खट्टर के राज में अराजक हो गए अधिकारी
फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा)। गोंच्छी उप तहसील दफ्तर में अधिकारियों-कर्मचारियों की अराजकता छाई हुई है। हरामखोरी पर उतरे ये कर्मचारी कुर्सी पर बैठते ही नहीं और आम जनता काम के लिए इंतजार करने और भटकने को मजबूर है। खुद नायब तहसीलदार भी नदारद रहते हैं, ऐसे में कर्मचारियों के सीट पर नहीं होने की शिकायत सुनने वाला भी कोई नहीं। ये कर्मचारी जब कभी सीट पर मिल भी जाते हैं तो सर्वर खराब होने या कोई अन्य बहाना बना कर काम नहीं करते। सुविधा शुल्क अदा करने पर ही काम होते हैं।
सेक्टर 55 निवासी एक दिहाड़ी मज़दूर महिला आधार कार्ड बनवाने के लिए बुधवार सुबह दस बजे अपने बच्चे के साथ गोंच्छी उप तहसील पहुंची थी। यहां आवेदकों की लंबी लाइन लगी हुई थी लेकिन कर्मचारी नदारद थे। सरकारी दफ्तरों में सुबह नौ बजे से काम शुरू हो जाता है लेकिन उप तहसील में सुबह साढ़े दस बजे तक केवल दो कर्मचारी ही पहुंचे थे। नायब तहसीलदार का कमरा बंद था, पटवारी, रजिस्ट्री क्लर्क यहां तक कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक नदारद थे। करीब ग्यारह बजे कर्मचारी अपनी सीटों पर आए। थोड़ी देर बाद काम तो शुरू हुआ लेकिन सर्वर स्लो होने के कारण धीमा रहा। एक आधार अपडेट होने मेें दस से बारह मिनट का समय लग रहा था। यह सिलसिला शाम तक चलता रहा, महिला का आधार पंजीकरण तो हो गया लेकिन अनेक लोगों को अगले दिन आने को कहा गया। करीब ग्यारह बजे कर्मचारी सीटों पर आने शुरू हुए। थोड़ी देर बाद काम शुरू हुआ लेकिन बताया गया कि सर्वर स्लो है। स्लो सर्वर के कारण काम धीमी गति से हो रहा था। एक व्यक्ति का आधार पंजीकरण या अपडेट करने में 10-12 मिनट लग रहे थे। महिला मजदूर का आधार पंजीकरण तो हो गया लेकिन कार्यालय समय समाप्त होने पर लाइन में लगे अनेक लोगों को अगले दिन आने को कह कर्मचारी सीट छोड़ कर चले गए। लोगों के अनुसार रोजाना ही अनेक लोगों को निराश लौटना पड़ता है।
आधार कार्ड बनवाने आए लोगों का कहना था कि आधार कार्ड के लिए कई-कई दिन चक्कर लगाने पड़ते हैं, कभी सर्वर डाउन होता है तो कभी बायोमीट्रिक मशीन काम करना बंद कर देती है। कर्मचारी भी मनमानी करते हैं अतिरिक्त शुल्क चुकाने पर सब काम होता है, वरना लाइन में लगना पड़ता है। आधार बनवाने आने वाले अधिकतर दिहाड़ी मज़दूर या छोटा मोटा काम करने वाले लोग ही हैं। आधार बनवाने के लिए उन्हें एक दिन का काम और कमाई छोडऩी पड़ती है, ऐसे में यदि आधार नहीं बनता तो नुकसान होता है, दिहाड़ी बचाने की मजबूरी में ये लोग अफसरों के पालतू दलालों के जरिए काम करवाते हैं।
मोदी-खट्टर की डबल इंजन वाली सरकार के स्वच्छ भारत मिशन का पाखंड भी इस उप तहसील में उजागर है। यहां आने वालों की सुविधा के लिए न तो शौचालय है, न बैठने की कोई व्यवस्था, यहां तक कि पीेने के पानी का भी इंतजाम नहीं है। ये सुविधाएं नहीं होने से बच्चों के साथ आने वाली महिलाओं को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
डिजिटल इंडिया की धज्जियां भी इस उप तहसील में रोजाना उड़ाई जाती हैं। कहने को राजस्व विभाग की सारी सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं लेकिन पटवारी बिना कागज के कोई काम करते ही नहीं। जमीन संबंधी कोई काम होने पर आम आदमी को पुरानी रजिस्ट्रियों का पुलिंदा पटवारी को दिखाना पड़ता है, जबकि इसका रिकॉर्ड और प्रतियां ऑनलाइन मौजूद होती हैं। खास बात ये है कि ये पटवारी तो अपनी सीट पर नहीं मिलते लेकिन उनके दलाल आसपास मौजूद रहते हैं। पटवारी की सीट पर पहुंचने वाले व्यक्ति को ये दलाल पकड़ कर काम कराने की गारंटी देते हैं। अपना कमीशन और पटवारी का सुविधा शुल्क वसूल करने के बाद ये दलाल काम करा देते हैं।
उप तहसील में अधिकारियों-कर्मचारियों की अराजकता की जानकारी एसडीएम बल्लभगढ़ और डीसी को न हो यह संभव नहीं, बावजूद इसके कोई कार्रवाई नहीं किया जाना दर्शाता है कि इस खेल में आला अधिकारियों की भी मिलीभगत है। खट्टर की बिना दांत वाली विजिलेंस का खौफ भी इन अधिकारियों में नहीं रह गया है, क्योंकि विजिलेंस के पास कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं है। रही बात खट्टर की तो उन्हें केवल जीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटने से मतलब है आम जनता परेशान हो या भ्रष्ट अधिकारियों को चढ़ावा चढ़ा कर अपना काम कराए, सीएम की आंखों पर तो सुशासन का चश्मा चढ़ा है।