझे मार दीजिए
ख़ुशबू से मेरा रब्त है जुगनू से मेरा काम कितना भटक गया हूं मुझे मार दीजिए
मालूम है मुझे कि बड़ा जुर्म है ये काम मैं ख़्वाब देखता हूं मुझे मार दीजिए
ज़ाहिद ये ज़ोहद-ओ-तक़वा-ओ-परहेज़ की रविश मैं ख़ूब जानता हूं मुझे मार दीजिए
बे-दीन हूं मगर हैं ज़माने में जितने दीन मैं सब को मानता हूं मुझे मार दीजिए
फिर उस के बाद शहर में नाचेगा हू का शोर मैं आ$िखरी सदा हूं मुझे मार दीजिए
मैं ठीक सोचता हूं कोई हद मेरे लिए मैं साफ़ देखता हूं मुझे मार दीजिए
ये ज़ुल्म है कि ज़ुल्म को कहता हूं साफ़ ज़ुल्म क्या ज़ुल्म कर रहा हूं मुझे मार दीजिए
जिंदा रहा तो करता रहूंगा हमेशा प्यार मैं साफ़ कह रहा हूं मुझे मार दीजिए
जो ज़ख़्म बांटते हैं उन्हें ज़ीस्त पे है हक़ मैं फूल बांटता हूं मुझे मार दीजिए
बारूद का नहीं मिरा मस्लक दरूद है मैं ख़ैर मांगता हूं मुझे मार दीजिए कठिन शब्दों के मायने
-अहमद फऱहाद