वाजिब हक के लिए आवाज उठाते मजदूरों पर पूंजीवादी राज्य के दमन का एकजुट विरोध जरूरी

वाजिब हक के लिए आवाज उठाते मजदूरों पर पूंजीवादी राज्य के दमन का एकजुट विरोध जरूरी
April 27 15:30 2026

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा
यूं तो हमें बताया जाता है कि मौजूदा संवैधानिक जनतंत्र जनता के लिए जनता का शासन है, लेकिन जब कभी भी देश की जनता का अधिकांश हिस्सा अर्थात मजदूर मेहनतकश अपने साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ अपने वाजिब हक हकूक के लिए जरा सी भी आवाज उठाते हैं तो तुरंत इस ‘जनता के शासन’ की कलई खुल जाती है क्योंकि तब पुलिस, अफसरशाही और न्यायपालिका सहित शासन का पूरा दमनकारी अमला मेहनतकश जनता के ऊपर टूट पड़ता है। दिल्ली के राजधानी क्षेत्र में मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, आदि में बस जिंदा रहने का न्यूनतम अधिकार मांग रहे मजदूरों पर हरियाणा व उत्तर प्रदेश की पुलिस व अदालतों ने जो दमनचक्र छेड़ा है, लाठी-आंसू गैस चलाई है, मजदूरों और मजदूर संगठनों के कार्यकर्ताओं को ही नहीं, उनकी कानूनी मदद करने वाले वकीलों तक को जिस तरह फर्जी आपराधिक इल्ज़ामों में जेल भेजा जा रहा है वो एक बार फिर इस सच्चाई को स्पष्ट कर देता है कि मौजूदा शासन जनता का नहीं, पूंजीपतियों का राज है जो पूंजी के मुनाफे को सुरक्षित रखने के लिए मजदूरों को कुचलने का औजार है। इस राज में मजदूरों द्वारा गरिमा और मर्यादा से जीना तो दूर जि़ंदा रहने का न्यूनतम अधिकार मांगना भी अपराध बताया जाता है, हिंसा है, अव्यवस्था और अराजकता करार दिया गया है! अपने न्यायसंगत अधिकारों के लिए आवाज उठाते मजदूरों से पूंजीपतियों की हिफाजत के लिए पूरा अमला पूरे दलबल के साथ जुट गया है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा डीजीपी द्वारा आंदोलनकारियों को कुचलने की धमकी दी जा रही है।

आज खाद्य सामग्री से लेकर सभी जरूरी चीजों के दामों में महंगाई आसमान पर है, सरकारी संरक्षण में जमाखोर-मुनाफ़ाख़ोर 60 रुपये किलो वाली एलपीजी के लिए प्रवासी मजदूरों से 400 रुपये तक वसूल रहे हैं, मकान भाड़ा, स्कूली फीस, इलाज आदि पर महंगाई औसतन 10 प्रतिशत से भी ऊपर है, तब 12-16 घंटे और रविवार तक को काम कर मजदूरों को 9 से 12 हज़ार रुपये औसत मजदूरी मिल रही है, सैलरी स्लिप तक नहीं दी जाती, 10-15 साल काम करने पर भी पक्की नौकरी नहीं की जाती, काटा गया पीएफ-ईएसआई तक का पैसा सेठ चोरी कर लेते हैं, कैंटीन सुविधा नहीं दी जाती, कहीं मिलती है तो मैनेजरों को मिलने वाले अच्छे खाने के बजाय सड़ा खाना दिया जाता है, मजदूरों के साथ जानवर की तरह व्यवहार किया जाता है। जरूरी सुरक्षा इंतजामों के अभाव में देश में हर साल औसतन 48 हज़ार कामगार कार्यस्थल के ‘हादसोंÓ में जान गंवाते हैं और किसी पूंजीपति को इस हिंसा-अपराध में सजा नहीं होती।

