’26 नवंबर’ का पैगाम-जारी रखना है संग्राम

’26 नवंबर’ का पैगाम-जारी रखना है संग्राम
December 02 06:06 2024

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा
फऱीदाबाद जि़ले के प्रशासनिक केंद्र, लघु सचिवालय के सामने, मंगलवार 26 नवंबर को 11 बजे एक बार फिर लाल झंडे लहराए और ‘इंकलाब जि़न्दाबाद’, ‘किसान-मज़दूर-छात्र एकता जि़न्दाबाद’ के नारे फिज़ा में गूंजने लगे. ‘संयुक्त किसान मोर्चा तथा सेंट्रल मज़दूर यूनियनों’ के आह्वान पर 26 नवंबर को देश के हर जि़ला मुख्यालय पर किसानों और मजदूरों के आक्रोश प्रदर्शन हुए. फऱीदाबाद जि़ला इस आंदोलन में कैसे पीछे रह सकता था. ‘किसान दिवस’ का यह कार्यक्रम ‘जॉइन्ट ट्रैड यूनियन कौंसिल, फऱीदाबाद’ के बैनर तले हुआ.

कुछ ‘दिवस’ सरकार घोषित करती है, कुछ, ख़ुद-ब-ख़ुद अपने होने की घोषणा करते हैं. 26 नवंबर 2020 के बाद से, यह दिवस, अपने को ‘किसान दिवस’ होने का ऐलान कर चुका है. दिनोंदिन बिगड़ते बिकट आर्थिक हालात से तंग आकर, चार साल पहले इसी दिन, उत्तर भारत के किसानों ने, ख़ुद को बाहुबली समझने वाली मोदी सरकार से, सड़कों पर ‘दो-हाथ’ करने के लिए दिल्ली की ओर कूंच किया था. किसानों की उस दिन की भावना को सही में अभिव्यक्ति देने की वज़ह से, यह हरियाणवी गीत अभी तक लोगों के रोंगटे खड़े कर देता है; “मोद्दी जी थारी तोप कड़े हम दिल्ली आग्गे..”

2020 से पहले, 26 नवंबर को, सरकारी अंदाज़ में ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाया जाता था. 1949 में इसी दिन, ‘संविधान सभा’ ने संविधान की प्रति सरकार को सौंपी थी, जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया. संविधान के बारे में देश की ताज़ा अपडेट यही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान कि पुस्तक को शीश झुकाकर नमन किया था. हालाँकि ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब फासिस्ट मोदी सरकार, इसी संविधान कि धज्जियां ना उड़ाती हो, संवैधानिक मान्यताओं और परंपराओं को ना रौंदती हो, और संवैधानिक इदारों को प्राणहीन ना बनाती हो. संविधान दिवस के अगले दिन ही, दिल्ली से मात्र 163 किमी दूर संभल में वही संविधान गोलियों से छलनी हो रहा था.
सुबह 10.30 बजे से ही, लोग राजस्थान भवन के सामने वाले नुक्कड़ पर इकट्ठे होने लगे थे, जहां, कॉमरेड बेचुगिरी की अध्यक्षता में ज़ोरदार नारों के बीच एक सभा हुई. सभा का सचालन करते हुए, सीटू के जि़ला सचिव कॉमरेड वीरेंद्र डँगवाल ने बताया कि हरियाणा पुलिस की सीआईए शाखा, ‘हरियाणा सर्व कर्मचारी संघ’  प्रधान सुभाष लांबा के घर पहले 25 नवंबर की शाम और फिर 26 नवंबर को तड़के ही पहुँच गई. उन्हें धमकाया कि वे 26 नवंबर के आंदोलन में भाग नया लें, वरना अंजाम ठीक नहीं होगा. पुलिस अपने मक़सद में कामयाब भी रही क्योंकि सुभाष लांबा प्रदर्शन में नजऱ नहीं आए.

