क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा, हरियाणा इस दमघोटू लूट-तंत्र से मुक्ति दिलाने की क़ूबत सिर्फ मज़दूरों में है सरमाएदारों की तानाशाही को छुपाने वाली, जनवाद की मखमली चादर, तार-तार हो चुकी है. निज़ाम की सडऩ कितनी गहरी है, सबके सामने है. मोदी सरकार के रहनुमाओं को, दो ही काम आते हैं, लफ्फाज़ी करना और उगाही करना. बहरूपियों जैसे पुजारियों के भेष में, लंबे-लंबे तिलक लगाकर, प्रधानमंत्री, जब मूर्तियों के सामने लेट रहे होते हैं, ध्यान मग्न हो रहे होते हैं, तब भी यही सोच रहे होते हैं, ‘किसकी बांह कब मरोडऩी है, किसका मुंह और नाक एक साथ दबाना है, किसके पीछे ईडी, सीबीआई, आईटी, कब छोड़े जाएं कि ज्यादा से ज्यादा माल हाथ लगे! फलां राज्य सरकार के ‘माननीयों’ को खऱीदने के लिए, कुल कितना पैसा चाहिए होगा!! भाजपा का पट्टा, दरअसल, आज कोई भी संगीन गुनाह करने का लाइसेंस बन गया है. देश के सारे चोर-उचक्क और ठग-लम्पट, भाजपा की गटर गंगा में छलांग लगाकर लहालोट हो रहे हैं. पूंजी की तरह, निज़ाम के सभी ताबेदारों-सेवकों का भी केन्द्रीकरण होता जा रहा है. अव्वल तो अदालतें सरकारी फ़ासीवादी परियोजनाओं में, कभी कोई रुकावट डालती नहीं, ‘न्यायमूर्ति’ ख़ुद गले में भगवा पट्टा डालने का मौक़ा ताड़ते रहते हैं. अगर कभी कोई अदालत, न्याय का निर्लज्ज मखौल बर्दाश्त ना कर पाने अथवा न्यायप्रणाली पर लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए, कोई साहसिक फ़ैसला सुना भी दे, तो भाड़े की ट्रोल-ब्रिगेड के गले का पट्टा खोल दिया जाता है. उसके बाद क्या करना है, ‘आईटी सेल गैंग’ अच्छी तरह जानता है! नैतिकता और शर्म-लिहाज़ का ऐसा अकाल; बेईमानी, छीना-झपटी का ऐसा आलम, कभी नहीं रहा. झूठ और पाखंड की ऐसी आपूर्ति, इस मुल्क ने कभी नहीं झेली. विपक्षी दलों के लिए भी, मुद्दा ये नहीं है, कि दवाई बनाने वाली कंपनियां, सैकड़ों करोड़ के चंदे देकर, जाली-फज़ऱ्ी दवाइयां बनाकर, हर हफ़्ते मन-माफिक़ दाम बढ़ाकर, अभूतपूर्व मंहगाई, बेरोजग़ारी से कराहते, कंगाली की हद तक पहुँच चुके, गऱीबों को क्यों लूट रही हैं? उनका छाती-कूट विलाप भी, बस इस बात पर है, कि इन कॉर्पोरेट डकैतों ने, उन्हें सिर्फ 10 करोड़ दिए, जबकि भाजपा की गटर गंगा में 100 करोड़ डाले! बेईमानी की, हमारी औक़ात इतनी कम क्यों आंकी गई?!! नीति- नैतिकता, शर्म-मर्यादा, संसदीय मान्यताओं की बात करना आज ‘अर्बन नक्सल’ कहलाना है!