हरियाणा सरकार ने 10 साल बाद इस आंदोलन के दबाव में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 15,220 रुपये की है जो जीवन चलाने के लिए पूरी तरह नाकाफ़ी है। इसे कम बताते हुए मजदूर अगर 20 हज़ार रुपये महीना मजदूरी भी मांग रहे हैं तो वह भी कम ही है। सरकार के अपने वेतन आयोगों के बनाये गए न्यूनतम जीवन के आधारों से हिसाब लगायें तो आज 30 हज़ार रुपये न्यूनतम मजदूरी की मांग पूरी तरह वाजिब है। मजदूरों की मांग में नावाजिब जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि अपने ख़ून पसीने की मेहनत से सब कुछ पैदा करने वाले मजदूरों को इतनी कम मजदूरी देकर ही चंद पूंजीपतियों ने इतने ऊंचे सुपर मुनाफे लूटे हैं कि आज वे पूरे देश की 80 प्रतिशत से अधिक संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं, अंबानी, अदानी, टाटा जैसे बड़े पूंजीपतियों के मुनाफे पिछले 6 सालों में 5 गुना बढ़ गए हैं। उधर अपने श्रम से सारा उत्पादन करने वाले श्रमिक कंगाली और भुखमरी की स्थिति में पहुंच गए हैं। चुनांचे 23 फऱवरी को पानीपत रिफाइनरी से शुरू हो पूरे देश में फैला और दिल्ली राजधानी क्षेत्र में चल रहा मजदूरों का संघर्ष पूरी तरह वाजिब और न्यायसंगत है। सिर्फ़ मजदूरों-मेहनतकशों को ही नहीं, देश के सभी जनवाद और इंसाफ़ पसंद लोगों को इसके साथ मजबूत एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहिए, मजदूरों पर दमन का विरोध और सभी गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की तुरंत रिहाई की मांग उठानी चाहिए। सभी मजदूर संगठनों को इस मजदूर संघर्ष को संगठित रूप देने हेतु फौरी व्यापक एकता बनाकर संयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए।

गौरतलब है कि इस पूरे आंदोलन की अगुवाई करने के लिए मज़दूरों ने किसी तथाकथित राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन अथवा नेता की पूंछ नहीं पकड़ी। देश भर में, खासकर एनसीआर में बीते पचासों साल से रंग-बिरंगे झंडे लगाकर मजदूर संगठनों को चलाने का दावा कर रहे नेताओं की शरण में जाने की अपेक्षा मजदूरों ने खुद ही अपनी लड़ाई लडऩे का फैसला किया। इससे संदेश यह मिलता है कि बड़े बड़े दफ्तर खोले बैठे मजदूर संगठन मजदूरों के बीच अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं, मजदूर उन पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं समझते, न जाने कब वे उन्हें बेच खाएं।
इस स्वत: स्फूर्त आंदोलन का दोषी ठहराने के लिए भाजपाई सरकारें व उनकी तमाम एजेंसियां शिकारी कुत्तों की तरह उन मजदूरों को खोज रहे हैं जिन्होंने इसकी अगुवाई की थी। सरकारें अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखना चाहतीं कि मजदूरों के लिए बनाए गए तमाम श्रम कानूनों की उल्लंघनाओं को दूर करने के बजाय सरकार ने श्रम कानूनों को ही खत्म कर दिया। आठ घंटे के बजाय 12 घंटे की दिहाड़ी बना दी, जिसके लिए वेतन मिलता है नौ से बारह हजार रुपये।

बड़ी बड़ी मशीनों पर जोखिमपूर्ण काम कराने के लिए अकुशल मजदूरों को झोंक दिया जाता है। विकलांग होने अथवा मर जाने के बाद उचित मुआवजा देने से भी मालिकान बच निकलते हैं। कानून जो खत्म कर दिया गया है उसके अनुसार किसी भी श्रमिक से आठ घंटे के बाद जबरन ओवरटाइम नहीँ कराया जा सकता था, यदि मजदूर ओवरटाइम करने को राजी हो भी जाए तो उसके डबल रेट से मजदूरी मिलने का नियम था, लेकिन जब कानून ही खत्म हो गया तो बिना डबल वेतन के ही जबरदस्ती ओवरटाइम तो कराया ही जाता है, साप्ताहिक व अन्य किसी भी प्रकार के अवकाश भी देने की अब जरूरत नहीं रह गई है। श्रम विभाग जो इन मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए बनाया गया था वह पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका है अथवा मालिकों का दलाल बन चुका है। इन बिगड़े हालात में जब जीना ही दूभर हो जाए तो मजदूर सड़क पर न उतरे तो क्या करे? कहावत भी है तंग आमद ब जंग आमद। सरकार द्वारा बनाई गई इन परिस्थितियों का विरोध करने जब मजदूर उतरते हैं तो सरकार को इसमें षडयंत्र की बू आने लगती है, इनमें मजदूरों को भड़काने, बहकाने वाले शरारती तत्व ढूंढने का प्रयास किया जाता है। अपने हक़ों के लिए लडऩे वालों को यह भाजपाई सरकारें देशद्रोही, देश के दुश्मन एवं नक्सलवादी तक कह कर अपना पल्ला झाडऩे की कोशिश करती हैं। लेकिन हकीकत तो हकीकत ही रहेगी, जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा।

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Mazdoor Morcha
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