संविधान में आज भी बाक़ायदा लिखा हुआ है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन, आंदोलन करना हर नागरिक का अधिकार है. फासिस्ट मोदी सरकार का दस्तूर है कि संविधान पर शीश नवाओ, बाबा साहेब अंबेडकर की मूर्ति पर बड़ी-बड़ी फूल मलाएं चढ़ाओ, और उसके बाद हर संवैधानिक अधिकार को पैरों तले कुचलो. संसद कि सीढिय़ों पर भी अनेक कैमरों के सामने मोदी जी ने इसी तरह मत्था टेका था, संसद के अंदर क्या होता है, उसके बारे किसी को कुछ बताए जाने कि ज़रूरत नहीं.

एटक, सीटू, एचएमएस, इंटक, आईसीटीयू, हरियाणा सर्व कर्मचारी संघ, आंगनवाड़ी, आशा वर्कर्स यूनियन समेत, लगभग 10 बड़े संगठनों से कुल लगभग 70 लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, जिनमें सबसे ज्यादा तादाद आंगनवाड़ी और आशा वर्कर्स कि थी. हाथों में लाल झंडे उठाए, नारे लगाते प्रदर्शनकारियों ने लघु सचिवालय तथा कोर्ट परिसर का चक्कर लगाया तथा मेन गेट पर पहुंचकर सभा में बदल गए. वीरेंद्र डँगवाल तथा बेचुगिरी के अलावा सभा को विशंभर सिंह, सुधा, जवाहर लाल, नवल किशोर, नरवत जी, ने संबोधित किया.

कार्यक्रम के अंत में, राष्ट्रपति के नाम 12 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन एसडीएम शिखा अंतिल को सौंपा गया. किसानों की समूची उपज की एमएसपी पर खऱीद की गारंटी दो, मज़दूरों की कुर्बानियों से हांसिल 44 श्रम क़ानून रद्द कर लाए गए, 4 लेबर कोड रद्द करो, न्यूनतम वेतन 26,000/ घोषित करो, डीसी की माफऱ्त राष्ट्रपति को भेजे गए, 21 मांगों वाले ज्ञापन की प्रमुख मांगें हैं.

‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ ने, ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ की दिल्ली में हुई, जनरल कौंसिल मीटिंग में यह प्रस्ताव रखा था कि आंदोलन को मज़बूत और व्यापक बनाने के लिए, मज़दूरों-किसानों की जि़ला कमेटियों में, जि़ले में मज़दूरों-किसानों में काम कर रहे, भाजपा-संघ से संबद्ध संगठनों के अलावा, सभी संगठनों को शामिल किया जाना चाहिए. सिद्धांत रूप में तो यह सुझाव एसकेएम ने मान लिया, लेकिन अमल होता कहीं नहीं दिख रहा. अभी भी, जि़ला स्तर पर, 10 केंद्रीय यूनियनों के प्रतिनिधि, दूसरे छोटे संगठनों को शामिल नहीं करते. फऱीदाबाद की ‘जॉइंट ट्रेड यूनियन कौंसिल’ के नेताओं के साथ मीटिंग में भी हमने यह प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने यह कह कर इंकार कर दिया कि ‘जैसे केंद्र में देश की बड़ी 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनें, जॉइंट ट्रेड यूनियन कौंसिल में हैं, जि़ले की ट्रेड यूनियन कौंसिल में भी वही पैटर्न रहेगा’.