बेरोजग़ारी का आलम ये है कि जहाँ, सन 2000 में, पढ़े-लिखे युवाओं का 35.2त्न, अर्थात एक तिहाई बेरोजग़ार था, वहीं, मोदी के अमृत काल, 2022 में, ये तादाद बढक़र 65.7 प्रतिशत, यानी दो-तिहाई हो गई! यही वज़ह है कि देश के सभी श्रम-क़ानूनों को पैरों तले कुचलने वाले कारखानेदार, मेहनतक़श मज़दूरों को हर रोज़, ये कहकर ज़लील करते हैं, ‘काम करना है, तो जैसे हम कहें, करते जाओ, वर्ना तुम्हारे जैसे सैकड़ों आते हैं, हर रोज़ फैक्ट्री गेट पर, काम मांगने!’ 80 करोड़ लोग सरकारी खैरात पर जिंदा हैं. विश्व भुखमरी सूचकांक पर, देश, लगातार चढक़र 111 वें नंबर पर, सोमालिया के नज़दीक पहुँच गया. झकड़ा हो चुका, पूंजीवादी जहाज डूब रहा है.
कितना भी झकड़ा हो जाए, ये जहाज़, लेकिन, ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं डूबेगा, क्योंकि उसी जहाज़ में, मु_ीभर मुसाफिऱ ऐसे भी हैं, जिनकी दौलत के पहाड़, अभूतपूर्व तेज़ी से विशाल- विकराल होते जा रहे हैं. 2023 से पहले, इसी डूबते जहाज में, ऐसे धन-पशुओं की कुल तादाद 177 थी, जिनके पास $1 बिलियन, अर्थात 83,36,72, 50,000/ (तिरासी अरब, छत्तीस करोड़, बहत्तर लाख, पचास हज़ार रु) की संपत्ति थी. लेकिन, अकेले 2023 में, इनकी तादाद, 177 से बढक़र, 271 हो गई. इतने धन-पशु, इससे पहले, किसी भी एक साल में नहीं बढ़े और दुनिया में कहीं नहीं बढ़े. दवाईयां बनाने वाली कंपनियों ने सबसे ज्यादा, 39 खऱबपति बनाए. अब आप समझ सकते हैं, दवाईयों की क़ीमत हर हफ़्ते क्यों बढ़ रही हैं? चुनावी बांड खऱीदो और ज़ाली दवाइयां बनाओ! मज़दूरों की मेहनत लूटकर, मोटाए, ये धन-पशु, इस जहाज़ के मुसाफिऱ ही नहीं हैं, बल्कि जहाज का कप्तान और स्टाफ भी इन्हीं का है. ये भला, उनके प्यारे, इस जहाज को क्यों डूबने देंगे, भले वह कितना भी जज़ऱ्र क्यों ना हो जाए! कॉर्पोरेट लुटेरे, इतने खुश कभी नहीं रहे. इतने अच्छे दिनों की तो उन्होंने 2014 में कल्पना भी नहीं की थी.
यही वर्ग है, जो देश की कंगाली की मूल वज़ह है. ये शातिर लुटेरे जानते हैं कि ये व्यवस्था डूब गई, तो मज़दूरों का राज आएगा, और मज़दूर, उनकी लूट की दौलत के पहाड़ को, उसी तरह छीन लेंगे, जैसे 1917 में, सर्वहारा के महान नेता लेनिन के नेतृत्व में. रूस के मज़दूरों और मेहनतक़श किसानों ने छीना था. लुटेरों के इसी गिरोह ने, मीडिया, प्रशासन, विधायिका समेत जनवाद के जर्ऱे जर्ऱे पर क़ब्ज़ा कर, अपने सबसे पसंदीदा ताबेदार भाजपा-संघ गिरोह को सौंप दिया है. ये ही तय करते हैं, देश के लोग कैसे हांके जाएँगे! लेकिन पाब्लो नरूदा के शब्दों में, ‘तुम हर फूल को मसल सकते हो लेकिन तुम बसंत को आने से नहीं रोक सकते.’ देश के मज़दूरों को उसी खूबसूरत ‘बसंत’ को लाने की तारीखी जि़म्मेदारी को याद करने का दिन है, 1 मई, मज़दूर दिवस. फ़ासिस्ट मोदी सरकार और पूंजी के राज़, दोनों को सत्ता से उखाड़ फेंको 1 मई, मज़दूर दिवस, मज़दूरों को अपनी ताक़त पहचानने और उसे आजमाने-परखने का दिन है. मई दिवस के जांबाज़ मज़दूर योद्धाओं से प्रेरणा लेकर, मज़दूरों-मेहनतक़श किसानों को, पूंजी से मुक्ति की अपनी निर्णायक जंग के लिए समर्पित हो जाने के अहद का दिन है. 138 साल हो गए, जब 1886 की मई महीने के पहले सप्ताह में, अमेरिका के शिकागो शहर में, मज़दूरों ने, पूंजीपति लुटेरों को ललकारा था, ‘आप हमें जानवर की तरह, जब तक चाहें तब तक नहीं जोत सकते. 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन, का हक़ हम लेकर रहेंगे’.
‘मज़दूरों की ये जुर्रत!’ लुटेरों के गिरोह को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ था. पूंजीपति लुटेरे, सरकार,पुलिस और अदालत, सब एक हो गए थे. षडयंत्र रचे गए और 4 मज़दूर नेताओं, अल्बर्ट आर पार्संस, अगस्त स्पाइस, एडोल्फ फिशर तथा जॉर्ज एंगेल्स को, एक ही दिन, 11 नवम्बर 1887 को सरे आम फांसी पर लटकाया गया. उनकी मौत को तमाशा बनाया गया था, जिसे देखने के लिए, शिकागो ही नहीं, बल्कि अमेरिका के कई शहरों से सरमाएदार और उनके टुकडख़ोर मौजूद थे, जबकि उन मज़दूर शूरवीरों के परिवारों को वहा जाने की अनुमति नहीं थी.
दिन में 8 घंटे काम का अधिकार हो, या मज़दूरों का कोई दूसरा अधिकार, सब उनके लहू से नम हुई ज़मीन से ही उपजे हैं. कुछ भी खैरात में नहीं मिला. शहीदों की क़ुर्बानियों से हांसिल अधिकार, आज छीने जा रहे हैं. 8 घंटे काम की बात, आज, कारखानेदार सुनने को भी तैयार नहीं. मज़दूरों द्वारा यूनियन बनाने की भनक मिलते ही, मालिक बिलबिला जाते हैं, उनके सर पर खून सवार हो जाता है. अपने अधिकारों को लुटने देना, ना सिफऱ् मालिकों की गुलामी स्वीकारना है, बल्कि उन अमर बलिदानियों की शहादत का भी अपमान है, जिन्होंने, उन्हें हांसिल करने के लिए फांसी के फंदे चूमे थे. आज हालात ऐसे हैं कि मज़दूर-अधिकार हों या मेहनतक़श किसानों की मांगें, कोई भी लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती. मोदी सरकार, रणनीतिक दांव के रूप में, दो क़दम पीछे खींचकर, जांबाज़ किसानों को, जीत के ऐसे ही मुगालते का अहसास करा चुकी है. सरकारों ने, अपने आक़ा कॉर्पोरेट के हित में, अपनी ही जनता के खि़लाफ़ युद्ध छेड़ा हुआ है. सत्ताधारी वर्ग को सत्ता से बेदखल करने के लिए, शासक वर्ग की रणनीति को मात दिया जाना ज़रूरी है. समूचे मेहनतक़श वर्ग को इक_े होकर, ऐसे निर्णायक संघर्ष की तैयारी करनी है, उसे क्रमबद्ध तरीक़े से, लगातार, और ऊँचे आयाम में ले जाना है, जिसस ेशोषण-उत्पीडऩ, ज़ोर-ज़बर की जड़, पूंजी के राज़ को ही, हमेशा-हमेशा के लिए दफऩ किया जा सके. सामाजिक उत्पादन पर व्यक्तिगत मालिकाने की जगह, सामाजिक मालिकाना क़ायम हो. फासिस्ट मोदी सरकार, अपने हर जन-विरोधी क़दम को, विरोध की हर आवाज़ कुचलने को, ईडी, सीबीआई, आईटी को औज़ार बनाकर, पूरी बेशर्मी से फिऱौती-रैकेट चलाने को, एक ही बात से उचित ठहराती है, ‘देश के 140 करोड़ लोगों ने हमें चुना है’. मानो, उनके अक्षम्य अपराधों के लिए, बेरोजग़ारी-मंहगाई की अभूतपूर्व मार से कराहते लोग ही ख़ुद जि़म्मेदार हैं. हालांकि सारा देश जानता है कि 2014 में झूठे वादे, 2019 में अंधराष्ट्रवाद का नशा, ईवीएम की धांधली और सम्पूर्ण मीडिया पर सम्पूर्ण कब्ज़ा; यही उनकी जीत के कारण रहे हैं. देश के 98.6 करोड़ मतदाता, आगामी लोकसभा चुनावों में, केंद्र की महाभ्रष्ट, घोटालेबाज संघ-भाजपा को केंद्र की सत्ता से उखाड़े बगैर, इस ‘गुनाह’ से मुक्त नहीं हो सकते.