यह ‘पैटर्न’, दरअसल उस ज़माने में क़ायम हुआ था, जब ये बड़ी यूनियनें सचमुच बड़ी होती थीं. उनकी कॉल पर हज़ारों-लाखों मज़दूर, हाथों में लाल झंडे लिए, मुट्ठियां  भींचकर नारे लगाते हुए सड़कों पर उतर जाया करते थे. मालिक और सरकार उनसे थर्राते थे, तुरंत बातचीत को बुलाने को मज़बूर हो जाया करते थे. वह ज़माना बहुत पीछे छूट गया. अब मज़दूर उनसे दूर जा चुका है, उनका संघी टोले में शामिल होकर, उनका औज़ार बन जाने का ख़तरा मंडरा रहा है. अब जॉइंट ट्रेड यूनियन कौंसिल दफ़तरों में सन्नाटा पसरा होता है. मीटिंगें होती भी हैं, तो मुद्दे, बदली हुई ज़मीनी परिस्थितियों में मज़दूरों को गोलबंद करने, उनमें संघर्ष का ज़ज़्बा जगाने, वर्ग चेतना पैदा करने की नई रणनीति बनाने के नहीं होते, कुछ और ही होते हैं. कारखानेदार और उनकी सरकार दोनों ये हकीक़त जानते हैं. ट्रेड यूनियन आंदोलन की ऐसी दयनीय हालत क्यों पैदा हुई, यह एक अलग बहस का मुद्दा है. गंभीर मुद्दा है, लेकिन इस रिपोर्ट में अप्रासंगिक है.

‘बड़ी ट्रेड यूनियनों के बड़े नेताओं’ को गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है, कि हरियाणा पुलिस ने सर्वकर्मचारी संघ के प्रधान, सुभाष लांबा को धमकाकर इस प्रोग्राम में शामिल होने से रोक दिया, जबकि उनके शामिल होने से कोई शांति भंग नहीं होने वाली थी. उस दिन दिल्ली में संविधान दिवस’ मन रहा था, संविधान के जयकारे लग रहे थे. वही संविधान हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह, नाइंसाफ़ी का शांतिपूर्वक विरोध कर सकता है. ऐसा आगे भी होना है. बहुत ज्यादा होना है. इसके अलावा एक और बात भी नोट की जानी चाहिए. लघु सचिवालय के मुख्य द्वार पर हो रही सभा में मंच पर खड़े एक मज़दूर नेता को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया तो उन्होंने इंकार कर दिया, ‘तबियत ठीक नहीं है’, जबकि तबियत में कोई खऱाबी नजऱ नहीं आ रही थी!!

यह फ़ासीवादी दौर है. शासक सरमाएदार वर्ग इसे, हिटलर-मुसोलिनी वाले ढंग से नहीं, बल्कि दूसरे ढंग से ला रहा है. किसी भी जनवादी इदारे को ना बंद किया जा रहा है, ना हिटलर की तरह संसद को फूंका जा रहा है बल्कि उनके अंदर फ़ासीवादी टुकडिय़ों को प्रस्थापित कर, उन्हें अंदर से खोखला और प्राणहीन ही नहीं बनाया जा रहा, बल्कि उन्हें ही फ़ासीवादी घुप्प अंधेरा लाने की परियोजना का औज़ार बनाया जा रहा है. यह प्रक्रिया दिनोंदिन तेज़ और तीखी होती जा रही है. फ़ासीवाद विरोधी संघर्ष को व्यापक बनाने की ज़रूरत है.

यही वज़ह है कि कार्यक्रम में आमंत्रित ना किए जाने, सूचना भी ना दिए जाने के बावजूद, ‘क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा’ के प्रतिनिधियों ने, दर्शकों की हैसियत से लेकिन पूरी शिद्दत से भाग लिया. चूंकि मुद्दा, नेताओं की ईगो से कहीं बड़ा है, गंभीर है, जनवाद को बचाने का है, शोषण-उत्पीडऩ से मुक्ति की उसी असली आज़ादी लाने का है, जिसका सपना शहीद-ए-आज़म भगतसिंह ने देखा था; इसलिए हम आगे भी ऐसे कार्यक्रमों में शरीक़ होते रहेंगे, भले हमें बुलाया जाए अथवा नहीं, वहां अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए अथवा नहीं. फऱीदाबाद के मज़दूरों के इस लोकप्रिय साप्ताहिक ‘मज़दूर मोर्चा’ के माध्यम से, हम संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय ट्रेड यूनियन कौंसिल से एक बार फिर अपील करते हैं कि मज़दूरों-किसानों की छोटी जत्थेबंदियों को भी इस तहरीक़ में शामिल कीजिए. संघर्ष को व्यापक और मज़बूत बनाइये.

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Mazdoor Morcha
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