फ़ासिस्ट मोदी सरकार को, सत्ता से खींचकर बाहर करना, मज़दूरों, मेहनतक़श किसानों के साथ ही, हर इंसाफ पसंद नागरिक का पहला, फ़ौरी काम है. चुप रहना, आज, अक्षम्य अपराध है. चुनाव पर ही, लेकिन, अगर रुक गए, तो, या तो इनकी जगह लेने वाले भी इसी रास्ते पर चलेंगे, या ये गिरोह, फिर से, और भी खूंख्वार होकर सत्ता में पहुंचेगा. पूंजीवाद में अब लोगों की मूलभूत समस्याओं, जैसे बेरोजग़ारी, मंहगाई, सामाजिक-सांस्कृतिक पतन में, कोई भी राहत देने की गुंजाईश नहीं बची. सड़ता हुआ पूंजीवाद ही, ख़ूनी फासीवादी स्वरूप अख्तियार करता है, लोगों को आपसी खून-खऱाबे में झोंकने का षडयंत्र रचता है. इस निज़ाम में किसी सुधार की उम्मीद बांधना, कड़वी हक़ीक़त से आंख मूंदना, निर्णायक संघर्ष से पल्ला झाडऩा है. वही निर्णायक युद्ध, हमारा दरवाज़ा खटखटा रहा है, जिसका जि़क्र शहीद-ए-आज़म भगतसिंह ने किया था.
मज़दूरों को अपनी ताक़त का अहसास कराना, नशे को ठोकर मार, मोहल्ला कमेटियां बनाना, फ़ासिस्ट टोले का औज़ार बनने से दृढ़ता से इंकार कर, उनका मुक़ाबला कर शिकस्त देना और सबसे अहम, संघर्षों का औज़ार, अपना क्रांतिकारी संगठन बनाना, आज जितना ज़रूरी, इससे पहले कभी नहीं रहा. मज़दूरों की विशाल सक्रिय सेना की असीम क्रांतिकारी ऊर्जा से ही, देश स्तर पर क्रांतिकारी पार्टी/ मोर्चे का उदय होगा. समूची क़ायनात, युगांतरकारी करवट लेने को मचल रही है. गुजरते वक़्त ने, पहले भी मानव विकास के ऐतिहासिक पहिये को रोकने के आखऱी हताश प्रयास किए हैं, लेकिन वे कुछ दूर तक घिसटने के बाद दूर फेंक दिए गए हैं.
पूंजीवाद, मानव इतिहास का आखऱी मुक़ाम नहीं हो सकता. इतिहास के संग्रहालय में, सामंतवाद की बगल में, इसकी जगह सुनिश्चित है. नए विहान की लालिमा नजऱ आने लगी है. उस ख़ूबसूरत लाल सुबह को लाने की ताक़त और हिम्मत सिफऱ् सर्वहारा वर्ग में है. मज़दूरों की विशाल अजेय सेना, अपनी तारीखी जि़म्मेदारी निभाने के लिए सज रही है. 1 मई, मज़दूर दिवस उन्हें ललकार रहा है.